Socialist thinker Dr. Prem Singh is the National President of the Socialist Party. He is an associate professor at Delhi University समाजवादी चिंतक डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं

शिकारियों के बीच घिरी एक लड़की

समाज में चारों तरफ स्त्रियों पर अत्याचार की घटनाएं (Incest incidents on women) बढ़ती जा रही हैं। भारतीय पुरुष-मानस में स्त्री-अवमानना की गहरी गांठ पड़ी है, जो गलने का नाम नहीं लेती। स्त्रियों पर अत्याचारों के रूप और स्थान अनेक हैं। जान से मार देने में जहां उनके प्रति हिंसा की पराकाष्ठा देखने को मिलती है, बलात्कार में मान-मर्दन की। घर से लेकर कार्यस्थल और सड़क तक – सभी जगह स्त्री-उत्पीड़न के लिए खुली हैं।

स्त्रियों के हक में बने कानून, आयोग, संस्थाएं और स्त्री-मुक्ति की विचारधरा व आंदोलन उनकी सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं।

सत्ता की सर्वोच्चता पर दो स्त्रियों का होना भी स्त्रियों की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी नहीं है। यह भयावह स्थिति है जिससे प्रशासन और नागरिक समाज आंख चुराता है।

यह सोच कर कि समय-समय पर किए जाने वाले कानून-व्यवस्था संबंधी उपायों तथा स्त्री-मुक्ति की विचारधारा व आंदोलन (ideology and movement of women’s liberation) से जल्दी ही स्त्री सशक्तीकरण (women’s empowerment) का लक्ष्य हासिल हो जाएगा। उसके बाद स्त्री-उत्पीड़न (Women’s oppression) की घटनाएं नहीं होंगी।

पूंजीवादी व्यवस्था में संक्रमण की अवधारणा रणनीति के रूप में इस्तेमाल की जाती है ताकि पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था चलती  और मजबूत होती रहे। ऐसे में जो सशक्तीकरण होता है, वह पुरुषसत्तात्मक ढांचे के अंतर्गत होता है। इस प्रक्रिया के चलते स्त्री-सत्ता; पर आधारित सभ्यता को अभी लंबा इंतजार करना होगा।

ऐसी स्थिति में स्त्री-उत्पीड़न के मामलों में नागरिक समाज की सतत् जागरूकता और संवेदनशीलता जरूरी है।

कई नागरिक संगठन स्त्री-उत्पीड़न के मामलों का पता लगाने, रोकथाम करने और अपराधियों को सजा दिलाने का काम करते हैं। कई नागरिक व्यक्तिगत तौर पर भी पीड़िताओं की सहायता करते हैं। हालांकि ज्यादातर संगठनों और व्यक्तियों का  काम शहर-केंद्रित होता है और वहां भी उनकी भूमिका सीमित रहती है, फिर भी ये प्रयास न हों तो स्त्री-उत्पीड़न और ज्यादा होगा।

उत्पीड़न के ज्यादातर मामले घरों में होते हैं और ज्यादातर दबे रह जाते हैं या देर से प्रकाश में आते हैं।

कार्यस्थलों पर भी स्त्री-उत्पीड़न के मामले (women’s persecution issues on workplaces) बढ़ते जा रहे हैं जिसके चलते सरकार ने एक कानून भी बनाया है।

जिम्मेदारी के पदों पर बैठे कुछ लोग स्त्रियों का सीधे उत्पीड़न करते हैं। स्त्री-विरोधी मानसिकता (anti-women mentality) के चलते कार्यस्थलों पर स्त्री-विरोधी भाषा का इस्तेमाल तो ज्यादातर लोग करते ही हैं।

ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो कहते हैं स्त्रियां अपने पहनावे और श्रृंगार से खुद यौन उत्पीड़न को आमंत्रित करती हैं। उनसे सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए कि वे अपने घर की स्त्रियों के प्रति आमंत्रित क्यों नहीं होते? जबकि उनका परिधान और श्रृंगार भी वैसा ही होता है।

यह भी अक्सर कहा जाता है कि स्त्रियां अपने फायदे के लिए पुरुष अधिकारियों और साथियों के साथ संबंध् बनाती हैं। भाव रहता है कि इसमें पुरुष का क्या दोष! ऐसा कहने वालों से पूछा जाना चाहिए कि स्त्री की पहल पर बनाए गए संबंध् की सूचना पुरुष ने क्या अपनी पत्नी को दे दी है?

