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कांग्रेस का नया कॉरपोरेट अवतार : कांग्रेस को बर्बाद करके छोड़ेंगी जेएनयू की टोली, जिनको कांग्रेस कार्यकर्ता गुलाम लगता है

कांग्रेस का नया कॉरपोरेट अवतार : कांग्रेस को बर्बाद करके छोड़ेंगी जेएनयू की टोली, जिनको कांग्रेस कार्यकर्ता गुलाम लगता है

देश की राजनीति में जातियों का प्रभाव रहा है और अभी अगले 100 साल तक रहने बाला है। राजनीतिक दलों का राजनीतिक व धार्मिक जनाधार है यह सच्चाई है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता। सब राजनीतिक दलों ने समय समय पर अपनी सहुलियतों के अनुसार इस inbuilt social system का उपयोग किया है।

यूपी में सपा, बसपा ने इससे ताकत पाई और अब से अल्पसंख्यक/ मुस्लिम समुदाय ने पासंग का काम किया जिस तरफ हो गया उसी की सरकार बना दी।

कांग्रेस की ताकत जो जनाधार था, वही बसपा और सपा में बंट गया जिससे कांग्रेस की प्रासंगिकता यूपी में खत्म हो गई।

सपा और बसपा ने जब जब प्रयास कर अन्य बिरादरियों में जनाधार बनाया तब तब उनकी सरकारें बनी लेकिन इनके नेतृत्व का जाति केन्द्रित होने ने इन्हें umbrella political party नहीं बनने दिया।

सपा का नाम भले ही समाजवादी पार्टी रहा लेकिन इनका समाजवाद से कोई लेना-देना नहीं रहा और न यह 29 वर्षो के अपने स्वर्णिम कार्यकाल में विचारधारा आधारित कैडर ही विकसित कर सके, जिससे इसपार्टी की आयु सीमित ही है। अब यह केवल जय-जय कारी चापलूसों का झुंड रह गया है।

बसपा के बारे में कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है।

मान्यवर कांशीराम जी के बाद विचारधारा के स्तर पर कुछ है ही नहीं। शुद्ध राजनीतिक व्यापार की दुकान भर बन कर रह गई है जिसका उद्देश्य केवल सत्ता कब्जियाना और दौलत इकट्ठा करना भर ही है।

लेकिन इस सब के मध्य भाजपा ने उग्र हिंदुत्व के नाम पर सपा और बसपा के जनाधार में तो अपना हिस्सा बनाया ही बल्कि यूपी की उपेक्षित सी पड़ी जातियों के नेतृत्व को शीर्ष स्तर पर प्रतिनिधित्व देकर उनको भी सत्ता में भागीदार होने का एहसास कराया, केवल अल्पसंख्यक को माईनस करके। इस तरह से भाजपा ने काफी हद तक अपने आप को umbrella party में बदल लिया।

इस दौरान कांग्रेस बेहोश पार्टी रही। चाटुकारों, परिजीवी और दिशाहीन जड़ो से कटे नेताओं को सूझा ही नहीं कि करें तो करें क्या! जब तक दिल्ली की सत्ता मिलती रही तब तक यूपी को बसपा और सपा के हवाले किये रहे। यूपी में सपा या बसपा में से किसी की सरकार हो दिल्ली में उसकी मजबूरी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कांग्रेस या थर्ड फ्रंट की सरकारों का समर्थन करने की रहती ही थी।

प्रमोद तिवारी जी जैसे नेताओं की हर चुनाव की जीत भी इसी दुरभिसंधि के चलते लगातार होती रही।

मुसीबत का कांग्रेस को एहसास तब हुआ जब दिल्ली सल्तनत हाथ से निकल गई न तो यूपी में समझौतों के कई प्रयोग किये थे। यूपी में बसपा से गठबंधन किया, सपा से तो तब कर लिया जब “27 साल यूपी बेहाल” का नारा देकर कांग्रेस ने यूपी में चुनाव अभियान की 2016 में शुरुआत की थी। यानि कि जो यूपी की बेहाली के लिये जिम्मेदार थे उनकी ही गोद में जाकर कांग्रेस बैठ गई। शायद कांग्रेस नेतृत्व ने यूपी की जनता को मूर्ख समझ लिया था! लेकिन जनता ने 2017 में उसका माकूल जवाब दिया और राजनीतिक चतुराई की सारी ऐंठ निकाल दी। ऐंठ यहां तक ही नहीं निकाली बल्कि 2019 में तो यूपी की जनता जनार्दन ने कमाल कर दिया कागजी जोड़ घटाने में अजेय दिखाई दे रहे, सत्ता के लिये पिछले 28 सालों से आपस में लड़ते आ रहे दोनों दलों सपा, बसपा गठबंधन को दिन में ही तारे दिखा दिये।

अब कांग्रेस का नया अवतार हुआ है। यह कॉरपोरेट अवतार है।

शीर्ष नेतृत्व के दरबार में वेतनभोगी दरबारी हैं, किताबों की दुनिया से आये अच्छे एकेमेडिशियन है। मार्क्स, लेनिन, खुरश्चेव, सर्वहारा की बात करने बाले विद्वतजन हैं, जिन्हें कांग्रेस का कार्यकर्ता गुलाम सा लगता है। जमीनी अनुभव से शून्य इन हाकिमों का अहंकार इतना है कि कांग्रेसी इन्हें कीड़े मकौड़े से लगते है। वरिष्ठ कांग्रेसी पूरी तरह से उपेक्षित कर दिये गये हैं। उन्हें यह लोग अपशब्द तक कह देते हैं। राजनीतिक लोग हैं तो वे अपने लिये दूसरा आश्रय तलाशने लगे हैं। कांग्रेस के वफादार, कर्मठ और काम कर सकने वाले लोगों को तलाश कर उन्हें आगे लाने की बजाय दूसरी पार्टियों के रिजेक्टेड माल को इन लोगों की सलाह पर पार्टी में प्रदेश स्तर पर अहम जिम्मेदारी दी है। जीरो में जीरो जोड़कर कितना संख्या होगा यह गणित इन्हें ही आता है। जिलों में जिम्मेदारी देते समय यह देखा ही नहीं गया है कि किस बिरादरी के लोगों को प्रतिनिधित्व देकर पार्टी का बेस बढ़ाया जा सकता है!

यहां तक कि कुछ जगहों पर किसी व्यक्ति विशेष को ओहदा सौंपना सुनिश्चित करने के लिये दूसरे आवेदक को शीर्ष नेतृत्व से मिलने ही नहीं दिया गया। कहते हैं इसमें इन नौकरों ने माल बनाया है।

प्रदेश की विभिन्न प्रमुख जातियों को प्रतिनिधित्व देने की कोई सोच ही नहीं दिखती। इंदिरा जी जैसा ओरा उनकी जैसी सर्वव्यापी स्वीकार्यता तो है नहीं फिर कैसे लोगों तक पार्टी से जोड़ा जायेगा! यह अभी कम से कम मेरी समझ में तो आ नहीं रहा है। हो सकता है किसी चमत्कार का इंतजार हो।

पीयूष रंजन यादव

(लेखक यूपी सीसीसी के पूर्व सदस्य व भीमनगर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष हैं।)

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Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

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