अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल – शिक्षा क्षेत्रे, कुरुक्षेत्रे!

यह अगर संयोग भी था, तब भी बहुत अर्थपूर्ण संयोग था। आइ आइ टी-मद्रास में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल की मान्यता खत्म किए जाने का विवाद, ऐन मोदी सरकार की सालगिरह की पूर्व-संध्या में फूटा। इसका नतीजा यह हुआ कि सालगिरह के आयोजनों के बीच भी मोदी सरकार को इसकी दोमुंही सफाइयां देनी पड़ रही थीं कि छात्रों के उक्त स्वतंत्र निकाय की गतिविधियों पर रोक लगाने का फैसला तो गलत नहीं था, पर यह संबंधित संस्थान के प्रशासन का अपना फैसला था। इस फैसले के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय और इसलिए मोदी सरकार पर कोई जिम्मेदारी नहीं आती है। यह दूसरी बात है कि इस सफाई पर कोई विश्वास करने के लिए तैयार नहीं था। इसकी सीधी सी वजह यह है कि आइ आइ टी परिसर में छात्रों के बीच चर्चा व बहस-मुबाहिसा आयोजित करने वाले उक्त निकाय के खिलाफ कार्रवाई, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव के स्तर के अधिकारी द्वारा आइ आइ टी-एम को जरूरी कार्रवाई का इशारा किए जाने पर ही हुई थी।
       और जैसाकि देश में मोदी के और शिक्षा मंत्रालय में स्मृति ईरानी के राज में नियम ही बन गया है, मंत्रालय को हरकत में लाने के लिए एक गुमनाम, किंतु वास्तव में संघ परिवार से जुड़े लोगों की ओर से भेजी एक चिट्ठी ही काफी साबित हुई। याद रहे कि इससे पहले ऐसी ही एक चिट्ठी के आधार पर शिक्षा मंत्रालय ने आइ आइ टी तथा आइ आइ एम जैसे संस्थानों में अलग-अलग शाकाहारी तथा मांसाहारी मैसों की व्यवस्था करीब-करीब थोप ही दी थी। ताजा चिट्ठी में उक्त स्टडी ग्रुप पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति व जनजाति के छात्रों को मोदी सरकार तथा उसकी नीतियों से ‘‘विमुख’’ करने और हिंदुओं व सरकार के खिलाफ ‘‘घृणा’’ फैलाने का आरोप लगाया गया था। उक्त चिट्ठी के साथ चूंकि अंबेडकर के जन्म दिन के मौके पर आयोजित कार्यक्रम के सिलसिले में स्टडी सर्किल द्वारा प्रकाशित किए गए एक पर्चे की प्रति लगायी गयी थी, शिक्षा मंत्रालय को आइ आइ टी-एम को उसके खिलाफ कार्रवाई का इशारा करने से पहले और कोई पूछ-ताछ करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। और आइ आइ टी-एम प्रबंधन को शिक्षा मंत्रालय की चिट्ठी मिलने के बाद किसी पूछताछ की जरूरत महसूस होती भी तो कैसे?
       बेशक, इस मामले के तूल पकडऩे के बाद और खासतौर पर गलत मौके पर तूल पकड़ऩे के बाद, खुद शिक्षा मंत्री समेत उनके मंत्रालय ने इस कार्रवाई की बदनामी से पीछा छुड़ाने की कोशिश में, बार-बार संबंधित संस्थान की स्वायत्तता की दुहाई दी है। लेकिन, इससे ज्यादा हास्यास्पद बात दूसरी नहीं हो सकती है। आइ आइ टी ओैर आइ आइ एम जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की प्रोफेशनल संस्थाओं को अपनी सारी प्रतिष्ठा के बावजूद, हमेशा से ही कम से कम विश्वविद्यालयों की तुलना में बहुत ही कम स्वायत्तता हासिल रही है। फिर भी, अपनी प्रतिष्ठा की दुहाई के बल पर इन संस्थानों ने पिछले दशकों में जो थोड़ी-बहुत स्वायत्तता अर्जित भी कर ली थी, मौजूदा शिक्षा मंत्री के राज में उसे भी छीना जा रहा है बल्कि छीना जा चुका है। इसके प्रमाण के तौर पर आइ आइ टी मुंबई से जाने-माने नाभिकीय वैज्ञानिक अनिल काकोदकर और इससे पहले दिल्ली आइ आइ टी में एक अन्य वरिष्ठ प्रोफेसर रघुनाथ शेवगांवकर के ईरानी के नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय के व्यवहार से परेशान होकर इस्तीफा देने को याद किया जा सकता है।
       जनतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न संस्थाओं को हासिल स्वायत्तताओं से और खासतौर पर शिक्षा, शोध, संस्कृति और मीडिया की भी संस्थाओं की स्वायत्तता से तो संघ परिवार का हमेशा से चूहे-बिल्ली का बैर रहा है। वास्तव में ऐसी सभी संस्थाओं के प्रति संघ का और उसके द्वारा नियंत्रित सरकार का रुख हमेशा से, येन-केन प्रकारेण इन संस्थाओं में अपने ज्यादा से ज्यादा लोग भरकर, उन्हें अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए जोतने का ही रहा है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का वैधानिक अपहरण इसका जीता-जागता उदारहण है। देश में इतिहास के लेखन, संकलन, शोध के इस प्रमुख संस्थान पर, संघ के प्रति वफादार अध्यक्ष बैठाए जाने तथा कार्यकारिणी में बड़ी संख्या में संघ से जुड़े