Breaking News
Home / हस्तक्षेप / आपकी नज़र / ‘‘न्यू इंडिया’’- 5 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था : ये सुहाने जुमले हैं, जुमलों का क्या!
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

‘‘न्यू इंडिया’’- 5 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था : ये सुहाने जुमले हैं, जुमलों का क्या!

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर राज्यसभा में बहस (motion of thanks on the President’s address, in Rajya Sabha) में कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद ने झारखंड में तबरेज अंसारी की धर्म पूछकर भीड़-हत्या से लेकर, बिहार में चमकी बुखार से गरीब परिवारों के डेढ़ सौ बच्चों की मौत तक, मोदी-2 के पहले महीने में सामने आयी भयावह सचाइयों का हवाला देकर, सरकार से रेहटोरिकल अनुरोध किया था कि ‘अपना न्यू इंडिया आप ही रखो, हमें हमारा पुराना हिंदुस्तान ही लौटा दो’।

प्रधानमंत्री ने इसका जवाब देना बहुत जरूरी समझा और विस्तार से जवाब दिया भी। लेकिन कैसे? क्या प्रधानमंत्री ने पुराना भारत लौटाने की पुकार के जवाब में, यह बताने की रत्तीभर जरूरत समझी कि उनका ‘‘न्यू इंडिया’’, पुराने भारत से किन-किन बातों में उन्नत होगा और कैसे? हर्गिज नहीं।

उल्टे, जैसाकि अब प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों का ट्रेड मार्क ही हो गया है, ‘‘न्यू इंडिया’’ के नारे के पीछे उनके राज में वास्तव में जो हो रहा है उसकी आलोचनाओं का जवाब उन्होंने सबसे बढ़क़र यह याद दिलाकर दिया कि कैसे पिछले कांग्रेसी राज में भ्रष्टाचार था, कांग्रेस में वंशवाद चलता है, आदि, आदि।

लेकिन, नरेंद्र मोदी इसके सिवा और कोई जवाब देते भी तो कैसे? उनका ‘‘न्यू इंडिया’’ तो एक सुहाना जुमला भर है, पिछली बार के ‘‘अच्छे दिन’’ की तरह बल्कि कहना चाहिए कि उसी का सीक्वल, जिसे ‘अच्छे दिन-2’ की जगह, एक नया नाम दे दिया गया है। अक्सर पिटी हुई फिल्म के सीक्वल को, नये नाम से चलाने की कोशिश की जाती है।

बेशक, प्रधानमंत्री ने इसके साथ ही विपक्षी नेताओं की यह कहकर हंसी भी उड़ायी कि वे तो देश को आगे बढ़ता, न्यू इंडिया बनता, देखना ही नहीं चाहते हैं। वास्तव में जुमले का काम ही यही है। वह सुनने और सुनाने में अच्छा लगता है। आखिर, कौन नहीं चाहेगा कि मौजूदा हालात बदलें? लेकिन, जुमले की खास बात यही होती है कि वह ऐसी ‘हवाई’ खुशी या ‘गर्व’ की भावना देने के सिवा कोई वास्तविक दिशा, कोई मार्गचित्र, कोई ठोस आश्वासन नहीं देता है। यथार्थ की जमीन के स्पर्श से ही, उसकी खुशी या गर्व की हवा जो निकल जाती है। लेकिन, कोई पूछ सकता है कि हवाई ही सही, जुमला खुशी या गर्व की भावना तो देता है। झूठी ही सही, तसल्ली में क्या नुकसान है? लेकिन, वास्तव में यह खुशी इतनी निर्दोष भी नहीं है। एक अमूर्त सा अच्छा हो रहा होने का दिलासा, वास्तविकता में बुरा होने पर पर्दा डालने का भी काम करता है। ‘‘न्यू इंडिया’’ ठीक ऐसा ही पर्दा है।

किसानों की दोगुनी आय, हरेक के लिए पक्का घर, सब के लिए स्वास्थ्य जैसी कुछ सुनने में अच्छी लगने वाली आम घोषणाओं के अलावा, ‘‘न्यू इंडिया’’ के बारे में न कुछ बताया गया है और न बताया जाएगा। लेकिन, ‘‘न्यू इंडिया’’ लाने का एलान करने वालों का राज वास्तव में देश को किस तरफ ले जा रहा है, उसके दो महत्वपूर्ण लक्षण तबरेज की भीड़-हत्या और चमकी बुखार से मौतें हैं।

और जैसा हम ने शुरू में ही कहा, ‘‘न्यू इंडिया’’ की प्रधानमंत्री की पैरवी में, इन लक्षणों को आगे-आगे और विकराल रूप नहीं लेने देने का कोई आश्वासन नहीं था बल्कि इससे उल्टे ही संकेत थे। तबरेज की भीड़ हत्या पर प्रधानमंत्री (Prime Minister on the massacre of Tabrez) ने दु:ख तो जताया, मगर उसके साथ परंतु की पूंछ भी जोड़ दी कि इसके लिए झारखंड राज्य को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए।

