राम कोविंद देश के संविधान की हिफाजत करेंगे या फखरूदीन अली अहमद बनेंगे ?

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को इतिहास की चुनौती

आज का दौर 1975 और 1984 से ज्यादा भयावह है जब गैर संवैधानिक शक्तिया देश में हाहाकर मचा देना चाहती हैं और संविधान की मूल भावना को ही खोद देना चाहती हैं ऐसे में देश के राष्ट्रपति पर एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी है

विद्या भूषण रावत

रामनाथ कोविंद ने भारत के 14वें राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभाल लिया है। इस पद पर पहुँचने पर हमारी शुभकामनायें। उनके पदभार के तुरंत बाद हुए राजनैतिक घटनाक्रम ने कुछ बिन्दुओं से हमारा ध्यान हटाया लेकिन फिर भी उनकी और हमारा ध्यान जाना आवश्यक है। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय को याद किया, वह गाँधी जी की समाधि पर जा कर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर आये, जो भारतीय राज्य सत्ता के लोगो की एक परंपरा है। उसके बाद वह सेंट्रल हॉल गए जहाँ उनका शपथ ग्रहण हुआ। उन्होंने डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ राधा कृष्णन, डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम और श्री प्रणब मुख़र्जी की महान विरासत की बात की और कहा कि उनके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है।

राष्ट्रपति के पहले दिन के घटनाक्रम कई और इशारा कर रहे हैं जिनको समझना जरूरी है। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद अपने उद्बोधन में उन्होंने गाँधी जी और दीन दयाल उपाध्याय को भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई का नायक बताया और फिर सरदार पटेल और अंत में आंबेडकर को थोडा बहुत याद किया।

संसद में उनके भाषण के समाप्त होने पर जय श्री राम और भारत माता की जय के नारे भी लगे। वैसे तो नारे बाजी ऐसे अवसरों पर शोभा नहीं देता लेकिन ये साबित करता है कि भारतीय राजनीतिक पटल पर गंभीरता का स्थान जुमलों और नारेबाजी ने ले लिया है।

अगर जुमलों में ही बात करें तो हम कह सकते हैं कि अगर राम नाथ कोविंद भारत के राष्ट्रपति हैं तो इसका श्रेय डॉ बाबा साहेब आंबेडकर को जाता है जिनकी जागरूक पीढ़ी के चलते संघ और कांग्रेस जैसी ब्राह्मणवादी पार्टियों को भी जय भीम करना पड़ रहा है। क्या वो संसद जो सुरक्षित सीटों से चुनकर आते हैं जय भीम का नारा नहीं लगा सकते थे? आखिर संघ परिवार तो दुनिया में ये ही बताना चाहता है कि उसने एक दलित को राष्ट्रपति बनवाया है और उसको चुनाव में खूब भुनवाना चाहता है, लेकिन उसके सांसद जय भीम कहने को तैयार नहीं क्योंकि उनकी असली विरासत तो जय श्री राम की है है। ये जरुर है कि दोनों साथ नहीं रह सकते क्योंकि अंततः ऐसे अंतर्द्वंद्व जल्दी ही विस्फोटित हो जाते हैं क्योंकि लड़ाई वैचारिक है, लड़ाई मनुवाद और अम्बेडकरवादी मानववाद के बीच है इसलिए जो एडजस्ट करने की कोशिश कर रहे हैं, उनको शीघ्र ही घुटन महसूस होना शुरू हो जायेगी और बाकी तो अपनी पीढ़ियों के जुगाड़ के चक्कर में हैं उन्हें समाज से क्या लेना देना।

वैसे तो राष्ट्रपति क्या बोले यह उनका और उनकी सरकार का अधिकार क्षेत्र है लेकिन जिस संसद को वो आज संबोधित कर रहे थे उसमें प्रथम प्रधानमंत्री के नाम को न लेना कोई भूल नहीं अपितु संघ की घृणित रजनीति का हिस्सा है

