Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना
Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

वेनेजुएला सिर्फ तीन लाशों का बोझ ढो नहीं सका, नोटबंदी रद्द : भारत में करोड़ों लाशें ढोने के लिए कितना इंच का सीना चाहिए

वेनेजुएला सिर्फ तीन लाशों का बोझ ढो नहीं सका, नोटबंदी रद्द : भारत में करोड़ों लाशें ढोने के लिए कितना इंच का सीना चाहिए

वेनेजुएला में तेल का कारोबार चौपट, नोट कौड़ियों के भाव और देश पर विदेशी माफिया का कब्जा

हम किस माफिया के शिकंजे में हैं?

पलाश विश्वास

अभी अभी जगदीश्वर चतुर्वेदी के ताजा स्टेटस से मालूम पड़ा कि प्रेमचंद का मकान ढह गया!

यह है भारतीयों की लेखक के प्रति असभ्यता का नमूना!

हमें इतिहास का बदला चाहिए हर कीमत पर और हम इस मकसद को हासिल करने के लिए राम की सौगंध खाकर मुक्त बाजार के कारपोरेट हितों के लिए राम का नाम लेकर राम से विश्वासघात करने में तनिक हिचकिचा नहीं रहे हैं। तो प्रेमचंद हो या अनुपम मिश्र ये हमारे लिए किसी खेत की मूली नहीं है।

मूली का हम क्या परवाह करे हमें तो न खेत की परवाह है और न खलिहान की। न प्रकृति की न मनुष्य की।

करोड़ों लाशें ढोने के लिए कितना इंच का सीना और कितने मजबूत कंधे चाहिए? वेनेजुएला में राष्ट्रपति ने नोटबंदी का फैसला उस समय वापस ले लिया जब देश भर में इसके खिलाफ आवाज उठने लगी।

गनीमत समझिये कि भारत में अभी आम जनता का गुस्सा सार्वजिनक सुनामी नहीं है। नकदी संकट अगर साल भर जारी रहा तो कैशलैस डिजिटल अर्थव्यवस्था बन जाने से पहले कहां कहां कितने ज्वालामुखी फूट पड़ेंगे इतने बड़े देश में, तानाशाह हुकूमत को इसका कोई अंदाजा नहीं है।

बाकी जनता जिस रकम पर साठ फीसद तक आयकर दें, उसी रकम के कालाधन होने की हालत में पचास फीसद कुल कर जमा करके सफेद धन बनाया जा सकता है।

तो राजनीतिक दल में बेनामी बेहिसाब अंतहीन कालाधन देस के विकास में भविष्य में हिस्सेदारी के हवाला मार्फत हजारों लाखों करोड़ रुपये जमा करने का खुल्ला खेल फर्रूखाबादी है और जनता को गुस्सा कतई नहीं आ रहा है।

इसी बीच ताजा फतवा जारी हुआ है। नोटबंदी के बाद वित्त मंत्रालय ने बैंक खातों में पुराने नोट जमा करने की सीमा तय कर दी है। वित्त मंत्रालय के नए दिशा-निर्देश के मुताबिक,  बैंक खाते में केवल एक ही बार 5000 रुपये से ज्यादा की रकम पुराने नोट में जमा करा सकेंगे।

वेनेजुएला में जो हुआ है, गनीमत है, भारत में वेसा कुछ अभी हुआ नहीं है। मसलन वेनेजुएला में नकदी के संकट के कारण हजारों दुकानें बंद हो गईं।  लोग क्रेडिट कार्ड या बैंक ट्रांसफर के जरिये लेन-देन करने के लिए बाध्य हो गए। कई लोगों के साथ तो संकट इस कदर गंभीर हो गया कि उनके लिए खाने-पीने की चीजें खरीदना मुश्किल हो गया।

हमारा गुस्सा ठंडा है क्योंकि हम उस तरह काले नहीं हैं जैसे लातिन अमेरिका और अफ्रीका के लोग काले हैं। श्वेत वर्चस्व का मुकाबला करना वहां पीढ़ी दर पीढ़ी शहादतों का सिलसिला है।

हम तो अपना काला रंग गोरा बनाने की क्रीम से गोरा बना चुके हैं और नहीं भी बनाया होगा तो विशुध आयुर्वेदिक कोमल त्वचा बाजार में उपलब्ध है।