जैसाकि कई टिप्पणीकारों ने याद दिलाया है, गुजरात के 2002 के अल्पसंख्यकों के नरसंहार के बाद, उस राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा गुजरात के विरोधियों द्वारा गुजरात के बदनाम किए जाने की दुहाई का जैसे सफलता के साथ चुनाव-दर-चुनाव इस्तेमाल किया गया था, यह उसी पैंतरे के अब झारखंड में दोहराए जाने का इशारा है।

याद रहे कि इसी साल के आखिर में झारखंड में विधानसभा के चुनाव होने हैं।

पर दुर्भाग्य से यह किस्सा अकेले झारखंड का नहीं है। मोदी-2 (Modi-2) में  अल्पसंख्यकों को और खासतौर पर मुसलमानों को निशाना बनाकर की जाने वाली भीड़ हिंसा के लिए, ‘जय श्रीराम’ नया युद्घ घोष और हथियार, दोनों ही बन गया है। यह बेशक, ‘नया’ है। इसे नये शासन का इस हद तक अनुमोदन हासिल है कि खुद प्रधानमंत्री की ऐन नाक के नीचे, लोकसभा में सत्ताधारी पार्टी के सांसदों ने, सदन के सदस्यों के शपथ ग्रहण के ही मौके पर, मुसलमान सांसदों की आवाज की ही ‘जय श्रीराम’ के नारों से मॉब लिंचिंग कर डाली। लेकिन, उस समय या बाद में भी, इसके लिए उन्हें सत्तापक्ष में किसी ने टोका हो, इसकी कोई खबर नहीं है। अचरज नहीं कि उसके बाद से लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों से इक्का-दुक्का पाकर मुसलमानों को घेरकर भीड़ द्वारा ‘जय श्रीराम’ बुलवाते हुए मार-पीट किए जाने की बढ़ती हुई घटनाओं की खबरें आ रही हैं।

लेकिन, बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। अमित शाह को देश का गृहमंत्री बनाए जाने के साथ, एक ओर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (National citizenship register) की प्रक्रिया का असम के बाद शेष देशभर में विस्तार करने और दूसरी ओर, नागरिकता कानून में संशोधन कर पड़ौसी देशों से आए गैर-मुसलमान शरणार्थियों को भारत की नागरिकता (Citizenship of India to non-Muslim refugees,) देने का रास्ता खोलने का हिंदुत्ववादी शोर और तेज हो गया है। यहां तक कि ‘घुसपैठ पीडि़त राज्यों’ यानी कम से कम प. बंगाल तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों तक, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का विस्तार करने का, मोदी-2 में राष्ट्रपति के पहले ही अभिभाषण में वादा भी किया जा चुका है।

ये सभी मोदी के ‘‘न्यू इंडिया’’ (Modi’s “New India”) में, धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य (Secular Indian state) के तेजी से एक बहुसंख्यकवादी राज्य में तब्दील कर दिए जाने के इशारे हैं। जम्मू-कश्मीर इस तब्दीली का शो-केस है।

और अंत में एक बात और।

मोदी के ‘‘न्यू इंडिया’’ में बेशक सिर्फ बहुसंख्यकवाद ही नहीं होगा, लेकिन बहुसंख्यकवाद उसके झंडे पर, उसके केंद्र में जरूर होगा। इसका चाहकर भी नजरंदाज न किया जा सकने वाला संकेत, मोदी-2 में 17वीं लोकसभा में सबसे पहले, अति-विवादास्पद हिंदुत्ववादी ‘‘तीन तलाक’’ विधेयक का पेश किया जाना है।

रही चमकी बुखार की बात।

प्रधानमंत्री मोदी ने जहां बिहार के मुजफ्फरपुर तथा अन्य जिलों में डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चों की मौत को शर्म का कारण बताया, वहीं इसके लिए ‘सत्तर साल की विफलताओं’ को जिम्मेदार बताया।

बेशक, यह आजादी के बाद से इस देश में सत्तर साल में विकास के नाम पर जो कुछ हुआ और उससे बढक़र जो कुछ नहीं हो पाया है, उसकी बुनियादी विफलता को तो दिखाता ही है कि चमकी बुखार के शिकार हुए लगभग सब के सब बच्चे गरीब परिवारों के अति-कुपोषित बच्चे हैं, जिनकी इस शारीरिक अशक्तता ने, बाहरी इन्फैक्शन से लेकर लीची में पाए जाने वाले मामूली टॉक्सिन तक को, जानलेवा बना दिया। और चिकित्सा सेवाओं की घोर दरिद्रता ने इन मासूमों को मौत दे दी है।

