जारी रहेगी सामुदायिक वनाधिकार की लड़ाई’ : महान संघर्ष समिति

 

सिंगरौली, 14 फरवरी 2017। जहां एक तरफ महान संघर्ष समिति जंगल-जमीन और सामुदायिक वनाधिकार के संरक्षण के लिये अपना मुहिम जारी रखा है वहीं दूसरी तरफ कम्पनी के प्रतिनिधि ग़लत सूचना, अफवाहें व धमकियाँ फैला रहे हैं। पिछले दो महीनों से एस्सार पावर प्लांट के ख़िलाफ़ धरने पर बैठे  विस्थापित को भी महान संघर्ष समिति ने सर्मथन दिया है।

 महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ता और अमिलिया निवासी कृपानाथ यादव कहते हैं,

“अपने महान जंगल को बचाने के लिए हमें एक लंबे संघर्ष को झेलना पड़ा है। आगे भी हम अपने अधिकार और न्याय की लड़ाई को जारी रखेंगे। ऐसे कई और गाँव हैं - खैराही, कर्सुआलाल, बंधोरा, नगवां - जहाँ से हजारों लोगों को विस्थापित किया गया है। उन्हें कानूनसम्मत अधिकार भी नहीं प्रदान किये जा रहे हैं, ना ही विस्थापितों को रोजगार दिया गया है, ऐसे में अपने हक के लिये संघर्ष कर रहे ग्रामीणों को हम अपना समर्थन देते हैं।”

Mahan Sangharsh Samitiसमिति की विज्ञप्ति में कहा गया है कि ग्रीनपीस कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई के खिलाफ चल रहे मानहानि के मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाने संबंधी खबर को कंपनी ने तोड़-मरोड़ कर रखने की कोशिश की है। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मानहानि के मुकदमे पर रोक लगाने से संबंधी याचिका पर सुनवाई करने से इंकार करते हुए कहा था कि प्रिया अपने उपर चल रहे मानहानि के केस को कानूनी तरीके से उचित मंच पर उठाने के लिये स्वतंत्र हैं। इस फ़ैसले को ठीक से समझने की बजाए, कंपनी के कुछ प्रतिनिधियों ने पत्रकार समूह में यह झूठ फैलाने की कोशिश की कि  ‘प्रिया पिल्लई इस क्षेत्र में काम ही नहीं कर सकतीं’, जो कि सरासर कोर्ट के निर्णय की गलत व्याख्या करने की कोशिश है।

 ग्रीनपीस की कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई कहती हैं,

“कंपनियों द्वारा किए जाने वाला मानहानि का मुकदमा जनता के प्रतिरोध को दबाने की कोशिश है। हम पर इस तरह का मुकदमा किया गया क्योंकि हम लगातार एस्सार द्वारा महान जंगल में प्रस्तावित कोयला खदान के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। इससे पहले भी हमे कई तरह से डराने-धमकाने की कोशिश की जाती रही है, लेकिन इससे हम डरने वाले नहीं हैं।”

Mahan Sangharsh Samitiभारत के प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार है कि वो संविधान प्रद्त अपने मूलभूत अधिकारों का इस्तेमाल करे जिसमें पूरे देश में स्वतंत्र होकर काम करने और आने-जाने का अधिकार भी शामिल है। स्थानीय लोगों के अधिकारों की मांग करना, पर्यावरण को बचाने के लिये काम करना और कानूनी प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की मांग करना एक अच्छा रास्ता है, और किसी भी तरह की धमकी की वजह से यह काम रुकने वाला नहीं है।

सिंगरौली में सामुदायिक वनाधिकार कानून का सही से पालन नहीं किया गया है। महान वन क्षेत्र में अमिलिया ग्राम पंचायत पिछले कई सालों से सामुदायिक वनाधिकार पाने के लिये संघर्षरत है। पंचायत ने सामुदायिक वनाधिकार दावे के लिये आवेदन दे दिया है, लेकिन अभी तक प्रशासन की तरफ से उसपर किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गयी है।

प्रिया कहती हैं, “स्थानीय ग्रामीणों का जंगल पर कानूनी अधिकार है, लेकिन महान वन क्षेत्र में सामुदायिक वनाधिकार को भी ठीक से लागू नहीं किया जा सका है। इसलिए हम लगातार इसके लिये आवाज़ उठाते रहेंगे, जब तक लोगों को वनाधिकार कानून के तहत सामुदायिक वनाधिकार का पट्टा दिया जाए।”

महान संघर्ष समिति द्वारा जारी संघर्ष का ही नतीजा रहा कि महान वन क्षेत्र में प्रस्तावित महान कोयला ब्लॉक को केन्द्र सरकार ने 2015 में कोयला खनन की नीलामी सूची से बाहर कर दिया। अब महान संघर्ष समिति ने मांग की है कि पावर प्लांट से विस्थापित ग्रामीणों को उनका अधिकार दिया जाए, उनके रोजगार और पुनर्वास की उचित व्यवस्था की जाए। इस बीच प्रिया अपने खिलाफ चल रहे मानहानि के केस को कोर्ट में चुनौती देती रहेगी।

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