सहमति अगर संबंध् का वाजिब तर्क है तो वैसे संबंध् की सहमति पत्नी के संबंध् में बंधी स्त्री से सबसे पहले लेनी चाहिए।

इस तरह के ‘तर्क’ दरअसल उत्पीड़न की शिकार स्त्रियों को सही और समय पर न्याय नहीं मिलने देते।

यह चिंता की बात है कि कार्यस्स्थल पर स्त्री-उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। बहुत कम स्त्रियां उत्पीड़न की शिकायत करती हैं। लेकिन जो करती हैं उन्हें सही और समय पर न्याय नहीं मिल पाता। हालांकि हर संस्थान और विभाग में इस बाबत स्पष्ट नियम बने हैं। इसका मूलभूत कारण वह मानसिकता है जिसका ऊपर जिक्र किया गया है।

कभी-कभी जांच में शामिल स्त्रियां भी उस मानसिकता का साथ देती हैं। स्त्री-उत्पीड़न के मामलों की जांच में अक्सर आने वाली बाधओं पर नजर डालें तो काफी निराशाजनक स्थिति लगती है।

सबसे पहले तो यह यक्ष प्रश्न उछाल दिया जाता है कि पीड़िता की शिकायत के पीछे कौन है? जिस विभाग अथवा संस्थान का मामला होता है वहां कार्यरत लोगों और संगठनों के विरोध् और समर्थन के बीच मामला फंस जाता है। जाति, इलाका, विचारधरा, पार्टी आदि नियमों जांच के स्थापित प्रावधनों के ऊपर भूमिका निभाने लगते हैं। इस सबके चलते जांच बिठाने में देरी होती है। फिर जांच में देरी होती है।

अगर पीड़िता कमजोर है और उत्पीड़क ताकतवर तो पीड़िता को डराया-धमकाया जाता है। शिकायत वापस लेने के लिए जोर डाला जाता है। मामले को सीधे उचित अधिकृत समिति को न सौंप कर हल्का बनाने की नीयत से अन्य साधारण शिकायतें सुनने वाली समितियों के हवाले किया जाता है। पीड़िता से ऐसे सवाल पूछे जाते हैं गोया वही आरोपी हो।

कई बार समिति के सदस्य उत्पीड़क के बताए सवाल पीड़िता से पूछते हैं। किसी तरह जांच पूरी हो जाती है तो उस पर कार्रवाई में देरी की जाती है। प्रेस और मत-निर्माताओं को मैनेज करने के प्रयास किए जाते हैं। दांव अगर ऊंचे हों तो अदालत तक को गुमराह अथवा मैनेज करने की कोशिश होती है।

यह सब किया जाता है ताकि पीड़िता थक-हार कर बैठ जाए और उत्पीड़क अपने पद पर बना रहे।

जांच के बाहर भी काफी कुछ चलता है। कई बार उच्चाधिकारी कमजोर पीड़िता के मामले का फायदा उठा कर उत्पीड़क और उसके समर्थकों से मनमाना निर्णय कराते हैं। कुछ चलते पुर्जा लोग न केवल अपने रुके काम करा लेते हैं, आगे के काम भी बना लेते हैं। उनमें स्त्रीवादी होने का नाम पाने वाले पुरुष, यहां तक कि स्त्रियाँ  भी होती हैं।

उत्पीड़न का मामला यदि शैक्षणिक अथवा शोध संस्थान का हो तो स्थिति और बुरी होती है। आरोपी मजबूत वामपंथी खेमे का हो तो परिवर्तन के दावेदार ज्यादातर छात्रा और शिक्षक संगठन चुप्पी साध् जाते हैं। दिखावे के लिए अगर कुछ करना, यानी वक्तव्य वगैरा देना, हो तो कूटनीतिक शैली में किया जाता है। अंदरखाने आरोपी को बचाने के प्रयास किए जाते हैं। पीड़िता को झूठा और चरित्रहीन बताने करने के वही सारे हथकंडे अपनाए जाते हैं जिनके लिए दक्षिणपंथियों की भर्त्सना की जाती है।

आरोपी अगर ऊंची जाति का और पीड़िता पिछड़ी या नीची जाति की हो तो उसे निश्चित तौर पर झूठा और दुष्चरित्रा बता दिया जाता है।

