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असम में एनआरसी : मानवता पर हमला (भाग-2)

कालेजों और स्कूलों के अध्यापकों को एनआरसी के काम में तैनात किया गया है परंतु उनके स्थान पर अन्य शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जा रही है. इससे पूरे प्रदेश में शिक्षण कार्य चरमरा गया है.

मुसलमान साबित करना चाहते हैं अपनी नागरिकता Muslims want to prove their citizenship

जिन लोगों को एनआरसी में शामिल नहीं किया गया है, उनमें से अधिकांश मुसलमान हैं. वे उन पर चस्पा किए जा रहे ‘विदेशी’ और ‘बांग्लादेशी’ के लेबिल से निजात पाने के लिए बैचेन हैं. वे साबित करना चाहते हैं कि वे देश के वैध नागरिक हैं ताकि रोजाना की जिंदगी में उन्हें परेशानियां न भोगनी पड़ें.

Everything you want to know about the NRC

यद्यपि एनआरसी की प्रक्रिया (Process of NRC) से उन्हें अनेक शिकायतें हैं परंतु वे उसका सामना करने के लिए कटिबद्ध हैं ताकि वे उन पर लगे दाग को हमेशा के लिए मिटा सकें. अपनी नागरिकता खो देने का खतरा उनके सिर पर मंडरा रहा है. समुदाय के सदस्य आवश्यक दस्तावेज जुटाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं.

हुसैन अहमद मदनी ने दल को बताया कि एक मुस्लिम परिवार को पांच अलग-अलग सुनवाई केन्द्रों में उपस्थित होना पड़ा, परंतु फिर भी उसने हार नहीं मानी और प्रक्रिया पूरी की.

जैसा कि पहले बताया जा चुका है एनआरसी की प्रक्रिया में कई खामियां (Flaws in NRC process) हैं और वह काफी हद तक मनमानी एवं एकपक्षीय भी है. परंतु असम के लोगों, विशेषकर मुसलमानों, को उस पर भरोसा है. चूंकि यह प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय की निगरानी में चल रही है इसलिए लोगों को उम्मीद है कि वह निष्पक्ष और व्यवस्थित होगी.

अपनी सारी कमियों के बावजूद एनआरसी की प्रक्रिया लोगों को यह मौका देती है कि वे अपनी नागरिकता साबित करें. अधिकारी कम से कम कुछ नियमों का पालन कर रहे हैं और अपील की व्यवस्था भी है. परंतु विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों की प्रक्रिया पूर्णतः मनमानी है. यद्यपि ये न्यायाधिकरण सन् 1964 से अस्तित्व में हैं परंतु इनके काम करने का तरीका अजीब और मनमाना है. यह सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी मोहम्मद सनाउल्ला, जिन्होंने कारगिल युद्ध में भी हिस्सा लिया था, की गिरफ्तारी से जाहिर है.

विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों का गठन (constitution of foreigners person tribunals in india) विदेशी व्यक्ति (न्यायाधिकरण) आदेश 1964 के तहत किया गया था. असम में बरसों से विदेशियों की पहचान की यह समानांतर प्रक्रिया चल रही है. बार्डर पुलिस, मामलों की जांच कर उन्हें विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों के समक्ष प्रस्तुत करती है.

ये न्यायाधिकरण, अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983 के अंतर्गत स्थापित किए गए हैं. यद्यपि इस अधिनियम को उच्चतम न्यायालय ने सन् 2005 में असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया था तथापि ये न्यायाधिकरण अब भी काम कर रहे हैं. वे अर्धन्यायिक संस्थाएं हैं जो सन् 1964 के विदेशी व्यक्ति अधिनियम के तहत नागरिकता का निर्धारण करती हैं.

अगर बार्डर पुलिस को किसी व्यक्ति के भारत का नागरिक होने पर संदेह होता है तो वह उस मामले को न्यायाधिकरणों को सौंप देती है.

अगर न्यायाधिकरण किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित कर देता है तो उसे नजरबंदी शिविर में भेज दिया जाता है. इन नजरबंदी शिविरों में हालात बहुत खराब हैं. वे शिविर न होकर जेल हैं. वहां नजरबंद लोगों की इलाज के अभाव में मौत की खबरें आती रहती हैं. इसके अतिरिक्त, वहां रहने वाले कई लोग आत्महत्या भी कर चुके हैं क्योंकि उन्हें यह पता होता है कि विदेशी घोषित कर दिए जाने के बाद उन्हें अपना शेष जीवन अपने परिजनों से दूर नजरबंदी शिविरों में बिताना होगा.