बेशक, यह सत्तर साल से जो हुआ है और जो नहीं हुआ है उसी की विफलता है कि दुनिया में कुपोषित और कुपोषण के चलते अपना पूरा शारीरिक विकास न कर पाने वाले, आयु से कम वजन के बच्चों का सबसे ऊंचा अनुपात भारत में ही है–40 फीसद से ऊपर। और दुनिया भर में अधपेट गुजारा करने वालों की भी सबसे बड़ी संख्या भारत में ही है। लेकिन, इन सत्तर सालों में पांच साल तो मोदी-1 के भी हैं। उन पांच सालों का क्या? मोदी-1 के पांच साल में भूख-कुपोषण को अगर खत्म नहीं किया जा सकता था, तब भी कम तो किया ही जा सकता था। लेकिन, ये पांच इस भूख-कुपोषण को घटाने वाले साल साबित हुए हैं या और बढ़ाने वाले? मोदी-1 ने तो हल करने के बजाए, इस संकट को और बढ़ाने का ही काम किया है।

  वास्तव में, मोदी-1 के पांच साल में जो हुआ है उसे अगर संकेत मानें तो ‘‘न्यू इंडिया’’ में भी चमकी की मौतें हमारे साथ होंगी बल्कि और ज्यादा होंगी।

आखिरकार, इन पांच सालों में खेती का संकट और गहरा हुआ है और बेरोजगारी ताबड़तोड़ तेजी से बढ़ी है। पोषण के पैमाने से, जो कि गरीबी के नाप का हमारे देश में अपनाया गया मूल पैमाना था, गरीबी अगर ज्यादा नहीं तो वैसी ही तेजी से बढ़ी है, जैसी तेजी से हमारे देश में दूसरे सिरे पर, डालर अरबपतियों की संख्या बढ़ी है।

बेशक, देश के प्रचंड बहुमत की गरीबी और बहुत छोटे से अमीर तबके ही अमीरी तेजी से बढऩे का यह सिलसिला भी, पिछली सदी के आखिरी दशक के शुरू में नवउदारवादी रास्ता अपनाए जाने से ही शुरू हो चुका था। सचाई यह है कि उससे पहले तक के स्वतंत्र भारत के तीन दशकों में पोषण-गरीबी में, स्वतंत्रता से पहले के वर्षों के मुकाबले उल्लेखनीय कमी हुई थी, लेकिन नवउदारवादी रास्ता अपनाए जाने के साथ इस प्रक्रिया को उलट दिया गया और एक बार फिर पोषण-गरीबी का ग्राफ तेजी से ऊपर चढऩे लगा।

मोदी-1 के पांच सालों ने, गरीबी में कमी के अपने तमाम झूठे दावों के बावजूद, वास्तव में पोषण-गरीबी में बढ़ोतरी के इस सिलसिले को, बेतहाशा तेज ही किया है। और नीति आयोग की सार्वजनिक उद्यमों की ज्यादा से ज्यादा बिक्री की घोषणाओं, राष्ट्रपति के अभिभाषण, प्रधानमंत्री के भाषणों, सब में इसी का इशारा है कि मोदी-2 में इसी रास्ते पर और ताबड़तोड़ बढ़ा जाएगा। नतीजा वही होगा–दर्द बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की उनने।

और हां! गरीबों को ‘आयुष्मान भारत’ का झुनझुना दिखाते-दिखाते, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का गला घोंटने के जरिए, वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच को उसी तरह और कमजोर किया जाता रहेगा, जैसे ‘मुद्रा लोन’ का झुनझुना दिखाकर, वास्तव युवाओं से रोजगार दूर किया जाता रहेगा। नतीजा क्या होगा, इसका अनुमान लगाने के लिए बहुत भारी विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है।

लेकिन, इसे जारी रखने के लिए उन्हें इस सब के दुष्परिणामों को दबाने-छुपाने की भी तो जरूरत होगी।

जाहिर है कि इस सब के विरोध की आवाजों को दबाने के लिए, सिर्फ सरकार पर या संसद पर ही नहीं, मीडिया से लेकर तमाम संवैधानिक व सामाजिक संस्थाओं तक पर, निरंकुश नियंत्रण का और उन्मत्त बहुसंख्यकवादी-राष्ट्रवाद की लाठी का सहारा लिया जा रहा होगा। और जाहिर है कि महानता के झूठे दिखावों का भी।

और अब तो मोदी-2 के पहले बजट के साथ इन दिखावों को एक नया नाम भी मिल गया है–5 ट्रिलियन डॉलर (50 खरब डालर) की अर्थव्यवस्था! ‘‘न्यू इंडिया’’ की चकाचौंध के अंधेरे में, वास्तव में एक खुल्लमखुल्ला जनविरोधी व्यवस्था के चल रहे होने के इसी बड़े सच को छुपाया जा रहा होगा।

मोदी-2 का पांच साल का एजेंडा, सत्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र की शुरूआत से ही साफ कर दिया गया है। आजाद ने गलत नहीं कहा था–इससे तो पुराना भारत ही अच्छा था!

राजेंद्र शर्मा



”New India” – Economy of $ 5 trillion

About राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

Check Also

Obesity News in Hindi

गम्भीर समस्या है बचपन का मोटापा, स्कूल ऐसे कर सकते हैं बच्चों की मदद

एक खबर के मुताबिक भारत में लगभग तीन करोड़ लोग मोटापे से पीड़ित हैं, लेकिन …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: