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Lalit Surjan ललित सुरजन। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं। देशबन्धु के प्रधान संपादक
Lalit Surjan ललित सुरजन। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं। देशबन्धु के प्रधान संपादक

‘न्याय’ : भाजपा की शंका के मुकाबले कांग्रेस के वायदे पर एतबार क्यों है ?

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‘न्याय’ : भाजपा की शंका के मुकाबले कांग्रेस के वायदे पर एतबार क्यों है ?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (Congress President Rahul Gandhi) ने न्यूनतम आय योजना (Minimum income plan) अर्थात ‘न्याय‘ लागू करने की बात क्या कही, इस चुनावी माहौल में खलबली मच गई। पक्ष और विपक्ष ही नहीं, दूर किनारे पर बैठे लोग भी अपनी-अपनी तरह से विश्लेषण करने में जुट गए हैं कि आखिरकार यह योजना क्या है, कैसे लागू होगी, मतदाताओं के बीच इसका क्या प्रभाव पड़ेगा और अंतत: देश के सर्वहारा को इसका लाभ किस तरह पहुंचेगा! ऐसी ही कुछ खलबली नवंबर 2018 में पैदा हुई थी जब राहुल गांधी ने विधानसभा चुनावों के दौरान छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) की धरती से किसानों की कर्जमाफी (Farmers’ debt waiver) का ही ऐलान नहीं किया था, बल्कि धान, सोयाबीन, तेंदूपत्ता आदि उत्पादों का न्यूनतम मूल्य भी एक लुभावनी सीमा तक बढ़ा देने का वायदा किया था। तब भी भाजपा और उसके समर्थकों ने अविश्वास जताया था कि ऐसा नहीं हो पाएगा। तब के नतीजों ने सिद्ध किया था कि मतदाताओं ने भाजपा की शंका के मुकाबले कांग्रेस के वायदे पर एतबार किया।

 

विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद भाजपा कार्यकर्ता छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में किसी कदर सदमे में आ गए। वे अपनी हार स्वीकार करने मानो तैयार ही नहीं थे। उन्होंने तब नवगठित कांग्रेसी सरकारों पर सवाल उठाना शुरू किया कि वे न तो किसानों का कर्ज माफ करेंगे, न समर्थन मूल्य दे पाएंगे, न धान का बोनस देंगे और न बिजली बिल आधा कर पाएंगे। कांग्रेस ने इन आशंकाओं को समय रहते निराधार और निर्मूल सिद्ध किया, जहां उसने अपने अधिकतम वायदे घोषित समय सीमा के भीतर पूरे कर दिए। लेकिन प्रतीत होता है कि भाजपा पराजय की मानसिकता से अभी तक उबर नहीं पाई है। उसने राहुल गांधी की इस नई घोषणा पर सवाल उठाना शुरू कर दिए हैं। इसकी एक वजह भाजपा के मन का चोर भी हो सकता है कि 2014 में उसने जो वायदे किए थे उनमें से अधिकतर का पालन नहीं हुआ और वे जुमले सिद्ध हुए। याद रहे कि वायदे को जुमले का पर्याय कांग्रेस या अन्य किसी विपक्षी दल ने नहीं, बल्कि स्वयं भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने निरूपित किया था।

न्यायक्या है?

बहरहाल यह समझने की कोशिश करें कि यह न्यूनतम आय योजना याने ‘न्याय’ क्या है? यहां उल्लेख करना आवश्यक होगा कि राहुल गांधी ने इतनी बड़ी घोषणा बिना सोचे-विचारे नहीं की है। उन्होंने इसके लिए थॉमस पिकेटी, पॉल क्रुगमेन और रघुराम राजन जैसे विश्वविख्यात अर्थशास्त्रियों से लंबे समय तक विचार-विमर्श किया था। यहां मुझे मनरेगा का ध्यान आता है। यूपीए-1 के दौरान ग्रामीण इलाकों में न्यूनतम रोजगार गारंटी (Minimum employment guarantee) की यह योजना भी जाने-माने सामाजिक अध्येत्ताओं से सलाह लेने के बाद ही लागू की गई थी। दूसरी ओर विमुद्रीकरण (Demonetization) याने नोटबंदी और जीएसटी के उदाहरण हमारे सामने है जिन्हें मोदी सरकार ने बिना सोचे-समझे लागू किया और जिनका खामियाजा आज भी देश की जनता को उठाना पड़ रहा है। जीएसटी को लेकर तो मोदी-जेटली टीम ने जिस तरह बार-बार अपने निर्णयों में संशोधन किए हैं वह हैरतअंगेज है।

न्यूनतम आय योजना (Minimum income plan) में यह कल्पना की गई है कि देश के बीस प्रतिशत सबसे गरीब लगभग पांच करोड़ परिवारों को प्रतिमाह बारह हजार रुपया या साल में एक लाख चवालीस हजार रुपया आमदनी होना चाहिए। यह अनुमान लगाया गया था कि एक परिवार में औसतन पांच सदस्यों के हिसाब से कोई पच्चीस करोड़ लोग लाभान्वित होंगे। इस योजना के पीछे राहुल गांधी का अनुमान है कि वर्तमान में सर्वाधिक गरीब परिवार की मासिक न्यूनतम आय छह हजार है जबकि अधिकतम सीमा शायद दस हजार या ग्यारह हजार भी हो सकती है। ‘न्याय’ के तहत जिस परिवार की मासिक छह हजार रुपए है उसे अतिरिक्त छह हजार रुपए, इस तरह साल में 72 हजार रुपए सरकार की ओर से दिए जाएंगे। इस क्रम में जिनकी आय आठ हजार होगी उसे चार हजार मिलेगा। कुल मिलाकर साल में तीन लाख करोड़ का अतिरिक्त व्यय सरकार को वहन करना होगा।

प्रश्न उठता है कि यह अतिरिक्त तीन लाख करोड़ रुपया कहां से आएगा?