पीड़िता अगर छात्रा अथवा शोधछात्रा है तो उसका कैरियर बिगाड़ने की कोशिश की जाती है।

कहने का आशय यह है कि कार्यस्थल पर उत्पीड़न (harassment on the workplace) का शिकार होने वाली स्त्रियों का न्याय पाने का रास्ता बेहद कांटों भरा होता है। यह सब देख कर कई स्त्रियां उत्पीड़न की शिकायत न करें या बीच में छोड़ दें तो आश्चर्य नहीं। रास्ते के सारे कांटों का मुकाबला करते हुए अगर कोई कमजोर स्त्री न्याय पाने में कामयाब होती है तो यह उसके जीवट का पुरस्कार होता है।

Sexual harassment case in Delhi University

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा देश और दुनिया में है। राजधानी में स्थित होने के चलते आशा की जाती है कि वहां यौन उत्पीड़न का मामला होने पर समयबद्ध कार्रवाई होगी।

अगर शिक्षकों द्वारा छात्रा के यौन उत्पीड़न का मामला हो तो विश्वविद्यालय प्रशासन जल्दी से जल्दी जांच और न्याय सुनिश्चित करेगा ताकि छात्रा की पढ़ाई और छवि पर असर न पड़े। आरोपियों को जांच पूरी होने तक सभी जिम्मेदारी के पदों से हटा दिया जाएगा ताकि वे अपनी हैसियत का दुरुपयोग करके जांच को प्रभावित न कर सकें।

लेकिन अफसोस की बात है कि हिंदी विभाग में दो साल पहले प्रकाश में आए तीन शिक्षकों द्वारा अपनी एक छात्रा के यौन-उत्पीड़न के मामले में छात्रा को अभी तक न्याय नहीं मिला है। विश्वविद्यालय प्रशासन से निराश होकर पीड़िता दिल्ली उच्च न्यायालय में न्याय पाने की आस में गई है।

यह लेख लिखने का हमारा आशय उस मानसिकता को रेखांकित करना है जो आधुनिकता और प्रगतिशीलता के बावजूद हमें स्त्री-विरोधी बनाए रखती है। यह सच्चाई स्वीकार करके ही हम स्त्री-उत्पीड़न के मामलों में कुछ सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।

हम पहली बार इस मामले पर अपनी बात रख रहे हैं। इसके पहले हमने केवल एक बार ‘युवा संवाद’ के अपने स्तंभ में प्रभाष जोशी के निधन पर लिखी श्रद्धांजलि में इस मामले का किंचित उल्लेख किया था। वे पंक्तियां इस प्रकार हैं,

‘‘प्रभाष जी से हमारी अंतिम मुलाकात अगस्त के तीसरे या अंतिम सप्ताह में हिंदी अकादमी के पूर्व सचिव साथी नानकचंद के घर पर हुई थी। उसका जिक्र  हम अंतिम मुलाकात के नाते उतना नहीं, प्रभाष जी के व्यक्तित्व के एक ऐसे गुण के नाते कर रहे हैं जो बुद्धिजीवियों में विरल होता जा रहा है। वे पहली बार हमारी कॉलानी में आए थे। तसल्ली से बैठे नानक के साथ बात-चीत कर रहे थे। उनकी बातचीत में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हुए यौन उत्पीड़न का जिक्र आ गया। प्रभाष जी ने कहा, ‘लेकिन वह महिला भी ….’ हमने पहली बार अपने विभाग के उस प्रकरण में किसी सार्वजनिक चर्चा में जबान खोली और मजबूत स्वर में कहा, ‘प्रभाष जी वह महिला नहीं, विभाग की छात्रा है।’ प्रभाष जी आगे कुछ नहीं बोले। कई मिनट चुप्पी रही। उस बीच उनके चेहरे पर जो व्यंजना प्रकट हुई, वह शब्दों में बता पाना मुश्किल है। ऐसा लगा वे इस मामले में अपनी अभी तक की धारणा, जो जाहिर है, यौन उत्पीड़क के हिमायतियों के चलाए गए अभियान के फलस्वरूप बनी होगी, को लेकर आहत और ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं। उस प्रकरण पर वहां आगे एक शब्द भी नहीं बोला गया। अलबत्ता प्रभाष जी के चेहरे से यह स्पष्ट हो गया कि उनका ह्दय पीड़िता के लिए करुणा से भर आया है। बुद्धिजीवियों में यह मानवीय करुणा अब विरल होती जा रही है।‘‘

