उद्योगों की बाढ़ चली, नर्मदा की बलि चढ़ी

ग्लोबल इन्वेस्टर्स को मनाना, लोकल इलेक्टर्स व इन्वेस्टर्स की अवमानना।
उद्योगों की बाढ़ चली, नर्मदा की बलि चढ़ी
मध्य प्रदेश शासन ने कोरिया, जापान, इंग्लैण्ड (यू.के.), यूएई (अरब देश) और सिंगापुर जैसे देशों की सरकारों को साथ लेकर बड़ी इन्वेस्टर्स मीट संपन्न की। इसमें पधारे और न पधारे हुए उद्योगपतियों का आह्वान किया कि आप  आइए और अपनी पूंजी लगाईये।
इनमें निश्चित ही तमाम प्रकार के उद्योगों के लिए न्यौता दिया गया है और वह भी बिना किसी बंधन के। उन्हें कहा गया है, आपके लिए द्वार खुला है, नाम भले सिंगल विंडों क्यों न हो।
इस प्रकार करोड़ों रूपये सार्वजनिक तिजोरी से खर्च करके आयोजित किये जाने वाले सम्मेलनों का कोई हिसाब-किताब रखा भी जाता हो तो जनता के सामने पेश नहीं किया जाता।
इन्दौर या खजुराहो में हुए पिछले निवेश सम्मेलनों के बाद कितने उद्योगपतियों ने कितना पूंजी निवेश किया और उसमें भारत ने, मध्यप्रदेश की जनता ने क्या खोया-क्या पाया? कितना रोजगार निर्मित और कितनी खेती बर्बाद हुई? बेरोजगारी कितनी बढ़ी? इन सवालों का जवाब खोजा जाना जरूरी है।
वैसे भी इस हिसाब में अगर केवल पैसे की गिनती हो और जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक या श्रमशक्ति की नहीं; तो फिर किस तरह का विकास होगा?
हम यह आंकलन कभी करते ही नहीं हैं कि विकास से नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का विनाश दीर्घकालीन विनाश लेकर आ रहा है।
चुनाव के पहले दिए आश्वासन को मुख्यमंत्री जी भूल भी सकते हैं, जैसे हर विस्थापित को 5 लाख रूपये प्रति एकड़ का मुआवजा और किसानों को कर्ज मुक्ति।
किसानों, मजदूरों, आदिवासियों और ग्रामीणों के की सम्पदा को छीन कर पूंजीपति उद्योगपतियों भौतिक सम्पदा में सब-कुछ देने के साथ साथ देने पर भी उन्हें करों-शुल्कों में भी इकतरफा छूट होगी; सरकार को बताना चाहिए कि क्या स्वतंत्र भारत में ऐसी छूटें सरकार द्वारा कभी भी किसानों-मजदूरों  को दी गई है या दी जाएगी ?
इन्वेस्टर्स का पूंजीनिवेश अरबों का भी क्यों न हो; उन्हें कोई भी कार्य करने के लिए जरूरी है, प्राकृतिक पूंजी। जमीन और पानी के बिना उद्योग-प्रियता के दावे भी क्या काम आएगें? इसीलिए शिवराज सिंह और मोदी जी ने भूमि की उपलब्धता के साथ-साथ पानी के बारे में भी मिलकर उन्हें आश्वासित किया है।
1,20,000 एकड़ जमीन लैंड बैंक के रूप में उपलब्ध बताते हुए, बताया जा रहा है कि 15,000 एकड़ तो ऐसी है, जिस पर उद्योगपति आज ही पहुंचकर कब्जा ले सकते हैं।
यह भूमि कहां से प्राप्त हुई ?
उद्योगों को इकट्ठे और कितनी मात्रा में जमीन देने की तैयारी है? बाबा रामदेव के अनुसार 45 एकड़ भूमि तो मात्र कबड्डी खेलने के लिए होती है तो किसे कितनी जमीन जमीन दी जा रही है? इस जानकारी को तत्काल सामने लाना चाहिए और नवीनतम जानकारियों से लोगों को अवगत कराया जाना चाहिए।
जरूरत से ज्यादा जमीन लेकर अपने गेस्ट हाउसेस, हरियाली और बगीचे ही नहीं, मल्टीप्लेक्स् और रियल स्टेट भी बढ़ाने वाले नये जमीनदार बन रहे हैं ये निवेशक-उद्योगपति।
गुजरात में अडानी को 1800 हेक्टेयर्स भूमि गलती से दी गई थी, वैसे ही और लोगों को भी बांटी जा रही है। जो जमीन दी जा रही है, वह भूमि वास्तव में किसानों से अधिग्रहित होकर या ग्राम पंचायतों से बिना अधिग्रहण करके ली जा रही है।
लैंड बैंक बनी कहां से और किस उद्देश्य से और अब हस्तांतरित किसे की जा रही है; इस सवाल के जवाब बिना, इसे सामाजिक हित में हो रहा कार्य नहीं मान सकते।
नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर से विस्थापितों के लिए पहले एक व्यवस्था बनी थी। इसमें 5000 हैक्टेयर यानि 12000 एकड़ का लैंड बैंक था, इसमें जो भी खेती लायक जमीन थी, उस पर से भी अतिक्रमण न हटाते हुए, विस्थापित किसानों को वैकल्पिक भूमि का आवंटन नहीं हो पाया। विस्थापितों को गुजरात और महाराष्ट्र ने कुल 14000 हैक्टेयर जमीन दी, जबकि मध्यप्रदेश ने मात्र 50 परिवारों को जमीन दी है। बहरहाल कईयों को घरबार वापस नहीं मिला।
नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध करवाई गयी जानकारी के आधार पर शिकायत निवारण प्राधिकरण में बिठाए गए पूर्व न्यायाधीश यह जवाब देते हैं कि जमीन नहीं है।
ग्राम भादल, बड़वानी तहसील और जिले का एक पहाड़ी गांव है। आज तक वह वनग्राम ही है।
यहां के भूमि रिकार्ड्स ठीक न होने के कारण आज भी कई बढ़े आदिवासी परिवारों को भी विस्थापित न मानते हुए, उनकी जमीन डुबाई गई है। वर्ष 2005 में मात्र 11 परिवारों को बरसों बाद, कागज पर दे रखी महेश्वर तहसील के राबडघाटी गांव की जमीन को स्वयं पुनर्वास अधिकारी ने रद्द करवाकर, खलघाट में जमीन दी गयी, वह भी सामान्य शिकायत निवारण प्राधिकरण (GRA) के सामने बहस करने के बाद। लेकिन 19 परिवार पात्र घोषित होने के बाद भी जमीन नहीं पा सके, क्योंकि GRA और सरकारों का कहना है कि “लैंड बैंक में कोई जमीन उपलब्ध नहीं है।“
भादल गांव के गोखरू पिता मंगल्या को यह लिखित जवाब, उसके परिवार की जमीन से हटते हुए पुनर्वास में जमीन मिलने की राह देखते हुए, अब 2016 में दिया गया।
म.प्र. शासन से वर्ष 1999 में सर्वोच्च अदालत में दर्ज जानकारी के मुताबिक़ 8000 हैक्टेयर की जमीन उपलब्धता थी, पर उसे अनदेखा करके विस्थातिपों को मात्र खराब, अनुपजाऊ पथरीली जमीन दिखाकर पुनर्वास से वंचित रखा गया।
सरदार सरोवर परियोजना से विस्थापित ऐसे हजारों परिवार जमीन का हक कानूनन होते हुए भी सरकार से उन्हें सही खेती लायक जमीन नहीं मिली इसलिए उन्हें विशेष पुनर्वास अनुदान याने नगद पैकेज देकर फंसा दिया गया।
सरकार ने जमीन न देकर-नकद मुआवजे का प्रावधान इसलिए किया ताकि आसानी से भ्रष्टाचार किया जा सके। मा. न्यायमूर्ति एस.एस. झा आयोग की 7 सालों की जांच से निकला कि 1589 फर्जी रजिस्ट्रियों का घोटाला किया गया है।

आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि नगद राशि देने की गलत नीति के कारण यह भ्रष्टाचार हुआ है और अधिकारी तथा दलाल इसके लिए दोषी हैं।
लेकिन सही लैंड बैंक छुपाकर, उद्योगों के लिए आरक्षित रखने के कारण हुए इस पूरे जमीन घोटाले के लिए अब मात्र विस्थापित (क्रेता) व विक्रेता,  जिनमें कि पूरी निर्धनता से फंसाये गये आदिवासी, बालाई/दलित, कोई अंध, जिनमें कोई विधवा शामिल है,  के खिलाफ, दलालों के साथ अपराधी प्रकरण (FIR) दाखिल कर रहे हैं। इसमें दलालों और आरोपियों की सूची में आयोग की ओर से डाले गए अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की भी कोई खबर नहीं है।
झा आयोग दोषी करार होते हुए भी अन्य अधिकारियों को भी भ्रष्टाचार के हर मुद्दे में बचाने की पूरी साजिश शिवराज सिंह सरकार रच रही है। इसमें कोर्ट को भी भ्रमित किया जाकर, सही कानूनी आधार पर सुनवाई टालने की कोशिश भी है।

प्रतिदिन करोड़ों लीटर पानी की भी चोरी तो नर्मदा कैसे रहेगी जीवनदायिनी?
जमीन के साथ-साथ नर्मदा के पानी पर भी निर्भर है उद्योगपति और उन्हें न्यौता देने वाले म.प्र. और केन्द्र के राजनेता।
गुजरात ने भी सरदार सरोवर जलाशय का पानी कोकाकोला,  अडानी, अम्बानी की ओर मोड़ लिया है,  बच्च-सौरीसू के लोग इसका नतीजा भुगत रहे हैं।
वैसे ही मध्यप्रदेश शासन ओंकारेश्वर, महेश्वर और अन्य बांधों का पानी शहरों के साथ उद्योगों को बड़े पैमाने पर देने जा रहा है। नर्मदा-शिप्रा योजना, नर्मदा-गंभीर योजना, नर्मदा-माही योजना व नर्मदा-कालिसिंध योजना इन चारों के द्वारा उद्योगों को, जितना चाहिए पानी उपलब्ध कराने जा रही है मध्यप्रदेश सरकार।

केवल शिप्रा और गंभीर में ही 172 करोड़ लिटर पानी प्रतिदिन डालने जा रहे है। केन्द्र का वरदहस्त है।
इन तमाम योजनाओं से, जाहिर है कि नर्मदा बचेगी नहीं। नर्मदा सेवा यात्रा; ‘ नमामि देवी नर्मदे‘ की आवाज उठाने वाले नर्मदा को प्रदूषित (नर्मदा में पानी कम रखने पर) तथा रिक्त करने चले हैं और फिर संरक्षण या सेवा का दावा भी।
श्री अनिल माधव दवे जी पर्यावरण मंत्री बनने के बाद भी जब ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में सम्मिलित थे; तब वे बताये, क्या नर्मदा का पानी उठाकर, इतने सारे उद्योग (5,7,0000 रूपए करोड़ निवेश की घोषणा हैं, इसमें कमी या बढ़ोत्तरी हो तो अपारदर्शी!) लगाने की योजना, कुल परिणाम जांचकर, पर्यावरणीय मंजूरी के लिए प्रस्तुत की गई है। क्या इसे जाहिर करने के पहले पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता नहीं?

क्या एकाएक उद्योग के पर्यावरणीय, सामाजिक असर जांचे गऐ हैं?
क्या नर्मदा को खेती की कीमत चुकाकर, उद्योगों की ओर मुड़ना भी उन्हें मंजूर है? क्यों?
इन सारे सवालों का जवाब विस्थापितों को चाहिए, प्रधानमंत्री को भेजे किसी पत्र का जवाब वे खुद नहीं, अधिकारियों द्वारा आता है, वह भी आंकड़ों के खेल के साथ, यह अनुभव है, नर्मदा बचाओ आंदोलन का|  तो अब जाहिर जवाब दे दें। शिवराज सिंह व मोदी सरकार को देना चाहिए।

क्या आपकी लैंड बैंक केवल उद्योगपतियों के लिए ही है? आदिवासियों की जमीन हड़पने पर भी, उन विस्थापितों के लिए नहीं; क्यों ?
प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं, आदिवासी पर्यावरण की रक्षा करते हैं, और आप ? उनका पर्यावरण आजीविका से खेल करके उन्हें वैकल्पिक आधार भी नहीं देते हैं।
नर्मदा का पानी करोड़ों लीटर रोज (योजनाओं से शिप्रा व गंभीर) उठाने पर असर आएगा गुजरात में समुंदर घुसने तक, उसकी जांच हुई है। क्या इसके लिए लोगों की सहमति है? अनुसूचित जनजाति क्षेत्र में भी सहमति जरूरी नहीं?
जमीन के बदले पैसा देने में और अब जमीन उद्योगों को देने में है। मध्यप्रदेश की जमीनों का सबसे बड़ा घोटाला नहीं होगा?
|| मध्यप्रदेश शासन ओर मोदी जी, दोनों जवाब दें ||
राकेश दिवान        इरफान जाफरी        जोशी जेकप          मुकेश भगोरिया           मेधा पाटकर

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