विश्व हिंदी सम्मेलन आरएसएस और विहिप का मंच बन चुका है

विश्व हिंदी सम्मेलन विफल होने के लिये अभिशप्त है। और यह अभिशाप एक सम्मेलन से दूसरे सम्मेलन तक जारी रहेगा। विश्व हिंदी सम्मेलन में एक ही बार गया था। उस बार लंदन में उसे आयोजित किया गया था। डॉएचे वेल्ले हिंदी विभाग के लिये द्विपाक्षिक संबंधों की दृष्टि से उसका एक महत्व था, विभाग के …
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विश्व हिंदी सम्मेलन विफल होने के लिये अभिशप्त है। और यह अभिशाप एक सम्मेलन से दूसरे सम्मेलन तक जारी रहेगा।
विश्व हिंदी सम्मेलन में एक ही बार गया था। उस बार लंदन में उसे आयोजित किया गया था। डॉएचे वेल्ले हिंदी विभाग के लिये द्विपाक्षिक संबंधों की दृष्टि से उसका एक महत्व था, विभाग के अध्यक्ष डा. फ़्रीडमान्न श्लेंडर हर सम्मेलन में जाते थे, वहां पेपर पढ़ते थे, साथ ही भारत के अलावा अन्य देशों के हिंदी जगत के साथ संपर्क के लिये यह सम्मेलन एक महत्वपूर्ण साधन था।
खुद को हिंदी जगत का समझने के कारण इस सम्मेलन के प्रति मेरा दृष्टिकोण कुछ अलग था, मेरी अपेक्षायें अलग थीं। उनका आधार था इस सम्मेलन के चरित्र के बारे में जानकारी का अभाव और उससे उत्पन्न ग़लतफ़हमियां।
लंदन जाने के बाद ये ग़लतफ़हमियां दूर हो गईं। मैं जानता था कि शुरू से ही भारत की सत्तारूढ़ पार्टी अपने प्रचार के लिये इसका उपयोग करती रही है। लंदन सम्मेलन में इसे बर्दाश्त करने के लिये मैं तैयार होकर गया था। लेकिन मुझे यह पता नहीं था कि इस बीच यह सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद का एक मंच बन चुका है। उसी के तहत इसका एजेंडा तय किया जाता है, और हर सम्मेलन में इस एजेंडे की दरिद्रता, व उसके साथ ही, हिंदी के विकास की परिकल्पनाओं की सीमाएं व समस्याएं नग्न रूप से सामने आती हैं।
मेरी राय में हर भाषा के विकास की कुछ बुनियादी शर्तें हैं : भाषियों के बीच भाषा की व्यापकता व गहराई को प्रतिष्ठित करना, समयानुकूल परिवर्तनों की एक स्वच्छंद स्वतःस्फूर्त प्रक्रिया को प्रेरित व प्रोत्साहित करना, और अन्य भाषाओं के साथ एक जीवंत संवाद तैयार करना – उनके अनुभवों से फ़ायदा उठाना।
इन सबसे परे हिंदी जगत ने अपना एक मानक बनाया है : हिंदी को राजभाषा बनाना। और इसकी वजह से एक हास्यास्पद स्थिति उभरती है – ऐसा लगता है मानो चिथड़े पहना एक भिखारी टीले पर उंकड़ू मारे बैठा हो और उसे सिंहासन समझ रहा हो। यहां भी राजा की पोशाक की उपमा बरबस मन में आती है।
मूलतः इसी स्थिति के कारण विश्व हिंदी सम्मेलनों में एक महानौटंकी का परिदृश्य बनता है। इसका शीर्षक है – राजभाषा से विश्वभाषा तक। जो भाषा अपने भाषियों की भाषा नहीं बन पाई है, उसकी ऐसी महत्वाकांक्षा की नियति क्या हो सकती है, समझना मुश्किल नहीं है।
फ़िजी, न्युयार्क, मॉरीशस, लंदन, या भोपाल – कहीं भी इसका आयोजन किया जाय, यह सम्मेलन विफल होने के लिये अभिशप्त है। और यह अभिशाप एक सम्मेलन से दूसरे सम्मेलन तक जारी रहेगा।

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