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गंदगी विकसित देशों ने फैलाई कीमत तीसरी दुनिया के देशों ने चुकाई

यूरोपीय संघ (The European Union) में भारी उद्योग क्षेत्र में स्वच्छता की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घटना हुई है। एक अध्ययन में यूरोपीय यूनियन को वर्ष 2050 तक स्टील, सीमेंट व केमिकल इंडस्ट्री में नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य (Net-zero emissions by 2050 for EU steel, cement and chemical industries) निर्धारित करने का आव्हान किया है, तो दूसरी तरफ फ्यूचर ऑफ यूरोप समिट (Future of Europe Summit) की पूर्व संध्या पर, 50 से अधिक व्यवसायों, निवेशकों और व्यापार नेटवर्क के सीईओ, जिसमें यूनिलीवर, IKEA और DSM शामिल हैं, यूरोपीय संघ से 2050 तक जलवायु समृद्धि प्राप्त करने के लिए एक दीर्घकालिक डिकार्बोनेशन रणनीति (deep decarbonisation) का समर्थन करने का आह्वान किया है।

Net-zero emissions by 2050 for EU steel, cement and chemical industries? Economically and technically feasible

सवाल यह है कि क्या यूरोपीय अर्थव्यवस्था को 2050 तक शून्य उत्सर्जन में लाना संभव है? क्योंकि ऐसा करने के लिए नई उत्पादन प्रक्रियाओं और अल्पकालिक पूंजी निवेश में बड़ी वृद्धि की आवश्यकता होगी।

कंसल्टेंसी मैटेरियल इकोनॉमिक्स द्वारा तैयार किये गये दस्तावेज औद्योगिक रूपान्तरण 2050— ईयू के भारी उद्योग जगत से नेट—शून्य उत्सर्जन के रास्ते (इंडस्ट्रियल ट्रांसफॉर्मेशन 2050— पाथवेज टू नेट—जीरो एमिशंस फ्रॉम ईयू हैवी इंडस्ट्री) को यूरोपियन क्लाइमेट फाउंडेशन ने प्रमाणित किया है (consultancy Material Economics and commissioned by the European Climate Foundation)। इस कार्य में अन्य संगठनों (क्लाइमेट किक, एनर्जी ट्रांजीशंस कमीशन, कैम्ब्रिज इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबिलिटी लीडरशिप, सिट्रा) ने भी सहयोग किया।

जर्मनी में वुप्पर्टल इंस्टीट्यूट और इंस्टीट्यूट ऑफ यूरोपियन स्टडीज द्वारा व्रीजे यूनिवर्सिटिट ब्रुसेल्स (VUB) के अध्ययन के अनुसार, “शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए विभिन्न औद्योगिक रणनीतियों और योजनाओं को एक किया जा सकता है।” अध्ययन कहता है कि यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है, लेकिन खर्चीला है।

मौजूदा वक्त में स्टील, रसायन और सीमेंट उद्योगों को बदलाव के लिहाज से मुश्किल क्षेत्रों में गिना जाता है। यूरोप में होने वाले प्रदूषणकारी तत्वों के सालाना उत्सर्जन में इन क्षेत्रों का योगदान करीब 14 प्रतिशत (वार्षिक वैश्विक उत्सर्जन का 20 फीसद) है। मौजूदा रफ्तार अगर बनी रही तो वर्ष 2050 इसके 30 फीसद तक बढ़ जाने की आशंका है। अध्ययन कहता है ऐसे में ईयू के भारी उद्योग क्षेत्र को यूरोपीय अर्थव्यवस्था को कार्बनमुक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होगी, ताकि पेरिस समझौते के लिये लिये गये यूरोप के संकल्पों को पूरा किया जा सके।

अध्ययन के लेखक पेर केल्वेंस और टॉमस वेन्स हैं।

अध्ययन कहता है कि वर्ष 2050 तक रीसाइकल करके स्टील और प्लास्टिक की 70 प्रतिशत मांग को पूरा किया जा सकेगा। प्लास्टिक के मामले में नये उत्पादन के लिये पुरानी प्लास्टिक को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और इससे तेल तथा गैस की अतिरिक्त मात्रा के प्रयोग को रोका जा सकता है। बता दें तेल और गैस कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत हैं।

उधर यूरोप के कुछ सबसे बड़े व्यवसायों के सीईओ ने यूरोपीय भविष्य के लिए आयोजित होने वाले शिखर सम्मेलन से पूर्व एक खुले पत्र में यूरोपीय संघ से 2050 तक ‘जलवायु तटस्थता’ हासिल करने के लिए एक दीर्घकालिक डिकार्बोनेशन रणनीति लागू करने का अनुरोध किया है। इनका कहना है कि यूरोप के एजेंडे में जलवायु परिवर्तन को सबसे ऊपर लाने से भविष्य में नेट जीरो उत्सर्जन उद्योगों में निवेश करने में पारदर्शिता व आत्मविश्वास लाएगा और वैश्विक स्तर पर यूरोपीय प्रतिस्पर्धा की रक्षा करेगा।

जाहिर है कि यदि इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में यूरोपीय संघ आगे बढ़ता है तो तो यह न सिर्फ उसके लिए बल्कि अमेरिका, जापान, चीन और भारत जैसे उन अन्य देशों के लिये भी सबसे ज्यादा प्रासंगिक है जो निम्न कार्बन युक्त अर्थव्यवस्था बनाने के लिये अनुसंधान एवं विकास पर बहुत भारी मात्रा में निवेश कर रहे हैं।

