उपेंद्र कुशवाहा बिहार में मुख्यमंत्री के उम्मीदवार !

संयोग ही है कि बिहार के पिछड़े समुदाय का पहला मुख्यमंत्री कुशवाहा ही था
हर हाल में बिहार का चुनाव दिलचस्प होगा। अब वोटर को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार चाहिए। एक तरफ नीतीश कुमार हैं तो दूसरी तरफ से कौन ?
उपेंद्र कुशवाहा को बिहार में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। यह उनकी पार्टी ने ही किया है। लोकसभा में उनकी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के तीन सदस्य हैं और वह स्वयं मानव संसाधन मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।
इतना ही नहीं उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने सीटें भी बांट दी हैं। अपने लिए उन्होंने 67, लोक जनशक्ति के लिए 72 और भाजपा के लिए 102 क्षेत्र से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा है। यह बिहार में उनकी जाति कोयरी का सपना है। इस समुदाय ने अशोक को भी अपने समुदाय का घोषित कर दिया है। उत्तर प्रदेश के अनेक कुशवाहा अपना सरनेम मौर्य भी रखते हैं। बिहार में अपने आप को आमतौर पर कुशवाहा रखते हैं। मुख्यमंत्री बनने का सपना इस समुदाय का पुराना सपना है।
तथ्य तो यह है कि इसी समुदाय के सतीश प्रसाद सिंह ने 1968 में 28 जनवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और 1 फरवरी को इस्तीफा देने के पहले बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल को विधान परिषद में मनोनीत कर उसी दिन उनका मुख्यमंत्री बनना तय कर दिया था।
संयोग ही है कि बिहार की पिछड़े समुदाय का पहला मुख्यमंत्री कुशवाहा ही था – भले ही सांकेतिक, लेकिन 1967 की संयुक्त विधायक दल को विधान सभा में पराजित करने की रणनीति भी अतिप्रतिभाशाली घोर पिछड़ावादी जगदेव प्रसाद की ही थी। यहीं से बिहार की राजनीति में दलित उपयोग की राजनीति की शुरुआत भी होती है जो जीतनराम मांझी तक चलती रही है।
यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि दलित और वास्तविक प्रतिभाशाली भोला पासवान शास्त्री ने कभी ग़ैरकांग्रेसियों के सहयोग से कभी कांग्रेस के सहयोग से तीन बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तीनों बार उनका इस्तेमाल हुआ। कांग्रेस ने कभी मुख्यमंत्री के योग्य उन्हें नहीं माना। सिर्फ इंदिरा गांधी ने उन्हें केंद्र में मंत्री पद दिया और हटाया। वही इस्तेमाल भाजपा और सवर्ण समुदाय ने मिल कर अप्रैल 1979 में अतिपिछड़ा कर्पूरी ठाकुर को हरा कर दलित रामसुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाया।
1980 से 1990 तक कोई न कोई सवर्ण बिहार का मुख्यमंत्री कांग्रेस की तरफ से हुआ।
बिहार के पिछड़ों का आक्रोश समझा जा सकता है। यह आक्रोश कांग्रेस से भी अधिक गांधी परिवार के प्रति था बिहार में – इसीलिए 1989 ने बिहार ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ वोट किया था। बिहार के मन को भांपा था चंद्रशेखर ने, इसीलिए चंद्रशेखर ने बलिया के अलावा बिहार के महाराजगंज से भी लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते। लेकिन 1990 की विधान सभा में जनता पार्टी को बहुमत नहीं मिला। केंद्र में भी जनता दल को बहुमत नहीं मिला था। लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने – उन्हें बाहर से सहयोग दिया माकपा और भाजपा ने।
1989 की सरकार ही देश की पहली और अंतिम राष्ट्रीय सरकार थी – एक तरफ घोर वामपंथी और दूसरी तरफ केवल दक्षिण पंथी ही नहीं घोर हिंदूवादी भाजपा।
बिहार में किसी तरह से लालू प्रसाद की सरकार बन गई थी। इसके पहले कि लालू प्रसाद को हटाया जाता विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया जिसका फायदा लालू प्रसाद को मिला। वह अब यादव ही नहीं सभी पिछड़ी जातियों के नेता बन चुके थे। मज़े की बात यह भी है कि जग्गनाथ मिश्र की खोज जीतन राम मांझी को भी 1980 -85 के बाद वह 1990 में कांग्रेस की तरफ से चुनाव हार चुके थे। 1996 में लालू प्रसाद ने ही बाराचट्टी के उपचुनाव में उन्हें खोजा। इस प्रकार जीतन राम मांझी कभी न कभी किसी के खोज रहे। उनकी अंतिम खोज नीतीश कुमार ने की जब उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के हार के बाद मुख्यमंत्री बना दिया। फिर वही इस्तेमाल – वही सत्ता की चाह। जब नीतीश कुमार को यह समझ में आ गया कि जीतन राम मांझी भाजपा के साथ सांठ गांठ कर रहे हैं तो उन्हें भी फरवरी 2015 में हटाया गया।
अब यहां से बिहार की चुनावी राजनीति शुरू होती है। संयोग से नहीं बहुत सारी वजहों से भाजपा की अंदरूनी राजनीति उसे मजबूर करती है कि वह अपना कोई भी व्यक्ति मुख्यमंत्री के तौर पर पेश न करे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जब कहा कि बिहार का चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा। उनके इस बयान से सबसे अधिक फायदा नीतीश कुमार को हुआ। 2014 में लोकसभा के चुनाव के समय भी बिहार का वोटर कह रहा था कि ऊपर नरेंद्र मोदी और नीचे नीतीश कुमार।
ऐसी हालत में उपेंद्र कुशवाहा को यह समझना बहुत आसान था कि भाजपा ने नीतीश कुमार की थाली में बिहार परोस दिया है। तब यह बयान कि वह अपनी पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री के उम्मीदवार हैं। कभी भाजपा के साथ रहते हुए नीतीश कुमार ने भी यही किया था।
हर हाल में बिहार का चुनाव दिलचस्प होगा। अब वोटर को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार चाहिए। एक तरफ नीतीश कुमार हैं तो दूसरी तरफ से कौन ?
जुगनू शारदेय
[author image=”https://scontent-sin1-1.xx.fbcdn.net/hphotos-xtp1/v/t1.0-9/68942_594172203926562_2108129910_n.jpg?oh=5a47e009bffa96460cc421e078d9c26e&oe=56124EC4″ ]जुगनू शारदेय लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. फिलहाल सलाहकार संपादक ( हिंदी ) – दानिश बुक्स[/author]