हिंदी विभाग के यौन उत्पीड़न के प्रकरण में वह; करुणा, बड़ी और बड़े स्त्रीवादियों में भी देखने को नहीं मिली। अलबत्ता दांव-पेच देखने को खूब मिले।

हमारी एक जुझारू साथी को जांच में पीड़िता की मदद करनी थी। उन्होंने की भी। लेकिन साथ में अपने पति का मित्र होने के नाते एक अन्य आरोपी को बरी करा लाईं। तीसरा आरोपी दूसरे आरोपी का मित्र होने के नाते बरी हो गया।

इंसान अपना विवेक खोकर किस कदर अंधा हो जाता है, इसका पता हिंदी के एक अवकाश प्राप्त शिक्षक के व्यवहार से चला। उन्हें छात्रा के यौन उत्पीड़न से कोई शिकायत थी ही नहीं। जैसा कि पहले के यौन उत्पीड़िनों से भी नहीं रही थी। गोया वह ब्राह्मणों का शास्त्र-सम्मत अधिकार है! उन्हें पीड़िता के शिकायत करने पर शिकायत थी। उन्होंने मामले को खतरनाक ढंग से पूर्व और पश्चिम का रंग देने की कोशिश की। इसके बावजूद कि पूरे विश्वविद्यालय में पीड़िता के पक्ष में डटने वाले अकेले दो साथी पूर्व से आते हैं।

यहां यह संक्षिप्त जिक्र करने का आशय यह है कि प्रभाष जी की संवेदनशीलता हमारे उनसे जुड़ने का दूसरा महत्वपूर्ण कारक है।’’

‘युवा संवाद’ नवंबर 2009 पीड़िता ने सितंबर 2008 को हिंदी चिभाग के तीन शिक्षकों प्रोफेसर अजय तिवारी, प्रोफेसर सुधीश पचौरी और प्रोफेसर रमेश गौतम के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी। वह विश्वविद्यालय प्रशासन का होस्टाइल रुख देख कर महिला आयोग और तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के पास भी गई।

विश्वविद्यालय की सर्वोच्च एपेक्स समिति से जांच कराने की लड़ाई लड़ी। धमकियों के बीच सुरक्षित वातावरण प्रदान करने और जांच पूरी होने तक तीनों आरोपियों को जिम्मेदारी के पदों से मुक्त रखने की बार-बार लिखित अपील कुलपति से की लेकिन सुनवाई नहीं हुई।

तब से करीब अढ़ाई साल बीत चुके हैं और पीड़िता कोर्ट की शरण में गई है। कोर्ट ने उसका मामला स्वीकार कर लिया है। इसके पहले वह पी.एच.डी. के दाखिले में की गई अनियमितता के खिलाफ भी कोर्ट में जा चुकी है। वह मामला भी कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था और उस पर सुनवाई चल रही है।

इस लंबी अवधि का पूरा ब्यौरा यहां नहीं दिया जा सकता। पीड़िता ने अनेक प्रतिवेदन और पत्रा कुलपति और जांच समिति को भेजे। सारा ब्यौरा देख कर पता चलता हे कि यह उसका पूर्णकालिक काम हो गया था। वह ब्यौरा अगर प्रकाशित हो जाए तो भविष्य में दिल्ली विश्वविद्यालय में कोई छात्रा पद और संगठन के लिहाज से ताकतवर शिक्षकों के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत करने की हिम्मत नहीं करेगी।

जिस एक आरोपी प्रोफेसर अजय तिवारी को बर्खस्त करने का निर्णय कार्यकारिणी समिति (ईसी) ने डेढ़ साल पहले लिया था वह भी अभी तक लागू नहीं किया गया है। उल्टे इस साल मई में एपेक्स समिति ने पीड़िता पर असहयोग करने का अरोप लगा कर मामले को बंद कर दिया।

विश्वविद्यालय प्रशासन, उत्पीड़कों और उनके समर्थकों ने आरोपियों को बचाने और पीड़िता को ध्वस्त करने के वे सभी हथकंडे अपनाए जिनका ऊपर जिक्र किया गया है। तीनों आरोपियों में पहले दो के विभाग में आने से पहले न दोस्ताना संबंध थे न विचारधरात्मक। तीनों में परिपक्व आयु में दांतकाटी रोटी होने का सबब स्वार्थ और भ्रष्टाचार था। उनमें किसका क्या स्वार्थ था और कौन यौन उत्पीड़क और कौन आर्थिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचारी, इससे इस सच्चाई पर फर्क नहीं पड़ता कि तीनों एकजुट होकर सब कर रहे थे।