सरकार ने नजरबंदी शिविरों और विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया है. ऐसा लगता है कि यह निर्णय इसलिए लिया गया है क्योंकि एनआरसी में बड़ी संख्या में लोगों के नाम शामिल न किए जाने की संभावना है. ऐसे व्यक्तियों को विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों के समक्ष एनआरसी के प्रकाशन के 60 दिनों के भीतर अपील करने का अधिकार होगा. अगर वे ऐसा नहीं करते तो सरकार उनके मामलों को विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों के समक्ष प्रस्तुत कर देगी. असम के लोगों की इन न्यायाधिकरणों में तनिक भी आस्था नहीं है।

विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों के साथ निम्न समस्याएं (Problems with foreigners person tribunals) हैं

  • पुलिस की भूमिका

बार्डर पुलिस, संदिग्ध व्यक्तियों के खिलाफ प्रकरण दायर करती है. टीम को बताया गया कि पुलिस, मनमाने ढंग से भारतीय नागरिकों को विदेशी बताकर उनके खिलाफ प्रकरण दायर कर देती है. पुलिस पर यह राजनैतिक दबाव भी है कि वह अधिक  से अधिक लोगों को विदेशी घोषित करे।

  • नोटिस की तामीली

किसी भी सुनवाई को तभी निष्पक्ष कहा जा सकता है जब आरोपी  को उचित ढंग से नोटिस दिया जाए, उसे बताया जाए कि उसके विरूद्ध क्या आरोप हैं और उनकी सुनवाई कब और कहां होगी. परंतु अधिकांश मामलों में नोटिस, आरोपी  के पते पर नहीं पहुंचाया जाता. इसकी बजाए उसे गांव के चौक या किसी अन्य आवाजाही वाले स्थान पर चस्पा कर दिया जाता है.

कई मामलों में आरोपी को यह पता ही नहीं होता कि उसके नाम नोटिस जारी हुआ है. नोटिस जारी होने के बाद, आरोपी के लिए न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित होना अनिवार्य होता है. अगर वह ऐसा नहीं करता तो न्यायाधिकरण, एकपक्षीय कार्यवाही कर उसे विदेशी घोषित कर देता है.

कई बार न्यायाधिकरण नोटिस तामील करने की जिम्मेदारी पुलिस को ही दे देते हैं और पुलिस तो यह चाहती ही है कि संबधित व्यक्ति को विदेशी घोषित कर दिया जाए.

अधिकांश लोगों को उनके विदेशी घोषित कर दिए जाने की जानकारी तब मिलती है जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आती है.

  • न्यायाधिकरणों की संरचना और कार्यप्रणाली

न्यायाधिकरण अर्ध-न्यायिक संस्था हैं. उच्च न्यायालय इन न्यायाधिकरणों में युवा और अनुभवहीन वकीलों को दो साल की अवधि के लिए संविदा के आधार पर नियुक्त करता है. इस संविदा की अवधि, अधिकारी के ‘कार्य निष्पादन’ के आधार पर बढ़ाई जा सकती है. अलिखित संदेश यही होता है कि ‘कार्य निष्पादन’ का आंकलन इस आधार पर किया जाएगा कि संबंधित अधिकारी ने कितने लोगों को विदेशी घोषित किया. इन वकीलों में से अधिकांश आल असम स्टूडेंटस यूनियन के सदस्य होते हैं जिसका तथाकथित विदेशियों के प्रति पूर्वाग्रह जगजाहिर है.

इस तरह, न्यायाधिकरणों में निश्चित कार्यकाल वाले कानून के अनुभवी जानकार नहीं होते. न्यायाधिकरणों को प्रकरणों के शीघ्र निपटारे के लिए प्रक्रिया का निर्धारण करने का अधिकार है. इनमें से कई अधिकारी, मुसलमानों और बंगाली हिन्दुओं के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त रहते हैं. कई बार किसी व्यक्ति को मात्र इसलिए विदेशी घोषित कर दिया जाता है क्योंकि उसका नाम मुस्लिम या बंगाली लगता है या उसका पहनावा और तौर-तरीका बंगालियों या मुसलमानों जैसा होता है. उन्हें अपना बचाव करने का मौका ही नहीं दिया जाता.यह प्राकृतिक न्याय के खिलाफ  और स्थापित विधिक सिद्धांतों का मखौल है.