हम अछूत हुए तो क्या, बहुजन और आदिवासी हुए तो क्या, हम सारे लोग हिंदू है और हिंदू राष्ट्र में गुलामी रघुकुल परंपरा का रामराज्य है।

इसलिए सत्ता वर्ग को फिलहाल कोई खतरा नहीं है कि यहां लातिन अमेरिका, य़ूरोप या अप्रीका जैसा कोई जनविद्रोह कभी होगा।

हम अपनों का खून बहाना अपना परम कर्तव्य मानते हैं लेकिन खून बहने के डर से, चमड़ी में आने के डर से, हिंदुत्व की पहचान और हैसियत खोने के डर से गुलामी का न्रक जीने के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी अभ्यस्त हैं।

वेनेजुएला सिर्फ तीन लाशों का बोझ ढो नहीं सका, नोटबंदी रद्द।

भारत के बाद वेनेजुएला में भी नोटबंदी की गई। लेकिन वहां के लोग भारत के लोगों की तरह शांत स्वभाव के नहीं निकले जिसकी वजह से वहां हिंसा हो रही है।

कुछ खबरों के मुताबिक,  उस हिंसा में अब तक दर्जनों दुकानें लूटी जा चुकी हैं और तीन लोगों की जान भी जा चुकी है।

हमारे यहां नरसंहार भी हो जाये तो हमारी नींद में खलल नहीं पड़ती।

अभी नोटबंदी की कतार में तो इतने बड़े देश में सिर्फ सौ सवा सौ लोग ही मारे गये हैं। हम तो दिलोजान से ख्वाहिशमंद है कि इस देश को सेना के हवाले कर दिया जाये।

गौरतलब है कि वेनेजुएला में तेल का कारोबार चौपट, नोट कौड़ियों के भाव और देश पर विदेशी माफिया का कब्जा। वेनेजुएला सरकार ने अपने नोटबंदी के फैसले को वापस ले लिया है।

अभी तक भारत में नोटबंदी के खिलाफ ऐसा कुछ हुआ नही है। जाहिर है कि सारे लोग तानाशाह के वफादार गुलाम हैं और शाही फरमान की हुक्मउदुली करने की रीढ़ किसी के पास कहीं नहीं है। छप्पन इंच सीना और सांढ़ जैसे कंधों की बहार है।

हम किस माफिया के शिकंजे में हैं?

वेनेजुएला में माफिया देश के बाहर है। कहां है, वह भी मालूम है। कोलंबिया में माफिया का बेस है, जिसे अमेरिकी समर्थन है।

हमारे यहां माफिया देश के अंदर है और देश के बाहर के माफिया गिरोहों के साथ वे गोलबंद हैं।

हमारे राजनीतिक दल माफिया हैं। उन माफिया गिरोहों के हम सारे लोग भाड़े के टट्टू हैं। लठैत और शूटर हैं। समर्थक हैं।

सारे लोकतांत्रिक संस्थान और राजकाज की तमाम एजंसियां माफिया गिरोह में तब्दील हैं।

राजनीतिक दल,  मीडिया,  राजनेता,  बिल्डर,  प्रोमोटर माफिया है और पूरा तंत्र सिंडिकेट है। जिसे फिर अमेरिका के साथ इजराइल का समर्थन है।

माफिया हमारा लोकतंत्र है तो माफिया हमारा कारोबार और धर्म कर्म है।

जल जंगल जमीन माफिया गिरोह के शिकंजे में है और हमारी जिंदगी और हमारी मौत भी उन्ही की मुट्ठी में कैद हैं। यह माफिया ग्लोबल है।

हम तो अमेरिका बना रहे हैं देश को या फिर हम इजराइल बना रहे हैं देश। सबका अपने-अपने हिस्से का देश है।

कोई पाकिस्तान बना रहा है तो कोई बांग्लादेश बना रहा है।

देश के हर हिस्से में देश बन रहा है। इन दिनों और देश उपनिवेश बन रहा है। यहां सबकुछ विदेशी हाथों में है।

इंदिरा गांधी के बाद इस देश में जो भी कुछ हो रहा है, उसके पीछे पूंजी किसी की भी हो, कमसकम अमेरिकी या इजराइली हाथ नहीं है। क्योंकि सत्ता उन्हीं की है।

इस दौरान हालांकि पाकिस्तान का हाथ बहुत लंबा हो गया है और नोटबंदी और नकदी संकट दोनों के पीछे पाकिस्तान का हाथ है और बाकी हाथों में तो हमारा अपना काला हाथ है।

