वनोपज : समर्थन मूल्य बढ़ाने और बोनस की माकपा की मांग

वनोपज : समर्थन मूल्य बढ़ाने और बोनस की माकपा की मांग

 

रायपुर। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने केन्द्र सरकार द्वारा हाल ही में लघु वनोपजों के मूल्य में 57% तक की कटौती के फैसले को वापस लेने तथा इनके समर्थन मूल्य में पिछले वर्ष की तुलना में कम-से-कम 20% वृद्धि करने की मांग की है.

 आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने घाटे के नाम पर वनोपजों के समर्थन मूल्य में कटौती के भाजपा सरकार के कदम को ‘आदिवासीविरोधी’ करार देते हुए कहा कि सरकार के इस फैसले से साफ़ है कि उसे आदिवासी जीवन की कठिनाईयों की कतई परवाह नहीं है, जो पहले ही सरकार की कृषि व किसान विरोधी नीतियों और नोटबंदी के दुष्प्रभाव के कारण संकट में हैं. उन्होंने इस बात की भी आलोचना की है कि जो सरकार पूंजीपतियों को हर साल लाखों करोड़ रुपयों का ‘कर-प्रोत्साहन’ दे रही है, उसे आदिवासियों के लिए मात्र 35 करोड़ रुपयों का घाटा सहना स्वीकार नहीं है. माकपा ने आम जनता का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचा है कि यह घाटा आदिवासी संग्राहकों के कारण नहीं, बल्कि वनोपज समितियों के कुप्रबंधन के कारण है, जिनमें भाजपाई लोगों की ही भरमार है और जो धान खरीदी की ही तरह वनोपज संग्रहण में भी सैंकड़ों करोड़ रुपयों का भ्रष्टाचार करते हैं. वास्तव में सरकार की पूरी नीतियां ही आदिवासियों व किसानों को लाभकारी मूल्य से वंचित रखने और उन्हें बाजार के भरोसे छोड़कर रखने की ही है. वनोपज के लिए जिस समर्थन मूल्य की घोषणा की गई है, उससे बिचौलियों को कौड़ियों के मोल आदिवासियों को लूटने का मौका मिल गया है.

 माकपा ने मांग की है कि बढ़ती महंगाई के मद्देनजर पिछले वर्ष के समर्थन मूल्य में 20% वृद्धि की जाए और यदि केन्द्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं होती, तो राज्य सरकार इस अंतर की भरपाई बोनस की घोषणा करके करे. इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त केवल 7 करोड़ रुपयों का बोझ और पड़ेगा.

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