Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना
Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

कैंसर से तड़प-तड़प कर खत्म होता जा रहा है देश, हमारा राष्ट्रवादी युद्धोन्माद परमाणु धमाकों में तब्दील

कैंसर से तड़प-तड़प कर खत्म होता जा रहा है देश, हमारा राष्ट्रवादी युद्धोन्माद (Nationalist war hysteria) परमाणु धमाकों (Nuclear blasts) में तब्दील…. अरबों शरणार्थी (Refugees) मनुष्यों को बचाने की कोई जुगत नहीं कर सके तो तुम्हारे मनुष्य होने का मतलब क्या है? … इन सवालों का कोई जवाब नहीं है और अग्निपरीक्षा की घड़ी बीत रही है।

मैं बंगाल के उस इलाके में हूँ जहाँ करीब पाँच सौ साल पहले कोई चैतन्य महाप्रभु (Chaitanya Mahaprabhu) पानीहाटी गाँव में पधारे थे। बंगाल में तब बौद्ध धर्म (Buddhism in Bengal) का अवसान हो चुका था। सेनवंश का पतन भी हो चुका था। बौद्धों के हिंदुत्व में  धर्मांतरण का सिलसिला जो पाल वंश के और बौद्धमाय बंगाल के अवसान के बाद राजा बल्लाल सेन ने शुरू किया था, वह अंततः पूर्वी बंगाल में इस्लाम में व्यापक धर्मांतरण का क्रम बन चुका था।

ग्याहरवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी तक मुश्किल से दो सौ साल के हिंदुत्व राजकाज के मध्य प्रजाजन पूरी तरह मनुस्मृति शासन के तहत सारे हक हकूक खो चुके थे और जातियों के अजब-गजब ताना बाना में बाकी देश की तरह बंगाल में भी सामंती समाज के गठन के बाद शाक्त और शैव मतों के मुताबिक मध्ययुगीन हिंदुत्व के वर्चस्व की वजह से इस्लामी राज काज के अंतर्गत प्रजाजन ही मायने में नर्क जी रहे थे।

बंगाल के बौद्ध तब तक चंडाल बन चुके थे और चैतन्य महाप्रभु और प्रभु नित्यानंद उन्हें हिंदुत्व में समाहित करने का आंदोलन चला रहे थे।

नवद्वीप के बाद पानीहाटी और हालिशहर इस हिंदूकरण आंदोलन के सबसे बड़े केंद्र थे।

दरअसल चैतन्य महाप्रभु का हिंदुत्व वैदिकी हिंदुत्व नहीं था।

वह विष्णु अवतार में तथागत गौतम बुद्ध का धम्म था जो चैतन्य महाप्रुभु के बाद फिर नवजागरण और मतुआ आंदोलन के दौरान हिंदुत्व का लोकतंत्र बनता गया।

अराजक अंधकार के उस संक्रामक काल में कवि जयदेव के बाउल आंदोलन के मध्य चैतन्य महाप्रभु का वैष्णव धर्म अहिंसा प्रेम के दर्शन के तहत लगभग तथागत गौतम बुद्ध के धम्म का प्रत्यावर्तन ही था।

पानीहाटी का गंगा तट (Ganga coast of Panihati) अब भी उसी इतिहास की निरंतरता है। जहाँ से कुछ ही दूरी पर बैरकपुर छावनी में ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत के खिलाफ हिंदू मुसलिम आवाम की बगावत का सिलसिला सिपाही मंगल पांडेय की बंदूक से गोली दागने से शुरू हुआ तो उसके बाद भारतीयता और भारत तीर्थ की राष्ट्रीयता के रचनाकार जिस अस्पृश्य कवि के उदात्त मानवतावादी दर्शन से शुरू हुआ, बुद्धं शरणं गच्छामि के बीजमंत्र की चंडालिका काव्यधारा की गीतांजलि वाले उन रवींद्र नाथ का कोलकातिया जमींदार भद्रलोक साहिब बिरादरी के शिकंजे से निकलकतर पिनेटी की बागानबाड़ी में चैतन्य महाप्रभु के चरणचिन्ह के अनुसार इसी पानीहाटी में नवजन्म हुआ,जहाँ से विवेकानंद और राकृष्ण परमहंस, रानी रासमणि के दक्षिणेश्वर और बेलुड़ बहुत दूर भी नहीं हैं।