अब पाकिस्तान के खिलाफ युद्धोन्माद हमारी राजनीति है और वही हमारी अर्थव्यवस्था है। वही हमारा रामराज्य आंदोलन का हिंदुत्व पुनरूत्थान है, जिसमें साझेदार फिर अमेरिका और इजराइल है। यही ग्लोबल हिंदुत्व है।

सत्ता वर्ग का देश दिल्ली है और आम जनता का देश उनका अपना-अपना गांव या जनपद है। दोनों देशों के बीच कोई दोस्ती है नहीं है।

दिल्ली की हुकूमत है और हुकूमत गांव और जनपदों के हिस्से के देश को कुचल रही है।

यह सैन्य दमन देश का हमारी स्वतंत्रता और लोकतंत्र का संवैधानिक सलवा जुड़ुम है। बाकी किसी का कोई देश नहीं है।

मौजूदा कृषि संकट और आर्थिक आपातकाल (Current agricultural crisis and economic emergency) का पर्यावरण परिदृश्य यही है।

बहरहाल वेनेजुएला की राजधानी कराकस (Caracas, the capital of Venezuela) से खबर है कि वेनेजुएला में विरोध बढ़ने के साथ समस्या में घिरे राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने अपनी मंकी बातों में कल कहा कि 100 बोलिवर का नोट अस्थायी रूप से वैध मुद्रा बनी रहेगी, लेकिन कोलंबिया तथा ब्राजील से लगी सीमा बंद रहेगी ताकि माफिया ने जो वेनेजुएला की मुद्रा अपने पास जमा कर रखी है,  वे इससे प्रभावित हों। उन्होंने कहा कि यह देश को अस्थिर करने की साजिश है जिसे अमेरिका समर्थन दे रहा है।

भारतीय मीडिया ताजा नोटबंदी की इस नाकामी की खबर को वेनेजुएला के तेल संकट से जोड़कर इसके मुकाबले भारत की अर्थव्यवस्था (Economy of India) की मजबूती की सुनहली तस्वीरें पेश करते हुए छप्पन इंच सीने और सांढ़ जैसे मजबूत कंधे का गुणकीर्तन करते हुए अघा नहीं रहे हैं।

हमारे मीडिया वाले वेनेजुएला के तेल निर्भर अर्थव्यवस्था (Oil dependent economy) की दुर्गति का बखान करते हुए कृषि निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था या अर्थव्यवस्था में कृषि की प्रासंगिकता पर भूलकर भी चर्चा नहीं कर रहे हैं।

जब तक देश इराक या अफगानिस्तान न बने, जब तक वियतनाम की तरह कार्पेट बमबारी न हो, जब तक हिरोशिमा या नागासाकी जैसी तबाही का मंजर न हो,  किसी गुजरात नरसंहार, किसी भोपाल त्रासदी, सिखों के नरसंहार, सलवाजुड़ुम या देश व्यापी दंगों का जैसे हमारी सेहत पर कोई असर नहीं होता और सरहदों के युद्ध से हम जैसे बाग बाग हो जाते हैं, उसी तरह भारत के कृषि संकट, आर्थिक आपातकाल या पर्यावरण जलवायु संकट से हमारी सेहत पर कोई असर नहीं हो सकता।

जब तक हम खुद मौत का समाना नहीं करते, कौन मरता है या जीता है, हमें कोई मतलब नहीं है।

अनाज उत्पादन फिलहाल पर्याप्त होने की वजह से क्रयशक्ति से लबालब शहरी पढ़े-लिखे लोगों को कृषि संकट और किसानों की आत्महत्या से कोई फर्क नहीं पड़ता।

अनाज उत्पादन मांग से कम हो, अनाज की किल्लत हो जाये और नकदी होने के बावजूद लोग दाने दाने को मोहताज हो जाये, तब कहीं ये पढ़े लिखे मलाईदार लोग भारतीय अर्थ व्यवस्था में कृषि का महत्व समझेंगे।

नोटबंदी ने ने जिस तरह किसानों को कंगाल बना दिया है और शून्य कृषि विकास दर की स्थिति में अनाज उत्पादन की नाकेबंदी कर दी है, खरीफ की फसल बिकी नहीं है और रबी की फसल बोयी नहीं गयी है, आशंका है कि बंगाल की भुखमरी की देशव्यापी संक्रमण की हालत में, इतिहास में वापसी के सफर में ही हमारे पढ़े लिखे लोग कृषि विज्ञान का तात्पर्य समझेंगे।