क्या एनआरसी से बाहर कर दिए गए लोग विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरणों से उम्मीद रख सकते हैं?

जिन लोगों के नाम एनआरसी की अंतिम सूची में शामिल नहीं होंगे, उन्हें 60 दिनों की अवधि में न्यायाधिकरण में अपील करने का अधिकार होगा. अगर वे ऐसा नहीं करते तो राज्य स्वयं उनके प्रकरणों को न्यायाधिकरणों को अग्रेषित कर देगा. असम के नागरिकों को इन न्यायाधिकरणों से कोई उम्मीद नहीं है. उन्हें नहीं लगता कि पूर्वाग्रहों के चलते ये न्यायाधिकरण उनके साथ न्याय करेंगे.

वकील और सामाजिक कार्यकर्ता खद्दाम हुसैन का मानना है कि न्यायाधिकरण, अधिकांश अपीलकर्ताओं को विदेशी घोषित कर देंगे, जैसा कि वे अब तक करते आ रहे हैं.

हुसैन को अंदेशा है कि एनआरसी की अंतिम सूची (NRC final list) में प्रदेश के कम से कम 50 लाख रहवासियों के नाम शामिल नहीं होंगे. अगर कोई व्यक्ति न्यायाधिकरण के निर्णय से संतुष्ट नहीं है तो वह उच्च न्यायालय मे अपील कर सकता है. परंतु इस मामले में उच्च न्यायालय के सीमित अधिकार हैं. वह केवल अपने रिट क्षेत्राधिकार के अधीन न्यायाधिकरण को उत्प्रेषणादेश जारी कर सकता है. इसका अर्थ यह है कि वह न्यायाधिकरण को केवल उन स्थितियों में अपने निर्णय में सुधार करने का आदेश दे सकता है जिनमें न्यायाधिकरण ने बिना क्षेत्राधिकार के या क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर निर्णय किया हो या क्षेत्राधिकार का गैर-कानूनी प्रयोग किया हो या विभिन्न पक्षों को सुने बिना निर्णय किया हो या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया हो. उत्प्रेषणादेश क्षेत्राधिकार केवल पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार है. यह अपीलीय क्षेत्राधिकार नहीं है, जिसमें तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन कर उच्च न्यायालय, न्यायाधिकरणों के निर्णयों की समीक्षा कर सके. अतः न्यायाधिकरण द्वारा किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित कर देने के बाद उसके सामने कोई रास्ता नहीं रह जाएगा.

‘विदेशियों’ का क्या होगा? What will happen to ‘foreigners’?

न तो सरकार और ना ही उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि जिन व्यक्तियों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं होंगे और जिन्हें बाद में विदेशी घोषित कर दिया जाएगा उनका क्या होगा?

इस संदर्भ में यह बहुत डरावना है कि राज्य सरकार ने नए नजरबंदी शिविरों के निर्माण का आदेश दिया है. इन विदेशियों  को देश से निर्वासित करने की कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि भारत सरकार की बांग्लादेश, जहां से ‘विदेशियों’ के असम में आने का दावा किया जाता है, के साथ इस तरह की संधि नहीं है.

इसका अर्थ यह होगा कि इन लोगों को अनिश्चित काल तक नजरबंदी शिविरों, जो कि दरअसल जेल हैं, में रखा जाएगा और लाखों लोगों को, जिनमें से अधिकांश निर्दोष भारतीय नागरिक होंगे, उनके मूल अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा.