दिल्ली विश्वविद्यालय के पिछले कुलपति अपराधी दिमाग के शख्स हैं। बतौर कुलपति नियुक्ति से लेकर कोबाल्ट मामले तक कितने ही ऐसे प्रकरण हैं जो उनकी आपराधिक वृत्ति का पता देते हैं। उस ब्यौरे में हम यहां नहीं जाएंगे। वह प्रेस में आ चुका है, ‘यूनिवर्सिटी टुडे’ और ‘चौथी दुनिया’ में विशेष स्टोरी भी आई हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संगठन (डूटा) ने भी उनके नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाने वाले कारनामों का बार-बार खुलासा किया है।

हमने भी हिंदी विभाग में पीएच.डी. के दाखिलों में की गई अनियमितताओं के मामले में विभागाध्यक्ष के रूप में प्रोफेसर रमेश गौतम और प्रोपफेसर सुधीश पचौरी को बचाने के कुलपति के कारनामों का खुलासा प्रेस के सामने किया था। वह मामला कोई अदालत में ले जाए तो दिल्ली विश्वविद्यालय की साख को गहरा धक्का लगेगा।

सेमेस्टर प्रणाली लागू करने के लिए जिस तरह से पूर्व कुलपति ने नियमों और उनके तहत संचालित निकायों का अवमूल्यन किया है, दिल्ली विश्वविद्यालय भविष्य में कभी भी अपनी स्थापित साख को नहीं लौटा पाएगा। इसके बावजूद अगर उन पर कार्रवाई नहीं हुई तो उसका कारण है कि उन्होंने उच्च शिक्षा पर नवउदारवादी शिकंजा जमाने में सरकार की खुल कर मदद की है। ऐसा करना उनके लिए स्वाभाविक है। वे बहुराष्ट्रीय बीज कंपनी मोंसेंटो के रोल पर हैं और एप्लाइड साइंस और फाइनांस व मैनेजमेंट के अलावा किसी विषय की उपयोगिता नहीं मानते। वे खुलेआम मानविकी, समाजशास्त्र और प्राकृतिक विज्ञानों का मजाक उड़ाते हैं। विशेषकर, भारतीय भाषाओं और साहित्य के प्रति वे सार्वजनिक तौर अपनी हिकारत व्यक्त करते हैं।

कहने का आशय है यह है कि कुलपति जो मनमानी विश्वविद्यालय स्तर पर कर रहे थे, तीनों आरोपी विभागीय स्तर पर। कुलपति का उन्हें बचाना स्वाभाविक था। लेकिन उन्होंने पूरी कीमत वसूली। सेमेस्टर प्रणाली के मुद्दे पर दोनों ने डूटा और शिक्षक समुदाय के खिलाफ जाकर कुलपति का समर्थन किया।

इस बहती गंगा में विभाग के एक और शिक्षक ने हाथ धो लिए।

पिछले विश्वविद्यालय में लगे आर्थिक भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के चलते यहां उनकी प्रोबेशन अवधि खत्म करके स्थायी नियुक्ति नहीं की गई थी। मामले का फायदा उठा कर वे प्रोफेसर रमेश गौतम और प्रोफेसर सुधीश पचौरी का झोला उठा कर कुलपति तक पहुंच गए। वर्तमान कुलपति ने भी उन दोनों को अपना लिया है, इसलिए थैला अभी वापस नहीं रखा है।

यह जिक्र हमने इसलिए किया कि इस तरह के अवसरवादियों की संख्या शिक्षा जगत में भी तेजी से बढ़ती जा रही है जो यौन उत्पीड़न समेत किसी भी मामले में अवसर तलाश लेते हैं।

बुद्धिजीवी, विशेषकर हिंदी समाज, हर तरह के उत्पीड़न के विरुद्ध और प्रगति के पक्ष में बढ़-चढ़ कर बोलता है। स्त्रीवाद का सबसे ऊंचा स्वर वहीं से आता है। करीब अढ़ाई साल होने के बावजूद किसी लेखक, संपादक, शिक्षक ने सहानुभूति दिखाने की बात दूर, मामले को समझने तक की कोशिश नहीं की।