याद करें 2008 की मंदी के दौर को, जिसका असर भारतीय अर्थ व्यवस्था पर कुछ भी नहीं हुआ तो इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि तब भी भारतीय अर्थ व्यवस्था पूरी तरह ग्लोबल हुई नहीं थी और ग्लोबल इशारों का कोई असर इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि शेयर बाजार के अलावा औद्योगिक ढांचा तब भी मजबूत था और उत्पादन प्रणाली भी काम कर रही थी। भारतीय आम जनता का शेयर बाजार से कुछ भी लेना देना नहीं था।

पिछले आठ सालों के दरम्यान आम जनता को भी व्यापक पैमाने पर शेयर बाजार से जोड़ दिया गया है। अब पेंशन, बीमा से लेकर सबकुछ शेयर बाजार से नत्थी हैं और शेयर बाजार में तब्दील है पूरी अर्थ व्यवस्था।

हर क्षेत्र में विनिवेश हो जाने से और सरकारी क्षेत्र के निजीकरण से देश का बुनियादी ढांचा अब विदेशी पूंजी के हवाले हैं।

वेनेजुएला की अर्थ व्यवस्था पर काबिज माफिया हमारे यहां अर्थ व्यवस्था पर जहरीली नागकुंडली विदेशी पूंजी है, जिसकी नाभि नाल ग्लोबल इकोनामी से जुड़ी है और पत्तियों के खड़कने से ही जिसमें सुनामी आ जाती है।

अब शेयर बाजार में मामूली उतार चढ़ाव से मामूली निवेशकों के लाखों करोड़ एक झटके में माफिया की मुनाफा वसूली है और यही डिजिटल कैशलैस इकोनामी है। दस दिगंत साइबर फ्राड का मुक्त बाजार है उपभोक्ता कार्निवाल। मनस्मृति शासन की बहाली है। बहुजनों का नस्ली नरसंहार है, जिसमें मारे जायेंगे अछूत भूगोल के स्वयंभू देव देवी अवतार और सवर्ण भी। गरीब अपढ़ अधपढ़ गवांर ब्राह्मण भी आखिरकार मारे जायेंगे इस बनियाराज में।

हमने भी देश के प्राकृतिक संसाधनों को विदेशी तत्वों के हवाले कर दिया है।

हमने भी तेल युद्ध से तबाह हो गये खाड़ी के देश, अरब वसंत से तबाह हुए पश्चिम एशिया और अरब के देश तो हमने वह युद्धस्थल दक्षिण एशिया में स्थानांतरित करके अमेरिकी युद्धक कारपोरेट डालर अर्थव्यवस्था से अपनी अर्थव्यवस्था नत्थी करके अगवाड़ा पिछवाड़ा सबकुछ मुक्त बाजार बनाते हुए आम जनता को कंगाल बना दिया है।

अब हमारी अर्थव्यवस्था की कोई उत्पादन प्रणाली नहीं है।

इस देश के वित्तीय प्रबंधन कारपोरेट माफिया गिरोह के शिकंजे में है।

डाल-डाल, पत्ती-पत्ती कारपोरेट माफिया काबिज है।

हम भी तेजी से पाकिस्तान बांग्लादेश बनने के बाद यूनान,  अर्जेंटीना,  नाइजीरिया,  वेनेजुएला, कोलंबिया और मेक्सिको, पूर्व यूरोप और पश्चिम एशिया बनने लगे हैं।

छत्तीस साल की पेशेवर नौकरी के बाद अचानक बूढ़ा हो गया हूं। बूढ़ों और बच्चों से हमारी हमेशा खास दोस्ती रही है। लेकिन खुद के बुढ़ापे का बोझ ढोना मुश्किल हो रहा है।

जाहिर है हम जैसे लोगों का सीना छप्पन इंच का नहीं होता और न कंधे सांढ़ की तरह मजबूत हैं। सदमों को झेलने की आदत अभी बनी नहीं है।

सदमा तो हम रोज रोज झेल रहे हैं। सदमों और झटकों से आम जनता की तरह हम अबतक बेपरवाह ही रहे हैं। इसी वक्त बुढ़ापा आना था।