पानीहाटी सोदपुर इलाका रानी रासमणि के राजकाज के अंतर्गत रहा है और चैतन्य महाप्रभु के पानीहाटी गंगाघाट पर वे गंगास्नान करती रही हैं।

बंगाल में वही जमींदार भद्रलोक साहिब बिरादरी का अबाध है और प्रजाजन आज भी वही जाति धर्म निर्विशेष चंडाल हैं लेकिन न चैतन्य महाप्रभु कोई है, न विवेकानंद और रवींद्रनाथ हैं, न रामकृष्ण और रानी रासमणि हैं, न ब्रह्म समाज है न नवजागरण है और न मतुआ आंदोलन है।

चंडाल सिर्फ नमोशूद्र बन गये हैं।

असुरों का दुर्गोत्सव बंगाल है। फिर भी सात सौ महिषासुर उत्सव से पता चलता है कि शालबनी में असुरों का जमावड़ा अब भी होना जारी है और गोंडवाना से लेकर झारखंड उत्तर बंगाल तक असुर जागरण है।तो नरसंहार का यह सिलसिला,यह वध महोत्सव खत्म होना ही है। लेकिन बंगाल के चंडाल प्रजाजनों में कोई जागरण नहीं हैं और शरणार्थी सोये हैं।

इस अखंड महादेश के वीभत्सतम दुस्समय में नई दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण के लिए भारत विभाजन कर रहे सत्तावर्ग से एकदम अलग थलग हिंदुओं और मुसलमानों के अंतःस्थल में बंटवारे के जख्म से निकलते लबालब समुंदर से घिरे हुए किसी मोहनचंद कर्मचंद गांधी ने इसी पानी हाटी में कोलकाता में विभाजन के लिए हुए डाइरेक्ट एक्शन और नोआखाली के दंगों के बाद थके हारे अकेले ठहरे थे और आजाद भारत की राजधानी नई दिल्ली में जब वे पहुंचे तो 30 जनवरी,1948 को हिंदुत्व के बुलेट ने उनकी हत्या कर दी और वे पूरा महादेश राम के हवाले करके चल बसे।

उन्हीं राम की वानरसेना के हवाले अब यह देश है।

उसी हत्यारे का मंदिर अब हमारा सबसे बड़ा धर्मस्थल है और उसी धर्म के तहत फासिज्म का यह राजकाज है।

सोदपुर चौराहे पर हाल में उन्हीं चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति (Statue of Chaitanya Mahaprabhu on Sodpur intersection) लगी है।

तेजी से महानगर में खप रहे तमाम ज्वैलरी ब्रांड, रियल्टी कंपनियों और शापिंग माल में खो गये बीटी रोड और गंगा के दोनों किनारों के कल कारखानों की तरह अंग्रेजो को लोहा का चना चबाने के लिए मजबूर करने वाली मछुवारे की बेटी रानी रासमणि, रवींद्रनाथ या गांधी की कोई सार्वजनिक याद कहीं नहीं है सिवाय पिनेटी बागानबाड़ी के खस्ताहाल सोदपुर गांधी आश्रम के।

चैतन्य महाप्रभु भी हिंदुत्व के पुनरूत्थान की प्रतिमा हैं।

इन महान विभूतियों की तुलना में मेरा पानीहाटी या सोदपुर में बस जाना या शायद इसी गंगातट पर पुरखों की अस्थिधारा में मिला जाने का आशय क्या है, प्रासंगिकता क्या है, मुझे इसका कोई अंदाजा नहीं है। लेकिन इतिहास और भूगोल के इस ताने बाने में फंसा मैं भी यहाँ अब एकदम अकेला हूँ।