राष्ट्रपति के निजी सचिव आदि की घोषणा पहले ही प्रधानमत्री कार्यालय ने की और सभी लोग आर एस एस थिंक टैंक का हिस्सा हैं। प्रणब मुख़र्जी राष्ट्रपति बनते ही अपने प्रिय अधिकारियों को राष्ट्रपति भवन लाये लेकिन ये सुविधा रामनाथ कोविंद को नहीं है। मतलब साफ़ है कि राष्ट्रपति जी के भाषण पर संघ के विशेषज्ञोंकी पारखीनज़र होगी ताकि वह देख सके के गाँधी, पटेल का नाम हो तो नेहरु का न हो। बाबा साहेब का नाम हो लेकिन केवल दिखावे के लिए।

बसपा प्रमुख सुश्री मायावती ने कहा के गाँधीजी की समाधि में जाने के साथ-साथ राष्ट्रपति यदि संसद के सेंट्रल हॉल में बाबा साहेब की फोटो या उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर देते तो देश को एक बहुत बड़ा सन्देश जाता। उन्होंने ऐसा नहीं किया तो साफ़ सन्देश है कि वह संघ की मित्रमंडली की सलाह के अनुसार चलेंगे।

अगर ट्विटर पर हुए भक्तो के हल्ले से कुछ दिखाई देता है तो वे राष्ट्रपति भवन में एक ‘राम’ के आने से बहुत प्रसन्न हैं क्योंकि उन्हें अब लगता है के अयोध्या में राम मंदिर के लिए अब सारे रस्ते साफ़ होते जा रहे हैं।

वैसे राष्ट्रपति का पद संवैधानिक तौर पर महत्वपूर्ण होता है जिसको आप जैसे व्याखित करना चाहे कर सकते हैं। लेकिन आज कोविंद जी के राष्ट्रपति पद पर हमें उन रोल मॉडल्स को भी देखना चाहिए और फिर अन्य का भी थोड़ा विश्लेषण कर लेना चाहिए देश और समाज के सेहत के लिए अच्छा रहेगा क्योंकि सबको पता चलना चाहिए के संघ के लिए कुछ लोग बहुत अच्छे और कुछ घृणित क्यों हैं।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद बड़े विद्वान थे और प्रधानमंत्री नेहरू से उनके मतभेद जगजाहिर थे। राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर का सरकारी खर्चे से जीर्णोधार करवाना  चाहते थे जबकि नेहरु नहीं।

बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा मेहनत से ड्राफ्ट किये गए हिन्दू कोड बिल पर अक्सर कई लोग नेहरू को गरियाते हैं लेकिन उस वक़्त के हालत पे लोग भूल जाते हैं कि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद इस बिल के बहुत खिलाफ थे।

वैसे एक कहानी और भी प्रचलित थी कि राष्ट्रपति जी उस वक़त ब्राह्मणों के पैर धोकर भोजन करवाते थे। कुल मिलाकर एक विद्वान राष्ट्रपति लेकिन घोर परम्परावादी।

डॉ राधाकृष्णन एक बड़े विद्वान माने जाते हैं। उन्होंने वैदिक धर्मग्रंथो वेदांत, गीता की व्याख्याएं की और बुद्ध को भी हिन्दू धर्म में डालने का ‘वेदान्तिक’ प्रयास किया। वैसे उनकी पूरी जीवन कहानी उनके इतिहासकार पुत्र सर्वपल्ली गोपाल ने लिखी है सबको पढ़ना चाहिए।

एपीजे अब्दुल कलाम को संघ शुरू से ही पसंद करता रहा है क्योंकि वो उसकी आदर्श मुस्लिम की व्याख्या में अच्छे से फिक्स होते हैं। मतलब वो मुसलमान जो गीता पढ़े और कुरान छोड़े या मुसलमानों के प्रश्न को केवल ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद के सांचे में ढाल दे। वो व्यक्ति जो मुसलमानों के मूलभूत प्रश्नों पर उनसे सवाल करने को न कहे और केवल अंपने को दोष देकर भारतीय राष्ट्र राज्य के लिए केवल सैन्य विजय की बात करता रहे।