लेकिन इसका भारत और तीसरी दुनिया के देशों के लिए एक आसन्न खतरा यह है कि यूरोपीय संघ क्लीन एनर्जी और नेट जीरो उत्सर्जन के लिए अपने यहां तकनीक उच्चीकृत करेगा, लेकिन जो पुरानी मशीनें और तकनीक वहां से खारिज होंगी उन्हें तीसरी दुनिया के देशों पर थोपने का खतरा बना रहेगा। पूर्व में भी विकसित देशों के लालच ने पूरी दुनिया को गैस चैंबर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। तथाकथित विकास की बड़ी कीमत तीसरी दुनिया के देशों ने अदा की है।

कार्बन ब्रीफ ने एक एनीमेशन ग्राफिक्स के जरिये दिखाया है कि कैसे दुनिया के दादा अमेरिका ने पिछले 250 साल में (1750 से आज तक) अंतरिक्ष में सबसे अधिक 397 गीगाटन कार्बन जमा किया है जो जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों के लिये सबसे अधिक ज़िम्मेदार है। महत्वपूर्ण है कि इस एनीमेशन में दूसरे नंबर पर चीन है जो 214 गीगा टन कार्बन उत्सर्जन कर चुका है। जबकि भारत 51 टन कार्बन उत्सर्जन के साथ सातवें नंबर पर है।

विकसित देशों ने लगभग तीन दशक पहले नीति अपनाकर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को विकासशील देशों में स्थानांतरित करना शुरू किया। इसके पीछे उनकी सोच थी कि इससे इन उद्योगों से होने वाले प्रदूषण से विकसित देशों को मुक्ति मिल जाएगी। हालांकि उनकी इस नीति का उन्हें लाभ तो कम हुआ लेकिन पूरी दुनिया खासकर तीसरी दुनिया के देशों ने भारी कीमत चुकाई।

ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया में हुआ, भले ही इसके दुष्प्रभाव विकासशील या गरीब देशों ने ज्यादा भुगते लेकिन इससे अछूते विकसित देश भी नहीं रहे, क्योंकि हवाओं को सरहदें नहीं रोक सकतीं। अगर दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित राजधानियों में दिल्ली शामिल है तो बीजिंग भी शामिल है।

पर्यावरण कार्यकर्ता विवेकानंद माथने के मुताबिक भारत में कोयला आधारित उद्योगों में हर साल लगभग 800 मिलियन टन कोयला जलाया जाता है। जितना कोयला उतना ही ऑक्सीजन खर्च होकर 1200 मिलियन टन कार्बन डाई आक्साइड, 320 मिलियन टन राख और 2160 खरब किलो कैलरी उष्णता वातावरण में पहुंचती है। दूसरे उद्योगों से होने वाले प्रभावों को जोड़ा गया तो यह प्रभाव और अधिक बढ़ेगा।

जाहिर सी बात है अगर भारत में भी ऊर्जा के लिए कोयला का विकल्प न खोजा गया तो यह एक तरफ जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दों पर कॉरपोरेट्स और मूलनिवासियों के बीच संघर्ष को तो और तीव्र बनाएगा ही जिससे सामाजिक संघर्ष बढ़ेगा, दूसरी तरफ भारत के सामने विकसित देशों की पुरानी प्रोद्योगिकी के डंपिंग ग्राउंड बने रहने का खतरा बना रहेगा।

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बहरहाल, यह रिपोर्ट आगाह भी करती है कि वर्ष 2050 तक उत्सर्जन के स्तर को शून्य तक लाने के लिये औद्योगिक इकाइयों खासकर सीमेंट, प्लास्टिक व ऊर्जा क्षेत्र की इकाइयों को बिना देर किये रूपान्तरण की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। इसके लिये सही नीतिगत कार्ययोजना बनानी होगी ताकि रूपान्तरण के साथ—साथ वैश्विक स्तर पर नये आर्थिक अवसरों के मोर्चे पर बेहतरी बनी रहे।

Amalendu Upadhyaya hastakshep अमलेन्दु उपाध्याय लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं।
अमलेन्दु उपाध्याय लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं।

तेल और गैस, कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत हैं। कोयला क्षेत्र को लेकर तो चर्चा बहुत होती है, लेकिन प्लास्टिक और सीमेंट को लेकर भारत में चर्चा कम ही होती है। जबकि प्लास्टिक और सीमेंट भी जहां स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हैं वहीं प्रदूषण के लिए भी जिम्मेदार हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक – “दुनिया के सबसे बड़े सीमेंट उद्योग व उत्पादन क्षमता वाले देशों में भारत दूसरे नंबर पर आता है। यहां 250 बड़े सीमेंट प्लांट हैं और सालाना उत्पादन क्षमता करीब 50 करोड़ टन है, जोकि वैश्विक उत्पादन क्षमता का 8 फीसद से अधिक है।“

हालांकि सीमेंट मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (सीएमए) का कहना है कि भारतीय सीमेंट उद्योग पर्यावरण के लिए अनुकूल मानकों का पालन कर रहा है जिससे कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। देश के सीमेंट उद्योग का लक्ष्य वर्ष 2050 तक कुल 50 अरब डॉलर के निवेश के साथ कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में 45 फीसदी की कटौती करना है।

लेकिन यह नाकाफी है, लक्ष्य भारत में भी कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन जीरो ही होना चाहिए। आशा है, हर मामले में पश्चिम और विकसित देशों का अंधानुकरण करने वाले हम लोग भी कुछ सबक लेंगे और यूरोपीय यूनियन के लिए जारी इस रिपोर्ट को अपने देश में भी लागू करने का प्रयास करेंगे। लेकिन क्या ये संभव है जब चुनावी मौसम में भी पर्यावरण और स्वास्थ्य हमारा चुनावी मुद्दा न बन सका हो ?

(अमलेन्दु उपाध्याय, लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं।)

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