क्या ईवीएम के जरिए भी धांधली की जा सकती है?

जो सवाल मायावती और अरविंद केजरीवाल ने उठाए हैं, क्या वे महज़ हार की खीझ है, या उनमें दम भी है? अखिलेश यादव ने भी कहा है कि जब बात उठी है तो जांच होनी चाहिए।...

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राजीव रंजन श्रीवास्तव

हर-चंद एतिबार में धोके भी हैं मगर

ये तो नहीं कि किसी पे भरोसा किया न जाए

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव तो खत्म हो गए हैं, लेकिन सियासी घमासान अब तक जारी है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जब मतदान के लिए ईवीएम का इस्तेमाल प्रारंभ हुआ, तो लगा कि लोकतंत्र की निष्पक्षता और मज़बूती के लिए हम एक कदम आगे बढ़ गए हैं, लेकिन अब इसी मशीन से शिकवे-शिकायतों का दौर चल पड़ा है।

उत्तर प्रदेश में पराजय का मुंह देखने वाली बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने कहा है कि उन्हें मोदीजी ने नहीं, मशीन ने हराया है।

मायावती का आरोप है कि उत्तरप्रदेश के चुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल में धांधली से भाजपा ने चुनाव जीता है। उनके इस आरोप पर अखिलेश यादव ने भी कहा है कि जब बात उठी है तो जांच होनी चाहिए।

उधर गोवा और पंजाब में सरकार बनाने की आस लगाई आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी ऐसे ही आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि पंजाब में उनके हिस्से के वोट अकाली दल और कांग्रेस को मिल गए। केजरीवाल ने दिल्ली के आगामी नगर निगम चुनाव में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर के इस्तेमाल की मांग की और कुछ ऐसी मांग कांग्रेस की ओर से अजय माकन ने की। हालांकि इन मांगों को ख़ारिज करते हुए यह साफ़ किया गया है कि मतदान ईवीएम से ही होंगे, लेकिन विवाद का समाधान अभी होना बाकी है।

लोकतंत्र के लिए यह अनिवार्य शर्त है कि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से संपन्न हों और निर्वाचन आयोग इसके लिए लगातार कोशिश करता रहा है। चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल इसी कोशिश का नतीजा है। लेकिन अब इस पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

 क्या ईवीएम के जरिए भी धांधली की जा सकती है?

जो सवाल मायावती और अरविंद केजरीवाल ने उठाए हैं, क्या वे महज़ हार की खीझ है, या उनमें दम भी है?

भारत में चुनाव सुधार प्रणाली के तहत ईवीएम का इस्तेमाल प्रारंभ किया गया, ताकि मतदाता को यह भरोसा दिलाया जा सके कि चुनाव निष्पक्ष ढंग से संपन्न हो रहे हैं।

जब मतपत्र पेटी में डालने की प्रणाली थी, तो उसमें धांधली की शिकायतें आम थीं। राजनैतिक दलों के बूथ प्रबंधन के नाम पर कई मतदान केद्रों में दबंग लोग डरा-धमका कर अपने पक्ष में वोट डलवाया करते थे।

ईवीएम में इस तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं होगी, इन उम्मीदों के साथ इसका इस्तेमाल प्रारंभ किया गया था।

भारत में ईवीएम का पहली बार इस्तेमाल 1982 में हुआ

भारत में ईवीएम का पहली बार इस्तेमाल मई, 1982 में केरल के परूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के 50 मतदान केन्द्रों पर हुआ। 1983 के बाद इन मशीनों का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया गया कि चुनाव में वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल को वैधानिक रूप दिये जाने के लिए उच्चतम न्यायालय का आदेश जारी हुआ था।

दिसम्बर, 1988 में संसद ने इस कानून में संशोधन किया तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में धारा-61 ए जोड़ी गई जो आयोग को वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल का अधिकार देती है। संशोधित प्रावधान 15 मार्च 1989 से प्रभावी हुआ।

नवम्बर, 1998 के बाद से आम चुनाव/उप-चुनावों में प्रत्येक संसदीय तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में ईवीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है। 2004 के आम चुनाव में देश के सभी मतदान केन्द्रों पर 10.75 लाख ईवीएम के इस्तेमाल के साथ भारत में ई-लोकतंत्र आ गया और तब से सभी चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है।

ईवीएम पर पूरा भरोसा है निर्वाचन आयोग को

वैसे निर्वाचन आयोग यह नहीं मानता है कि ईवीएम के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ संभव है। आयोग ने पिछले कुछ सालों में सुप्रीम कोर्ट और देश के कई उच्च न्यायालयों के फैसलों का हवाला दिया है, जिनमें ईवीएम पर पूरा भरोसा जताया गया है। आयोग का उसका इरादा अगले लोकसभा चुनावों तक हर ईवीएम के साथ एक वीवीपैट (वोटर वैरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल) मशीन लगाने का है, जिससे चुनाव में गड़बड़ी के सारे शक-सुबहे दूर होंगे।

वीवीपैट यानी वोटर वैरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल एक प्रिंटर मशीन है, जो ईवीएम की बैलेट यूनिट से जुड़ी होती है। ये मशीन बैलेट यूनिट के साथ उस कक्ष में रखी जाती है, जहां मतदाता गुप्त मतदान करने जाते हैं।

वोटिंग के समय वीवीपैट से एक पर्ची निकलती है, जिसमें उस पार्टी और उम्मीदवार की जानकारी होती है, जिसे मतदाता ने वोट डाला।

वोटिंग के लिए ईवीएम का बटन दबाने के साथ वीवीपैट पर एक पारदर्शी खिड़की के ज़रिये मतदाता को पता चल जाता है कि उसका वोट संबंधित उम्मीदवार को चला गया है। मतगणना के वक्त अगर कोई विवाद हो, तो वीवीपैट बॉक्स की पर्चियां गिनकर ईवीएम के नतीजों से मिलान किया जा सकता है। फिलहाल हर बूथ पर वीवीपैट मशीन की सुविधा नहीं है और इसके लिए आयोग को 3174 करोड़ रुपये चाहिए। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से चरणबद्ध तरीके से हर ईवीएम के साथ वीवीपैट जोडऩे को कहा है।

चुनाव आयोग का कहना है कि वीवीपैट के लिए केंद्र सरकार से लगातार रकम की मांग की जा रही है और अगर पूरा पैसा मिल जाए तो 30 महीने के अंदर पर्याप्त वीवीपैट मशीन आ जाएंगी।

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