प्रणब मुख़र्जी को संसदीय प्रणाली का गुरु माना जाता है। इतने वर्षो तक वह कांग्रेस पार्टी, इसके विभिन्न मंत्रालयों, उसकी विशेषज्ञ समितियों के प्रमुख रहे। उनके विरोधी भी उनके संसदीय ज्ञान और उस पर पकड़ का सम्मान करते हैं, लेकिन मुख़र्जी के जीवन में एक भी ऐसा वाकया नहीं होगा जहाँ वह सामाजिक न्याय की मजबूती से वकालत करते नजर आये हों। पिछले तीन वर्षो में उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया जिस पर कोई यह कह सके कि वो एक मज़बूत राष्ट्रपति थे जो अपनी बातों को शब्दों की बाजीगरी से हटकर मजबूती से रखे। जो थोड़ा बहुत ‘क्रांति’ उनके वक्तव्यों में दिखाई दी वो भी तब जब उन्हें अंदेशा हो चुका था कि अब दोबारा इस पद पर वे नामित नहीं होने जा रहे।

बहुत से लोगो को ये शिकायत थी कि राष्ट्रपति जी ने पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन का नाम तक नहीं लिया, लेकिन क्यों ले? नारायणन ने अटल विहारी वाजपेयी के समय रबर स्टैम्प बनने से मना कर दिया। उन्होंने बहुत से बिल वापस किये और आँख बंद कर हर कागज़ पर दस्तखत नहीं किये। उस वक़त के सरकार उनके वक्तव्यों से परेशान थी।

नारायणन ने उस दौर में देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और उसकी विरासत को अपने भाषणों और कार्यो से जिन्दा रखा। ये पहली बार हुआ जब किसी राष्ट्रपति ने बाबा साहेब आंबेडकर को इतने बेहतरीन तरीके से विश्लेषित कर जनता के समक्ष रखा। जातिगत भेदभाव, छुआछूत और गरीबी पर उन्होंने जिस तरीके से देश की संसद और अन्य स्थानों पर बाबा साहेब आंबेडकर की बातो को रखा, वो अविस्मरणीय है।

राष्ट्रपति भवन को जिस शख्सियत ने सबसे मजबूती प्रदान की वह थे ज्ञानी जैल सिंह, जिन्होंने बता दिया कि वह सरकार की हर बात को मानने को तैयार नहीं हैं और सरकार को उन्हें जानकारी देनी ही पड़ेगी।

सभी जानते हैं कि ज्ञानीजी को श्रीमती इंदिरागांधी ने 1982 में कांग्रेस पार्टी की और से राष्ट्रपति पद के लिए मनोनीत किया था और पार्टी की शक्ति के चलते वो आसानी से राष्ट्रपति बने थे। उनके राष्ट्रपति बनने पर ऐसा कहा गया के उन्होंने कहा के अगर श्रीमती गाँधी बोलेंगी तो मैं उनके घर में झाड़ू भी लगाने को तैयार हूँ। जो लोग भारतीय राजनीति को जानते हैं वो ये जरूर जानते होंगे कि व्यक्तिगत निष्ठां सत्ता के करीब आने का एक बहुत बड़ा कारण होता है और अगर जैल सिंह को इंदिराजी ने चुना तो वो इसलिए के वह 1975 के फखरूदीन अली अहमद की तरह कार्य कर सके जिन्होंने 25 जून 1975 को कैबिनेट के बिना मीटिंग के किये गए विधेयक पर दस्तखत कर देश में आपातकालीन स्थिति के घोषणा कर दी थी।

श्रीमती गाँधी जैसे सशक्त व्यक्तित्व को राष्ट्रपति भवन में ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो उनके इशारों पर काम करे और कोई अडंगा न लगाए। दुर्भाग्यवश अक्टूबर 1984 में श्रीमती गाँधी की हत्या हो गयी। ज्ञानी जी ने यहाँ पर फखरूदीन अली अहमद का रोल निभाया। उन्होंने कांग्रेस पार्टी की संसदीय दल की बैठक के बिना ही अरुण नेहरु और आर के धवन के इशारे पर राजीव गाँधी को कांग्रेस पार्टी के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी।ये कार्य इतना द्रुतगति से हुआ के देश में इस पर चर्चा करने का समय भी नहीं था।