सुनने में आता है कि हिंदी विभाग के कुछ शिक्षकों ने आरोपियों की ‘सच्चरित्रता’ के प्रमाणस्वरूप जांच समिति को लिखित गवाही दी। शिकायत दर्ज होने, अजय तिवारी पर ईसी का निर्णय आने और पीड़िता के अदालत जाने की खबरें कई समाचारपत्रों में प्रकाशित हुईं। लेकिन ‘जनसत्ता’ ने अपने ‘सम्मानित’ लेखकों के खिलाफ कोई खबर नहीं छापी। यह शायद नई ‘प्रभाष परंपरा’ है! अलबत्ता आरोपियों के लेख छाप कर उनकी ताकत बढ़ाने का काम बखूबी किया है।

हिंदी की कई स्त्रीवादी लेखिकाएं समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में स्तंभ और लेख लिखती हैं। स्त्री-विमर्श में उनका बड़ा महत्व है। लेकिन उनमें किसी को पीड़िता के मामले को समझने और उस पर लिखने की प्रेरणा नहीं हुई।

लेखक-आलोचक बनने की दिशा में प्रयासरत युवा शिक्षकों और शोधार्थियों में से भी किसी ने मामले पर नहीं लिखा। अलबत्ता कई ने पीड़िता के खिलाफ लिखित गवाही जरूर दी।

एक वरिष्ठ स्त्रीवादी शिक्षिका ने अपने ‘गुड ओफिसस ’ का उपयोग पीड़िता से यह जानने के लिए किया कि उसने किसके कहने पर तीन नामध्न्य प्रोफेसरों के खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत की है?

प्रसिद्ध  पत्रकार राजकिशोर ने एक लेख पीड़िता के मामले पर लिख कर कुछ साहस का परिचय दिया, लेकिन अगले लेख में  मान्यीकरण करके, कि स्त्रियां चांद पाने के लिए पुरुषों से संबंध् बनाती हैं, पिछला लिखा मिटा दिया।

अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों से हिंदी की पीड़िता में रुचि लेने की आशा नहीं की जा सकती। उन्हें शायद पता भी नहीं होगा कि एक लड़की हाथी जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशासन से न्याय पाने के लिए जूझ रही है। हिंदी के बड़े-छोटे ज्यादातर लेखकों-आलोचकों-शिक्षकों ने मामले पर गपशप मजा अलबत्ता खूब लूटा है। उसका ब्यौरा यहां देने लगें तो पतन की परतें और खुल कर सामने आ जाएंगी।

अजय तिवारी को फंसता देख उनके कई लेखक साथी सक्रिय हो उठे। एक्शन होने से पहले उन्हें कहीं अन्य जगह स्थापित करने की कोशिशें हुईं।

पिछले दिनों स्त्री-विरोधी साक्षात्कार देने के चलते चर्चा में आए महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति से अजय तिवारी को रिलीव करने को कहा ताकि वे उन्हें अपने यहां रख सकें। सुना है वे स्वयं चलकर आए थे। लेकिन तब तक सुधीश पचौरी और रमेश गौतम से कुलपति का सौदा हो चुका था। दोनों को पूरा बचाने के लिए अजय तिवारी को पूरा फंसाना जरूरी था।

यहां बता दें, मामला प्रकाश में आने पर तीनों आरोपियों ने मिल कर बचाव की रणनीति बनाई थी। फिर अजय तिवारी को अकेला छोड़ दिया गया। अब रमेश गौतम की बारी है। पचौरी अपने गले में फंदा कसते देख उन्हें अकेला छोड़ देंगे। उत्तर-आधुनिक न्याय का यही तकाजा है!

विभूति नारायण राय ने साक्षात्कार में स्त्रियों के लिए अपशब्द का प्रयोग किया तो काफी बवाल मचा। देखने में आया कि अजय तिवारी को फांसी चाहने वाले विभूति की ‘माफी’ पर जान छिड़क रहे थे।

फिर एक संगोष्ठी के बहाने शक्तिपरीक्षण हुआ। पंचटीला के मोर्चे पर जमा हुई विभूति नारायण राय की सेना काफी बड़ी थी। उसके बाद ठीक ही उनके खिलाफ कोई नहीं बोला। उस साक्षात्कार के कई भाष्यकार निकल आए। हमारे विभाग के वही शिक्षक कहते हैं, ‘पूरा इंटरव्यू पढ़ो, विभूति जी ने बड़ी महान बातें कही हैं!’