मेरे पिता की कैंसर से मौत हुई थी और उन्हीं की रक्तधारा का वारिस मैं हूँ तो मालूम मुझे यह भी है कि कैंसर की उस विरासत को मैं अपने भीतर ढो रहा हूँ और वह बीज मेरे भीतर ही भीतर ही खामोशी से अंकुरित होने लगा है, जो जल्द ही मेरे वजूद का काम तमाम करने वाला है और इसकी किसी डॉक्टरी जाँच या चिकित्सा की कोई गुँजाइश नहीं है क्योंकि मैं साफ साफ देख रहा हूँ कि कैंसर का टीका और इंजेक्शन ईजाद कर लेने के दावे के मध्य हमारे पुरखों का यह अखंड महादेश आहिस्ते आहिस्ते कैंसर से तड़प तड़प कर खत्म होता जा रहा है और यह मर्ज लाइलाज है।

हम आत्मध्वंस के वारिस हैं। हमारा राष्ट्रवादी युद्धोन्माद परमाणु धमाको में तब्दील।

दसों दिशाओं में इस वक्त दुर्गोत्सव की धूंम है। जिन प्रजाजनों की बलि चढ़ाकर देवी का आवाहन करते थे जमींदार,राजा रजवाड़े, वही प्रजाजन अपने ही नरसंहार के महोत्सव में मदहोश हैं और उन्हें अपने वजूद पर मौत की छाया मंडराती नजर नहीं आती और वे इस महान कुरुक्षेत्र के महाभारत में सचमुच निमित्तमात्र हैं और जन्म जन्मांतर मनुस्मृति अनुशासन के तहत जातिव्यवस्था के अंतर्गत अपना अपना कर्मफल भोगने के लिए नियतिबद्ध हैं।

इस नियति कि खिलाफ अभिशाप मुक्ति रवींद्र काव्यधारा में नंदिनी की मशाल है,लेकिन अंधेरी सुरंगों में कैद आवाम के लिए वह रोशनी नसीब नहीं है।अपनी बलि चढ़ाने के लिए वे बेसब्र हैं।यही राष्ट्रवाद है तो यही मुक्तबाजार का अखंड भोग है जो जनता को कालीमां का भोग बना रहा है।

मुझे मालूम नहीं है कि सोदपुर के गांधी आश्रम में बैठे भारत विभाजन के उस संक्रमणकाल में इस नियति के बारे में क्या सोचा था गांधी ने या पिनेटी की बागानबाड़ी में जमींदारी के शिकंजे से निकले मंत्रहीन अंत्यज रवीनंद्रनाथ के दिलो दिमाग में क्या चल रहा था या बेलुड़ में गंगातट से शूद्रों का भविष्य कहने से क्या तात्पर्य स्वामी विवेकानंद का था या बैरकपुर छावनी में अपनी बंदूक से भारत की आजादी की लड़ाई सन 1857 में शुरु करने से पहले मंगल पांडेय के दिलोदिमाग में क्या चल रहा था।

इस गंगातट पर सती दाह और अंतर्जलि यात्रा का सिलसिला ब्रह्मसमाजी नवजागरण और वैदिकी कर्मकांड विरोधी मतुआ आंदोलन के भूमि सुधार एजंडे के किसानों मेहनतकशों के निरंतर आंदोलनों और विद्रोहों की वजह से अब बंद है। लेकिन स्त्री मुक्ति की मंजिल अब भी कितनी दूर है जैसे हम नहीं जानते, वैसे ही हम यह भी नहीं जानते कि अब भारतीयता और भारत तीर्थ के दर्शन की प्रासंगिकता क्या है। क्योंकि जुलूसों का जो महानदर था, वह मर गया है।

तेभागा की जो जमीन थी, वह बेदखल है और नील विद्रोह के करीब ढाई सौ साल बाद बंगाल के किसान अब सिंगुर में जमीन वापस मिलने के बाद, नंदीग्राम में कैमिकल हब रोकने के बाद कानून बंधुआ मजदूर हैं और परिवर्तन के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि बंगाल के किसान भूमि सुधार की विरासत को तिलांजलि देकर अब कारपोरेट कंपनियों के बंधुआ मजदूर हैं और कहीं कोई नील विद्रोह नहीं है न मुंडा और संथाल विद्रोह की कोई संभावना है।