असल में राजीव उस समय बंगाल के दौरे पर थे और जब उन्हें तुरंत दिल्ली आने की सूचना दी गयी तो उनके साथ में प्रणब मुख़र्जी थे। ऐसा कहा जाता है कि हवाई जहाज से दिल्ली आते समय राजीव ने प्रणब मुख़र्जी से पूछा कि प्रधानमंत्री किस बनाया जाना चाहिए तो प्रणब मुख़र्जी ने संसदीय परम्पराओं का हवाला देते हुए कैबिनेट के सबसे सीनियर मंत्री जो प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में कैबिनेट की अध्यक्षता करता हो, उसका नाम कहा।

बात साफ थी प्रणब चाहते थे उनका नाम आगे किया जाए। वैसे नरसिम्हाराव की भी वही चाहत थी। प्रणब मुखर्जी की बात से राजीव शायद बहुत डिस्टर्ब हुए क्योंकि उनके दिमाग में यह रहा होगा कि प्रणब मुख़र्जी उनके नाम की बात कहें।

खैर, ज्ञानी जी ने अपना व्यक्तिगत धर्म निभाया और राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी। प्रधानमंत्री बनने के एक महीने के अन्दर ही कांग्रेस ने आम चुनावों की घोषणा कर दी और दिसंबर 1984 हुए इन आम चुनावों में राजीव गाँधी की कांग्रेस को अभूतपूर्व बहुमत मिला जिसमे विपक्ष का सूपड़ा साफ़ हो गया। संसद विपक्षहीन हो गयी। इस अप्रत्याशित जीत ने राजीव को अतिविश्वासी बना दिया और उन्होंने संसदीय परम्पराओं को अनदेखी करना शुरू कर दी। सबसे बड़ी बात यह हुई कि धीरे-धीरे राजीव ने ज्ञानी जी के साथ भी परम्परागत शिष्टाचार छोड़ दिया, क्योंकि राजीव जिस बैकग्राउंड से आये थे उसमें अपने अलावा किसी और को महत्व न देना एक महत्वपूर्ण बात थी। जब ज्ञानी जी ने इसकी शिकायत की तो उनको अनसुना कर दिया गया।

ज्ञानी जी पंजाब से पिछड़ी जाति से आते थे और बहुत ही मिलनसार और जमीनी व्यक्तित्व थे। उन्हें गुरमुखी और उर्दू में महारत थी लेकिन हिंदी भी ठीक-ठाक बोलते थे। भारत के शहरी मध्यमवर्गीय समाज में अक्सर उनकी मजाक उड़ाई जाती क्योंकि वो अंग्रेजी नहीं जानते थे।

राजीव उस वक़्त शहरी हिन्दुओं के अभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे, बढ़िया अंग्रेजी और चलताऊ हिंदी बोलते थे, इसलिए लोगों को उन पर फख्र था। जैल सिंह सज्जन, उर्दू की शेरो-शायरी करने वाले व्यक्ति, तकनीक तौर पर कम पढ़े लिखे इसलिए सवर्ण मानसिकता के हिन्दुओं में उनके ज्ञान और भाषा को लेकर चुटकुले और घटिया मजाक होते थे। शायद यही मानसिकता के चलते राजीव उन्हें महत्त्व नहीं देते थे लेकिन प्रश्न व्यक्ति का नहीं अपितु उस पद का था जिस पर ज्ञानी जी बैठे थे और उसका अपमान नहीं बर्दाश्त किया जा सकता था, लेकिन ऐसा हुआ।

राजीव के अति आत्मविश्वास के चलते ही वो भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरते चले गए। वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को पहले रक्षा मंत्रालय भेजा गया और फिर वहा से कांग्रेस पार्टी से ही निकाल दिया गया।