असहाय पहले से हो गया था। संवाद की गुंजाइश है ही नहीं और अघोषित आपाताकाल (Undeclared emergency) है। सामाजिक सक्रियता हमारी लेखन के दम पर है। अब वह लेखन जारी रखना भी बेमतलब लग रहा है। अखबारों में होते हुए हम हमेशा अखबारों से बाहर रहे हैं। लघु पत्रिकाओं से बाहर हुए भी पंद्रह सोलह साल हो गये। अब हस्तक्षेप के अलावा सोशल मीडिया से भी बाहर हूं। ब्लागिंग बेहद मुश्किल हो गयी है। पैसे के लिए कभी लिखा नहीं है और न आगे लिख सकता हूं। लेकिन जिनके लिए अब तक लिखता रहा हूं, उन तक पहुंचने के सारे रास्ते और दरवाजे एक एक करके बंद है।

अघोषित सेंसरशिप है और सोशल मीडिया पर भी सेंसरशिप (Censorship on social media) है। अभिव्यक्ति की नाकाबंदी है।

इन्हीं परिस्थितियों में हस्तक्षेप पर अरुण तिवारी और ललित सुरजन के आलेखों से अनुपम मिश्र के अवसान की खबर मिली तो स्तब्ध रह जाना पड़ा।

सुबह से कई बार टीवी देख रहा था। लेकिन टीवी से यह खबर हमें नहीं मिली।

मीडिया के लिए अनुपम मिश्र का निधन जाहिर है कि बड़ी खबर नहीं है और खबर है भी तो इसे वे दूसरी खबरों की तरह चौबीसों घंटा दोहराना नहीं चाहते।

बचपन से कविताएं लिखता रहा हूं। लेकिन कवि होने की महात्वाकांक्षा की हमने जिन लोगों को देखकर इतिश्री कर दी थी, उनमें से अनुपम मिश्र खास हैं।

अनुपम मिश्र, सुंदरलाल बहुगुणा, अनिल अग्रवाल (वेदांत वाले नहीं) और भारत डोगरा के लेखन से परिचित होने के बाद सृजनधर्मी रचनाकर्म के बदले प्रकृति और मनुष्यता के बारे में लिखना हमारी प्राथमिकता रही है।

यह हमारे लिए निजी अपूरणीय क्षति है।

नवउदारवाद की अवैध संतानों के हाथों में सत्ता की कमान है। राजनीति करोड़पतियों, अरबपतियों और खरबपतियों की रियासत, जमींदारी या जागीर है।  अर्थव्यवस्था सपेरों, मदारियों और बाजीगरों के हवाले हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था बुनियादी तौर पर कृषि अर्थव्यवस्था है, दस दिगंत अगवाड़ा पिछवाड़ा खुले मुक्त बाजार के नंगे कार्निवाल में कोई इसे मानेगा नहीं।

दो करोड़ के करीब वेतनभोगियों और पेंशन भोगियों की औकात सामने हैं, जो खुद को खुदा से कम नहीं समझते हैं। सारा तंत्र मंत्र यंत्र उनके भरोसे हैं। सत्ता एढ़ी चोटी का जोर लगाकर हर कीमत पर उन्हें खुश रखना चाहती है।

राज्य सरकारों का सारा खजाना वेतन और भत्तों में खर्च हो जाता है। लेकिन नोटबंदी में वे वेतन और पेंशन बैक में जमा होने के बावजूद आम जनता के साथ कतार में खड़े हैं।

एटीएम और बैंकों से उनकी भी लाशें निकल रही हैं, जिन पर निजीकरण,  उदारीकरण और विनिवेश का अब तक कोई असर नहीं हुआ। कितने लाख या कितने करोड़ लोग छंटनी के शिकार हुए पिछले पच्चीस साल पुराने मुक्तबाजार में उनकी कोई परवाह उन्हें नहीं है। उन्हें अपने बेरोजगार बच्चों तक की परवाह नहीं है, जो पढ़े लिखे, दक्ष, काबिल होने के बावजूद बेरोजगार हैं।

बाकी 128 करोड़ में जाति धर्म निर्विशेष तमाम लोग सत्ता वर्ग में शामिल राजनेताओं,  जनप्रतिनिधियों,  मीडियावालों,  बुद्धिजीवियों, डाक्टरों, वकीलों, इंजीनियरों और तमाम संपन्न पेशेवर लोगों की बमुश्किल एक करोड़ लोगों को छोड़कर नोटबंदी की वजह से दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं।

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पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए "जनसत्ता" कोलकाता से अवकाशप्राप्त। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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