सारे के सारे जनांदोलन खत्म है और अबाध मुनाफा वसूली के अंध राष्ट्रवाद का मुक्त बाजार है तो हरिचांद ठाकुर परमब्रह्म मैथिली ब्राह्मण में तब्दील हैं और मतुआ वोटबैंक हैं।

जिंदगी के बचे खुचे दो चार दिनों में मुझ जैसे दिहाड़ी मजदूर को कुछ और हासिल होना नहीं है।

जिस देस के किसान बंधुआ मजदूर बना दिये जा रहे हैं, जिस देश में लाखों किसान परिवार को यूपी और पंजाब के चुनाव जीतने के लिए बेलगाम युद्धोन्माद की राजनीति के तहत फिर शरणार्थी बनाया जा रहा है, जिस देश में बहुजन जल जंगल जमीन से बेदखल हैं और विभाजन पीड़ित तमाम शरणार्थी नागरिकता से वंचित हैं, जहाँ स्त्री पर पल-पल बलात्कारी पुरुष वर्चस्व है, जहाँ लाखों किसान आत्महत्या कर रहे हैं, जहाँ बच्चे बंधुआ मजदूर हैं और खेती भी बंधुआ हैं, जहाँ करोड़ों मेहनतकशों के साथ साथ करोड़ों युवाजनों के हाथ पांव कटे हैं और धर्म के नाम पर नरबलि और नरसंहार सांस्कृतिक महोत्सव सर्वदलीय है, ऐसी व्यवस्था में मैं मर जाना पसंद करता हूँ और मुझे कबंधों की इस मृत्यु उपत्यका में मेरी किसी प्रतिष्ठा, मान सम्मान की स्थिति बनने का मतलब है कि हजारों साल की हजारों पीढ़ियों से मेरा विश्वासघात है। ऐसी गद्दारी कमसकम मेरा मकसद नहीं है।

रीढ़ की कैंसर से मरने से पहले विभाजन पीड़ितों की खोयी हुई जड़ों के लिए जमीन तलाशते हुए सीमाओं के आर पार मेरे पिता ने तजिंदगी दौड़भाग की और किसी निजी उपलब्धि के लिए उनने ऐसा नहीं किया। वे असहनीय पीड़ा सहते हुए प्राण त्यागे लेकिन उनकी आंखों में मरते दम तक एक जुनून था-अपने लोगों के लिए कुछ भी कर गुजरने का।

मेरे पिता का वह शरणार्थी संसार अब इस दुनिया का मुकम्मल नक्शा है और मैं इन अरबों मनुष्यों की किस्मत बदलने की लड़ाई में कहीं नहीं हूँ।

इसलिए हम किसी उपलब्धि का दावा कभी कर ही नहीं सकते और न हम अपने पिता के जुनून की विरासत पर दावा कर सकते हैं जो हजारों साल से हमारी हजारों पीढ़ियों के अविराम महासंग्राम की विरासत है, उनकी आजादी की कभी न थमने वाली लड़ाई है।

उस मोर्चे को जोड़े बिना मेरे जीने मरने का कोई मतलब भी नहीं है। वही मोर्चा बनाना मेरा इकलौता मकसद है और बाकी कोई तमन्ना नहीं है।

जाहिर है कि मैंने निजी तौर पर अपने परिवार, अपने गांव, अपने समाज, अपने जनपद या अपने देश के लिए कुछ भी नहीं किया है।

मीडिया और रचनाधर्मिता की जनपक्षधरता के जिस मोर्चे को मैं मिशन मानकर अब तक जीने का जद्दोजहद जी रहा था, वह मोर्चा अब विशुद्ध कारपोरेट बिजनेस और मार्केटिंग, घिनौनी मौकापरस्ती है। है। पूरी जिंदगी बेमतलब गवां देने की कोफ्त के सिवा मुझे अब हासिल कुछ भी नहीं है।

मेरे पिता हरवक्त मेरे मुखातिब हैं और एक ही सवाल वे कर रहे हैं,इस दुनिया के अपने इन अरबों शरणार्थी मनुष्यों को बचाने की कोई जुगत नहीं कर सके तो तुम्हारी इस जिंदगी का मतलब क्या है?

मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है और अग्निपरीक्षा की घड़ी बीत रही है।

सुषमा असुर के हवाले से कोलकाता में मीडिया ने जो फर्जीवाड़ा किया है, वही फर्जीवाड़ा पूरे देश में मनुष्यता और प्रकृति के सर्वनाश का अंधियारे का कटकटेला बिजनेस है और इस धतकरम के पर्दाफास से जिंदगीभर मैं जो इस मीडिया का हिस्सा बना रहा,उसके लिए मुझे बेहद अफसोस है।

विडंबना यह है कि जिंदगी में मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि मैं खुद को एक पेशेवर पत्रकार के अलावा और कुछ कह भी सकूँ।

जनविरोधी मिथ्या पत्रकारिता अब मेरे लिए जीवन यंत्रण का नर्क है, जिसे जीने को हम मजबूर हैं।

सारे देश में हिंदुत्व के नाम किसानों, मेहनतकशों, स्त्रियों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और बहुजनों के हक हकूक छीनने का जो आयोजन है, उसमें हमारे तमाम माध्यमों और विधाओं की भूमिका ढोल नगाड़ों की है।

सुषमा असुर कोलकाता नहीं आ रही हैं और उन्होंने अपने बयान में इस मीडियाई बेशर्म इस धोखाधड़ी का खुलासा कर दिया है तो मीडिया की ओर से दसों दिशाओं में जारी युद्ध उपक्रम का रहस्य और उसके तंत्र मंत्र यंत्र का ताना बाना भी इस बयान में बेपर्दा है।देख लीजिये वर्चस्व के रंगभेदी नरसंहार के लिए झूठ का ताना बाना बहुसंख्य मूल निवासियों के नरसंहार के लिए कैसे आस्था और देशभक्ति की शक्ल अख्तियार कर लेती हैः

हम असुर लोग इस धोखा का निंदा करते हैं.

कोलकाता की एक संस्था ने धोखे से हम असुरों को बुलाकर महिषासुर शहादत अभियान को बदनाम करने की कोशिश की, इसका हम असुर समुदाय घोर निंदा करते हैं. हम असुर कोलकाता के किसी आयोजन में शामिल होने नहीं जा रहे हैं. हमारे संगठन की महासचिव वंदना टेटे ने आयोजकों को बता दिया है दुर्गा पूजा के किसी आयोजन में असुर लोग भाग नहीं लेंगे. यह आर्यों का छल-बल का पुराना तरीका है.

मुझसे संपर्क करने वाले व्यक्ति सुभाष राय ने खुद को ‘साल्टलेक एफई ब्लॉक रेसिडेंट एसोसिएशन’ का सदस्य बताया था और कहा था कि हमलोग शरद उत्सव का सांस्कृतिक उत्सव कर रहे हें, उसमें आपलोग आइए.

आने के लिए 9 लोग का स्लीपर टिकट भी भेजा था. लेकिन जब हमलोग को मालूम हुआ कि बंगाल का अखबार में ऐसा खबर छपा है कि सुषमा असुर और उसके साथ दुर्गा पूजा का उद्घाटन करेंगे तो हम असुरों को बहुत धक्का लगा.

हमने अपने संगठन का महासचिव दीदी वंदना से इस बारे में बात किया और पूरे मामले की पड़ताल की. तब सच्चाई उजागर हुआ कि हम असुरों को धोखे से बुलाया जा रहा था.

वंदना टेटे/सुषमा असुर

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पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए "जनसत्ता" कोलकाता से अवकाशप्राप्त। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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