विशेषज्ञों ने हिसाब लगाया है कि यह राशि सालाना बजट की लगभग तेरह प्रतिशत होती है अर्थात बोझ काफी बड़ा है। अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि हितग्राहियों की पहचान कैसे की जाएगी। मैं समझता हूं कि इन बारीक मुद्दों पर राहुल गांधी ने विचार किया होगा जिनका खुलासा आगे चलकर होगा।

इस चुनावी माहौल में अकादमिक चर्चा की गुंजाइश नहीं है और न आंकड़े समझाने का वक्त है। फिर भी एक-दो दृष्टांतों से मामला समझा जा सकता है। यूपीए-1 में किसानों के सत्तर हजार करोड़ के ऋण एक बार माफ किए गए। उस समय की दृष्टि से वह भी एक बड़ी रकम थी। फिर मनरेगा आदि के लिए भी तो प्रावधान किया ही गया था। और हम यह न भूलें कि कुछ समय पहले ही तेलंगाना, ओडिशा और स्वयं मोदी सरकार ने लगभग इसी तरह से निर्धन परिवारों के लिए नकद राहत की योजनाएं लागू की हैं।

मैं जितना समझता हूं उस दृष्टि से तीन लाख करोड़ सालाना की व्यवस्था करना असंभव तो बिल्कुल नहीं है। उसे जितना कठिन बताया जा रहा है वह उतनी कठिन भी नहीं है।

‘न्याय’ लागू करने के लिए कई तरीकों से धनराशि जुटाई जा सकती है जिसमें दो का उल्लेख करना चाहूंगा। एक तो जिस तरह से उद्योग-व्यापार को अंधाधुंध तरीके से कर्ज दिए गए जिनकी वसूली मोदी के होते हुए नामुमकिन हो गई उसे कड़ाई से रोकना होगा। राष्ट्रीयकृत बैंकों का राजनीतिकरण न कर उन्हें स्वायत्तता देना होगी, बैंक मैनेजरों के अधिकार बढ़ाना होंगे ताकि वे बिना किसी दबाव के स्वविवेक से निर्णय ले सकें। ऐसा करने से बैंकों द्वारा दिए गए ऋणों की अदायगी बड़ी हद तक सुनिश्चित हो सकेगी। इस उद्देश्य को पाने के लिए बैंकों के निजीकरण और बैंकों के विलय जैसे प्रतिगामी निर्णय लेने से भी सरकार को बचना होगा।

इसके साथ-साथ सरकार को फिजूलखर्ची पर रोक लगाना पड़ेगी। हम कहना चाहेंगे कि अनेक राज्यों में कांग्रेस की सरकारें भी अतीत में इस दुर्गुण से मुक्त नहीं रह सकी हैं। एक समय मध्यप्रदेश में हमने देखा है कि कांग्रेस सरकार ने अपने चहेते उद्योगपतियों और व्यापारियों को किस तरह से बिना सही-गलत की परख किए लाभ पहुंचाए थे। राहुल गांधी के सामने यह चुनौती अवश्य होगी कि क्या वे अपनी टीम के सदस्यों को मनमानी करने से रोक पाएंगे? हम जब फिजूलखर्ची की बात करते हैं तो छत्तीसगढ़ में ही हाल के वर्षों में की गई सरकारी पैसों की बर्बादी दिखने लगती है और आज भी वह किसी सीमा तक जारी है। इसके लिए अकेले छत्तीसगढ़ को ही क्या दोष दें? हर प्रदेश में लगभग यही हाल है। फिर भी कुछ उदाहरण यहां गिनाए जा सकते हैं।

यदि छत्तीसगढ़ में नया रायपुर के नाम से नई राजधानी का निर्माण नहीं होता तो क्या प्रशासन का भठ्ठा बैठ जाता? और क्या यही गलती आंध्रप्रदेश में चंद्राबाबू नायडू नहीं कर रहे हैं?

एक दूसरा उदाहरण सारे देश में बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने का है। सब जानते हैं कि इन क्रीड़ा परिसरों में खेलों का आयोजन भूले-बिसरे ही होता है। ज्यादातर समय धार्मिक प्रवचनों के काम आते हैं। इसी सिलसिले में रायपुर के स्काईवाक की एक बार फिर याद आ जाना स्वाभाविक है। मैं यह भी समझना चाहूंगा कि जब सड़कों का निर्माण निजी कंपनियों द्वारा टोल- टैक्स के आधार पर किया जा रहा है तो फिर पीडब्ल्यूडी या लोक निर्माण विभाग की क्या आवश्यकता है? ऐसे सैकड़ों उदाहरण पेश किए जा सकते हैं। मतलब यह कि फिजूलखर्ची रोक लीजिए। लोक कल्याण के लिए धनराशि की कोई कमी नहीं होगी।

मेरी राय में न्यूनतम आय योजना एक व्यवहारिक कल्पनाशील योजना है जिससे देश में सिर्फ गरीबों को लाभ नहीं मिलेगा बल्कि कुल मिलाकर आर्थिक गतिविधियों का विस्तार होगा जिसका लाभ अंतत: सबको मिलेगा।

ललित सुरजन

(देशबन्धु)

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About ललित सुरजन

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं. वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सद्भाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है. यह आलेख देशबन्धु से साभार लिया गया है।

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