कहाँ हैं चुनाव में आदिवासियों के सवाल  ?

लोकतंत्र के चुनावी पर्व में आदिवासियों की भुखमरी-गरीबी और भवानीपुर और कनहर जैसी उत्पीड़न की कहानियां शायद ही चुनावी मुद्दा बनें। लेकिन लोकतंत्र को बचाना है तो आदिवासियों के साथ इंसाफ तो होना ही चाहिए।...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

लोकतंत्र को बचाना है तो आदिवासियों के साथ इंसाफ तो होना ही चाहिए

 

अनिल यादव

उत्तर प्रदेश में आदिवासियों की आबादी 11 लाख से अधिक है। चुनाव होने जा रहे हैं, सभी राजनीतिक पार्टियां जातिगत आंकड़ों को साधने में एड़ी-चोटी का बल लगा दी हैं। पर इतनी बड़ी आबादी का सवाल सियासत की मुख्यधारा में नदारद है। उत्तर प्रदेश में आदिवासियों के लिए लोकसभा और विधान सभा में एक भी सीट आरक्षित नहीं है, जबकि सूबे के सोनभद्र जिले में इनकी आबादी एक-चौथाई आबादी के आस-पास है। लोकतंत्र में जहाँ बहुत सारी जातियों और समुदायों का चुनावी राजनीति के जरिये सशक्तिकरण हुआ है, वहीँ दूसरी तरफ इस चुनावी राजनीति ने एक बड़ी आबादी को हाशिये पर ढकेल दिया है जो लोकतंत्र की तरफ टकटकी लगा कर देख रही  है कि खास उसकी नज़र उसकी लाचारी -बेबसी पर भी पड़े।

अनिल यादवआजादी के सात साल बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले चुर्क में सीमेंट कारखाना की नींव रखते हुए आदिवासियों से उनके क्षेत्र के विकास का वादा किया था। इसके बाद एशिया के सबसे बड़े जलाशय रिहंद नदी पर बनाया गया, जिसकी कीमत भी आदिवासियों को चुकानी पड़ी। जिसके विस्थापन की कराह आज भी सोनांचल ने सुनी जा सकती है। जब आज सारी पार्टियों का मुद्दा विकास है तो इस बात की भी तस्दीक होनी चाहिए कि यह किसका विकास है और  इस विकास की कीमत कौन अदा कर रहा है?

सत्तर के दशक से ही आदिवासियों के साथ अनुसूचित जनजाति (उत्तर प्रदेश) कानून-1967 के जरिये  आरक्षण -आरक्षण का खेल खेला जाता रहा। इस कानून के तहत उत्तर प्रदेश की पांच आदिवासी जातियों -भोटिया, भुक्सा, जन्नसारी, राजी और थारू को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल कर दिया गया। शेष कोल, कोरबा, मझवार, उरांव, मलार, बादी, कंवर, कंवराई, गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भुनिया आदि आदिवासी जातियों को अनुसूचित जाति वर्ग में ही रहने दिया गया, जबकि इन जातियों की सामाजिक स्थिति आज भी उक्त पांचों आदिवासी जातियों के समान है।

2002 में केंद्र की राजग सरकार ने उत्तर प्रदेश की गोंड़, धुरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड़, खरवार, खैरवार, परहिया, बैगा, पंखा, पनिका, अगरिया, चेरो, भुईया, भुनिया आदिवासी जातियों को अनुसूचित जाति से अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए संसद में "अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा (सुधार) अधिनियम-2002" पेश किया, जिसे संसद ने पारित कर दिया। लेकिन इसको उत्तर प्रदेश के कुछ ही जिलों में लागू किया गया। इसका असर ग्राम पंचायत के चुनाव से लेकर विधान सभा के चुनावों तक साफ़ -साफ़ देखा जा सकता है।

लोकतंत्र के सबसे निचले पायदान पर खड़े आदिवासियों पर शासन सत्ता का जुर्म सिर्फ दंतेवाड़ा और बस्तर में ही नही हो रहा है बल्कि उत्तर प्रदेश में सोनभद्र और चंदौली दमन और उत्पीड़न के बड़े केंद्र रहे हैं। नक्सलवाद के नाम पर उत्तर प्रदेश में भी इनके खिलाफ खुलेआम फरमान जारी होते रहे कि अगर वे एक मारते हैं तो आप चार मारो।

यही पुलिसिया मनोबल मार्च 2001 में होली से ठीक एक दिन पहले सोनभद्र के भवानीपुर में खून की होली खेला, जिसमें 11 साल के कल्लू सहित 16 आदिवासी मारे गए।

उस समय की मौजूदा उत्तर प्रदेश सरकार ने दावा किया कि मारे गए लोगों में नक्सल नेता देवनाथ,लालब्रत और सुरेश भी मारे गए। जबकि मानवाधिकार संगठनों द्वारा आयोजित सभा में सुरेश बियार उपस्थित होकर साबित कर दिया कि नक्सलवाद के नाम पर भवानीपुर में निर्दोष आदिवासियों का खून बहाया गया।

ठीक इसी तरह नौगढ़ में भी  लालब्रत और देवनाथ भी एक सभा में सामने आये। 

आदिवासियों के उत्पीड़न की कहानी ख़त्म नहीं हुई है बल्कि जारी है। 2015 में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर  की जयंती पर सोनभद्र में कनहर परियोजना का विरोध कर रहे आदिवासियों लाठीचार्ज  किया गया और गोली भी चलायी गयी।

कनहर परियोजना सोनभद्र में हज़ारों आदिवासियों के गांवों को निगलने को तैयार खड़ी है। उनके लिए लड़ने वालों को विकास विरोधी और विदेशी एजेंट करार दे दिया है।

खैर लोकतंत्र के चुनावी पर्व में आदिवासियों की भुखमरी-गरीबी और भवानीपुर और कनहर जैसी उत्पीड़न की कहानियां शायद ही चुनावी मुद्दा बनें। लेकिन लोकतंत्र को बचाना है तो आदिवासियों के साथ इंसाफ तो होना ही चाहिए।   

-अनिल कुमार यादव 

गिरि विकास अध्ययन संस्थान

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