लोगों के ठूंसे जाने के बाद, इस शोध संस्था की प्रथमिकताएं ही बदली जा चुकी हैं। ‘‘प्राचीन का गौरव स्थापन’’ अब इस संस्थान की सर्वोच्च प्राथमिकता है, जिसमें जाति-वर्ण व्यवस्था से लेकर, स्त्री-अधिकारहीनता तक का गौरव-स्थापन/ औचित्य सिद्घ करना शामिल है। अचरज नहीं कि इस संस्थान के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के प्रकाशन के जाने-माने इतिहासकार संपादक के खदेड़े जाने के बाद, सलाहकार संपादक मंडल को ही खत्म कर, इस अकादमिक प्रकाशन को अनेक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के इतिहासकारों के परामर्श से भी ‘‘मुक्त’’ कराया जा चुका है।
       शोध और संस्कृति की दूसरी अधिकांश संस्थाओं का भी ऐसा ही किस्सा है। पिछले कुछ अर्से से विश्वविद्यालयों की और खासतौर पर केंद्रीय विश्वविद्यालयों की बची-खुची स्वायत्तता खासतौर पर निशाने पर है। इसके खास हथियार के तौर पर केंद्रीय विश्वविद्यालयों को मानकीकरण के नाम पर, इस कदर पाटा चलाकर एकसार करने की कोशिश की जा रही है, जिससे विश्वविद्यालयों के  बीच, पाठ्यक्रमों के बीच, शुरूआत में छात्रों की तथा आगे चलकर फैकल्टी की और अंतत: वाइस चांसलरों की भी, अदला-बदली का रास्ता साफ हो जाए। जाहिर है कि विश्वविद्यालय की इस परिकल्पना में, स्वायत्तता की दूर-दूर तक कोई गुंजाइश ही नहीं है। कुछ लोगों को लग सकता है कि शिक्षा व्यवस्था की ऐसी स्वायत्तताहीन परिकल्पना, शिक्षा के जरिए देश व श्रम शक्ति के प्रौद्योगिकीय उन्नयन के, मौजूदा सरकार के लक्ष्य को काटती है। लेकिन, वास्तव में ऐसा है नहीं। सचाई यह है कि मोदी सरकार की शिक्षा की पूरी परिकल्पना ही बड़े भोंडे तरीके से उपयोगितावादी है, जहां शिक्षा की जरूरत मुख्यत: श्रमिकों के रूप में (जिसमें शारीरिक तथा बौद्धिक, दोनों तरह के श्रमिक शामिल हैं) उत्पादकता बढ़ाने के लिए, प्रौद्योगिकी का ज्ञान या प्रशिक्षण बढ़ाने पर है। वास्तव में मोदी राज की ‘‘विकास’’ की परिकल्पना के लिए, आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रशिक्षण भर काफी है। शिक्षा की शेष भूमिका, चाहे वह मावनीय मूल्यों का विकास हो या मानवता द्वारा अपने विकास के क्रम में अर्जित की गयी न्याय, समानता आदि की परिकल्पनाओं को यथार्थ में बदलने का आग्रह हो या फिर अपनी दुनिया का और ज्ञान अर्जित करना, वह तो अंतत: विकास की मौजूदा निजाम की असमानता और बढ़ाने वाली परिकल्पना के खिलाफ ही जाती है। अचरज नहीं और वास्तव में इसमें कोई संयोग नहीं है कि मोदी सरकार की सालगिरह के मौके पर ही, आर्गनाइजर  के एक पूरे विशेषांक के जरिए, आर एस एस ने शिक्षा के ‘‘भारतीयकरण’’ के नाम पर, वास्तव में शिक्षा के केसरियाकरण का ही एजेंडा पेश किया है। जाहिर है कि शिक्षा मंत्रालय आने वाले दिनों में इस एजेंडे को और मुस्तैदी से तथा मुकम्मल तरीके से आगे बढ़ा रहा होगा।
       अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर पाबंदी का प्रकरण बेशक, उच्च शिक्षा संस्थाओं में बहस-मुबाहिसे की आजादी पर आरएसएस-भाजपा की सरकार के हमले का मुद्दा सामने लाता है। लेकिन, इसके साथ ही यह प्रकरण शिक्षा के मामले में संघ के एजेंडे के एक और पहलू को सामने लाता है। आखिरकार, यह संयोग ही नहीं है कि 2014 के अप्रैल में अपने गठन के बाद से अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल न सिर्फ संघ परिवार के निशाने पर था बल्कि इसीलिए आइआइटी-मद्रास के प्रशासन के भी निशाने पर था। स्टडी सर्किल के गठन के फौरन बाद, संस्थान के प्रशासन ने संघ परिवार की आपत्तियों के ही सुर में सुर मिलाते हुए, उसके नाम पर आपत्ति की थी। प्रशासन की स्पष्ट राय थी कि अंबेडकर-पेरियार का नाम ही आपत्तिजनक है। दूसरी ओर, न संघ परिवार से जुड़े मंचों के विवेकानंद आदि से जुड़े नामों में कुछ आपत्तिजनक था और न उनकी गतिविधियों में। प्रशासन तथा सरकार के इस रुख के चलते, अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल को मिटाने की कोशिश तो होनी ही थी। साफ है कि जातिवाद पर आधारित व्यवस्था की रक्षा तथा गौरव गान, केसरियाकरण के एजेंडे का एक बुनियादी तत्व है। इसी एजेंडे को लेकर, संघ परिवार कुरुक्षेत्र के मैदान में है और मोदी सरकार, उसका महत्वपूर्ण हथियार है।
राजेंद्र शर्मा

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राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

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