विभूति नारायण के ये भाष्यकार शायद हिंदी साहित्य-समाज और हिंदी-पट्टी के पतन की पड़ताल करने वाले विष्णु खरे और प्रेमपाल शर्मा को जवाब दे रहे होते हैं, ‘जिसे तुम पतन कहते हो वह महान परंपरा है।’

उत्तर-आधुनिकता में सबके अपने-अपने अर्थ होते हैं! हमारी जानकारी में केवल ‘समयांतर’ पत्रिका अपवाद है जिसने मामले का ब्यौरा छापा और पीड़िता का पक्ष लिया। उसी में हिंदी विभाग में यौन उतपीड़न के खिलाफ संघर्ष समिति के एक सदस्य अंजनी का लेख पढ़ने को मिला, जिसमें समिति के पीड़िता को न्याय दिलाने के प्रयासों के अलावा वामपंथी छात्र संगठनों की ‘तटस्थता’ के बारे में जानकारी थी।

यह भी सुनने में आया कि लखनऊ के कथाक्रम कार्यक्रम में राजेंद्र यादव ने अजय तिवारी की उपस्थिति पर ऐतराज उठाया।

21 तारीख को कुलपति द्वारा यौन शोषण के आरोपी सुधीश पचौरी को डीन ऑफ कॉलेजेज बनाने के विरोध में हुए हिंदी विभाग में यौन उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष समिति के प्रतिरोध मार्च के दौरान बांटे गए पर्चे में लिखा है कि एपेक्स समिति को यौन शोषण के मामले में स्त्री पक्ष के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। लेकिन समिति समाज से बाहर नहीं है।

जो समाज इस कदर संवेदनहीन और स्वार्थी हो, उसमें कड़े से कड़े कानूनों के बावजूद यौन उत्पीड़न की शिकार स्त्रियों को पूरा न्याय मिल पाना असंभव है। शायद न्यायपालिका से भी।

पीड़िता ने कुछ दिन पहले हमें कहा, ‘सर मुझे तो लगता है यहां ज्यादातर शिक्षक नहीं, शिकारी हैं। एपेक्स समिति, कुलपति, महिला आयोग, मंत्री, विजीटर सब मिल जाते हैं। मैं शिकारियों के बीच फंस गई हूं।’

वाकई, इन ‘ऊंचे खेलों’ में एक अदना पीड़िता क्या खाकर टिकेगी? थोड़े-से आदर्शवादी और निडर नवयुवतियों और नवयुवकों, जिनमें ज्यादातर छोटे वामपंथी समूहों से हैं, ने हिंदी विभाग में यौन उतपीड़न के खिलाफ संघर्ष समिति बना कर उसका साथ न दिया होता तो वह कब की हार चुकी होती!

भला हो प्रशांत भूषण का। पीड़िता की गुहार उन तक पहुंची तो उन्होंने पीड़िता से बिना मिले, बिना उसकी जाति, इलाका, आर्थिक हैसियत जाने उसके द्वारा कोर्ट में दायर पीएच.डी. के प्रवेश में हुई अनियमितताओं का मामला देखना स्वीकार कर लिया है।

यह प्रशांत भूषण ही कर सकते थे। अब विश्वविद्यालय प्रशासन और पूर्व विभागाध्क्ष व वर्तमान डीन प्रोफेसर सुधीश पचौरी के कान खड़े हैं कि कैसे बचा जाए। उन्होंने डीन का पद इसीलिए हथियाया है ताकि न्यायालय में उनके खिलाफ चलने वाले मुकद्दमों से पद की ताकत से निपट सकें।

अगर प्रशांत भूषण ने छात्रा के यौन उत्पीड़न के मामले को देखना भी स्वीकार कर लिया तो संभावना है पीड़िता को लंबे संघर्ष के बाद न्याय और उत्पीड़कों को दंड मिल जाए।

प्रेम सिंह

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं।)

About डॉ. प्रेम सिंह

डॉ. प्रेम सिंह, Dr. Prem Singh Dept. of Hindi University of Delhi Delhi - 110007 (INDIA) Former Fellow Indian Institute of Advanced Study, Shimla India Former Visiting Professor Center of Oriental Studies Vilnius University Lithuania Former Visiting Professor Center of Eastern Languages and Cultures Dept. of Indology Sofia University Sofia Bulgaria

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