भाजपा सरकार जिस नागरिकता संशोधन विधेयक (citizenship amendment bill 2019) को पारित करने पर जोर दे रही है, उसमें मुसलमानों को छोड़कर अन्य सभी धर्मों के लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है. इसका अर्थ यह होगा कि धर्म, नागरिकता के निर्धारण का आधार होगा. नागरिकता से जुड़े मुद्दों जैसे एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक का इस्तेमाल, सत्ताधारी दल द्वारा समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने और चुनावी लाभ प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है. इस राजनैतिक खेल के शिकार बनेंगे लाखों भारतीय, जो अपने ही देश में अकारण अपना पूरा जीवन जेल में काटने पर मजबूर होंगे।

दल की सिफारिशें

  • आखिरी दिन दायर की गई आपत्तियां स्पष्ट रूप से राजनीति से प्रेरित और आधारहीन थीं. जिन आपत्तियों में आपत्तिकर्ता का नाम, पता आदि उपलब्ध नहीं है उन्हें तुरंत खारिज कर दिया जाना चाहिए. जिन मामलों में आपत्तिकर्ता सुनवाईयों में उपस्थित नहीं होते उनमें संबंधित व्यक्ति का नाम एनआरसी में स्वमेव शामिल कर लिया जाना चाहिए.
  • नागरिकता संशोधन विधेयक, भारत की धर्मनिरपेक्षता की नीति से मेल नहीं खाता. वह मुसलमानों को छोड़कर अन्य धर्मों के अनुयायियों को विशेषाधिकार देता है.इसे तुरंत वापिस लिया जाना चाहिए.
  • नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले गरीब श्रमिकों और आदिवासियों को एनआरसी में अपना नाम शामिल करवाने के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करने की अनिवार्यता से मुक्त किया जाना चाहिए. आदिवासियों में भूमि पर सामूहिक स्वामित्व की परंपरा चली आ रही है और उनके पास जमीन के स्वामित्व संबंधी दस्तावेज नहीं होते.चूंकि राज्य के सभी इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और स्कूल नहीं हैं इसलिए उनके लिए जन्म प्रमाणपत्र या स्कूल प्रमाणपत्र हासिल करना संभव नहीं होता।
  • राज्य में कोई नजरबंदी शिविर (detention camps in assam) नहीं होना चाहिए. तथाकथित विदेशियों को अपने परिवारों के साथ रहने की इजाजत दी जानी चाहिए. उन्हें वर्क परमिट जारी किए जाने चाहिए ताकि वे सामान्य जिंदगी जी सकें.
  • विदेशी व्यक्ति न्यायाधिकरण उन व्यक्तियों के लिए अपीलीय फोरम होंगे जिनके नाम एनआरसी की अंतिम सूची में शामिल नहीं किए जाएंगे. इन न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली को सुसंगत और व्यवस्थित बनाया जाना चाहिए ताकि निष्पक्ष सुनवाई और न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

निष्कर्ष

असम में नागरिकता का मसला (Citizenship problem in Assam) लंबे समय से विवादित बना हुआ है. इसके पीछे है दूसरे प्रदेशों के लोगों का वहां आकर बसना, देश का विभाजन और साम्प्रदायिकता, विदेशियों से घृणा और ‘अन्यों’ के प्रति नफरत का भाव. एनआरसी (national register of citizens) से यह टकराव और विवाद समाप्त नहीं होगा. जब तक नफरत जिंदा रहेगी तब तक मुसलमानों को नागरिकता विहीन करने और उनके अमानवीकरण की प्रक्रिया जारी रहेगी. दसियों लाख नागरिकों को उस देश का नागरिक होने का प्रमाण देने के लिए मजबूर करना, जिस देश में वे जन्म से रह रहे हैं और जिसे वे अपना मानते हैं, क्रूरता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है.

स्वतंत्र भारत की व्यवस्था का नियामक भारतीय संविधान है जो धर्मनिरपेक्ष है और सभी नागरिकों को देश में कहीं भी बसने और काम करने का अधिकार देता है. भारत अपने सभी नागरिकों का है और उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं. इसी तरह, आदिवासियों को उनकी पहचान और सांस्कृतिक विरासत और रोजी-रोटी से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.

धर्म को नागरिकता के निर्धारण का आधार मानना अत्यंत खतरनाक है जो भारत की धर्मनिरपेक्ष और बहुवादी नींव पर घातक प्रहार करता है.

-सीएसएसएस तथ्यांवेषण टीम

(…पिछले अंक से जारी)

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

असम में एनआरसी : मानवता पर हमला… 25 लाख हिंदुओं पर विदेशी ठहराए जाने का खतरा

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