तो अडवाणीजी 6 दिसंबर को शौर्य दिवस मनाएंगे कि नहीं

बाबरी मस्जिद : इस की पीड़ा कितनी गहरी होगी, ये तो आडवाणी ही जानते हैं। मरने के बाद पीछे क्या होता है, किसी ने नहीं देखा, ...

हाइलाइट्स
  • बाबरी मस्जिद : इस की पीड़ा कितनी गहरी होगी, ये तो आडवाणी ही जानते हैं
  • कानून के शिकंजे में जकड़ा भाजपा का शीर्ष पुरुष

तेजवानी गिरधर

जैसा कि मीडिया में आशंका जाहिर की जा रही है कि लाल कृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी को राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर करने की खातिर ही सोची समझी साजिश के तहत बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक साजिश के आरोप में मुकदमा चलाया जा रहा है। अगर ये सच है तो राजनीति वाकई निकृष्ट चीज है।

भले ही सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से यह स्थापित हो रहा हो कि कानून सब के लिए समान है, मगर भाजपा के शीर्ष पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के लिए यह जीते जी मर जाने के समान है। जिस राम मंदिर आंदोलन के वे सूत्रधार रहे, उसने देश की दशा व दिशा बदली, उसी की परिणति में भाजपा दो सीटों से बढ़ कर आज सत्ता पर काबिज है, मगर उसी की परिणति में वे खुद उम्र के इस पड़ाव पर भी कानून के शिकंजे में जकड़े हुए हैं।

कैसी विडंबना है कि जिस राम के नाम पर कुछ नेता आज सत्ता का सुख भोग रहे हैं, और आगे और भी ज्यादा ताकतवर होना चाहते हैं, उन्हीं राम की खातिर आडवाणी के हाथों हुआ कथित कृत्य उनको सलाखों के करीब ले आया है।

यह तब और ज्यादा दर्दनाक हो जाता है कि जब पार्टी की खातिर किए गए बलिदान की एवज में ईनाम का मौका आया तो उन्हें उससे वंचित रखने के लिए अपने ही लोग नए सिरे से शिकंजे में कसना चाहते हैं। उस पर तुर्रा ये कि औपचारिकता निभाते हुए पार्टी आपके साथ खड़ी है।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस की साजिश में अगर वे शामिल थे, यह कोर्ट में साबित हो जाता है तो उन्हें सजा होनी ही है, होनी ही चाहिए, मगर क्या यह सच नहीं है कि उसी विध्वंस ने हिंदुओं को लामबंद किया, ऊर्जा भरी और उसी सांप्रदायिक धु्रवीकरण की बदौलत भाजपा आज पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है।

कोर्ट को यह तो दिख जाएगा कि साजिश करने वाले कौन थे, मगर उसे यह कदापि नजर नहीं आएगा कि उसी साजिश के परिणामस्वरूप पार्टी के कुछ और नेता सत्तारूढ़ हो कर इठला रहे हैं।

बकौल आडवाणी, राम मंदिर आंदोलन से वे गौरवान्वित हैं, मगर उसी आंदोलन की वजह से बने मार्ग पर चल कर सुशोभित तो कुछ और रहे हैं।

यह भी एक संयोग या भाजपा के लिए सुयोग है कि मुकदमे में रोज सुनवाई होगी और जब तक फैसला आने वाला होगा तब तक प्रतिदिन राम मंदिर का नाम सुर्खियों में रहेगा, जिसका लाभ स्वाभाविक रूप से भाजपा उठाएगी ही। अगर आरोपित बरी हो गए तो ठीक, नहीं तो इसे हिंदुओं के लिए शहादत के रूप में भुनाया जाएगा। यानि कि भुगतेंगे शहादत देने वाले और भोगेंगे कंगूरे।

इस कष्ट की पीड़ा कितनी गहरी होगी, ये तो आडवाणी ही जानते होंगे कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वे न केवल हाशिये पर धकेल दिए गए, अपितु अनुशासन के नाम पर उनका मुंह भी सिल गया है। वे अपना ब्लॉग तक लिखना छोड़ चुके हैं। संगठन के हित को लेकर कभी कुछ टिप्पणी भी की और मौजूदा नेतृत्व को रास नहीं आया तो उन्होंने न बोलने का फैसला कर लिया। यहां तक कि भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी या कार्यसमिति तक में उन्होंने चुप्पी साधे रखी है।

देश के सर्वोच्च पद के मुहाने पर खड़े शख्स को यदि सामने सलाखें नजर आ जाएं तो उसकी मन:स्थिति की व्याख्या करना नितांत असंभव है। मरने के बाद पीछे क्या होता है, किसी ने नहीं देखा, मगर जीते जी अपनी दुर्गति देखने वाले को शायद मृत्यु से भी हजारों गुणा भयंकर पीड़ा होती होगी। तभी कुछ लोग कहते हैं कि स्वर्ग और नर्क कहीं ऊपर नहीं, यहीं धरती पर है, यहीं पर है।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय से जहां हमारी न्यायिक व्यवस्था पर गर्वानुभूति होती है, उसी व्यवस्था पर शर्म भी आनी चाहिए कि 25 साल तक  मुकदमा चलने के बाद भी उसका फैसला नहीं आया। अभी दो साल और इंतजार करना होगा। इस बीच साजिश रचने के 21 आरोपियों में से 8 तो इस दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। धन्य है।

और उधर उमा भारती को देखिए, उन्हें तो कोई मलाल ही नहीं। कहती हैं-कोई साजिश नहीं हुई, साजिश तो अंधेरे में होती है, वहां तो जो हुआ, खुल्लम-खुल्ला हुआ...। अयोध्या में राम मंदिर के लिए फांसी चढ़ने को भी तैयार हूं। कोई माई का लाल मंदिर बनने से रोक नहीं सकता।

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