ज्ञानी जी एक प्रखर राजनीतिज्ञ थे क्योंकि वो पंजाब के मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री भी थे और उन्हें शासन की छोटी-छोटी बातों का ज्ञान था। ज्ञानी जी ने संविधान विशेषज्ञों को बुलाना शुरू किया और राष्ट्रपति के अधिकारों को लेकर बहस शुरू हुई।

राजीव ने राष्ट्रपति भवन पर ही आरोप लगा दिया कि वह साजिश कर रहे हैं। राजीव के चमचों की एक बहुत बड़ी फौज थी जो ज्ञानी जी और वी पी सिंह को टारगेट कर रही थी। मीडिया में एम जे अकबर जैसे उनके पिट्ठू झूठ का पुलिंदा छाप रहे थे।

ऐसा कहा जाता है कि ज्ञानी जी ने वी पी सिंह को राष्ट्रपति भवन बुलाकर उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव किया था लेकिन वी पी केवल एक मँझे हुए राजनेता थे लेकिन नैतिकता के मापदंडो पर उनके समकक्ष आज भी कोई समकालीन नेता नहीं टिकता। उन्होंने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था।

देश के दो सबसे मूर्धन्य पत्रकारों के बीच बड़ी बहस हो रही थे। ये थे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक श्री गिरी लाल जैन और दूसरे इंडियन एक्सप्रेस के श्री अरुण शौरी। हालाँकि दोनों ही संघ के ‘विद्वानों’ की श्रेणी में आ चुके थे।

जैन का कहना था कि राष्ट्रपति को कानूनन चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन शौरी कह रहे थे कि यदि सरकार राष्ट्रपति को उसके कार्यकलापों की जानकारी नहीं देती तो उन्हें ऐसा करने का अधिकार है।

देश के बड़े-बड़े संविधान विशेषज्ञ इस बहस में कूद गए, लेकिन अंत में ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि एक समझदार राजनेता ने उनका मुहरा बनने से मना कर दिया।

ऐसा सभी जानते हैं के वी पी उस वक़्त भी प्रधानमंत्री बनते तो उनकी पॉपुलैरिटी राजीव से बहुत आगे बढ़ चुकी थी और लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में उन्हें एक प्रमुख स्तम्भ मान रहे थे। हालाँकि ज्ञानी जी भी बहुत आगे बढ़ चुके थे, लेकिन यह भी हकीकत है कि सत्ता का नशा जब सर के ऊपर से चला जाता है तो लोग इन संवैधानिक मर्यादाओं को भूल जाते हैं।

जैल सिंह ने राजीव गाँधी की मजबूत सरकार को अंतत ये बता दिया कि राष्ट्रपति मात्र सरकार के कामकाजों पर मुहर लगाने वाला व्यक्ति नहीं ये अपितु उसके ऊपर संविधान की मर्यादाओं को बचाने की जिम्मेवारी भी है।

राम कोविंद जी को पता नहीं याद है या नहीं लेकिन ये बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने न आरं नारायणन और न के जैल सिंह को याद किया।

आज का दौर भी कुछ राजीव गाँधी की तरह है। आज नरेन्द्र मोदी के रूप में एक ताकतवर नेता प्रधानमंत्री है और संघ अपना एजेंडा चलाना चाहता है। क्या राम कोविंद देश के संविधान की हिफाजत करेंगे या फखरूदीन अली अहमद बनेंगे जिन्होंने बिना कागज देखे दस्तखत कर देश के ऊपर राजनैतिक आपातकाल लगा दिया।

आज का दौर 1975 और 1984 से ज्यादा भयावह है जब गैर संवैधानिक शक्तिया देश में हाहाकर मचा देना चाहती हैं और संविधान की मूल भावना को ही खोद देना चाहती हैं ऐसे में देश के राष्ट्रपति पर एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी है जिसको वह ईमानदारी निभाकर वह इतिहास में दर्ज हो जायेंगे नहीं तो फखरूदीन अली अहमद की तरह भुला दिए जायेंगे।

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