समाजवादी पार्टी- धरतीपुत्र युग से पुत्र युग में संक्रमण काल का संकट

समाजवादी पार्टी का संक्रमण काल  किसी विचारक या नेता की राजनीतिक और वैचारिक विरासत पर दावा करना जितना आसान होता है, असलियत में उन विचारों और मूल्यों के साथ निभा पाने की राह उतनी ही कंकरीली होती है। राम मनोहर लोहिया और उनकी समाजवादी विचारधारा की राजनीति और दर्शन, ऐसा ही एक पहलू है जिसके आधार पर वर्तमान में समाजवाद की राजनीति करने का दावा करने वाले विभिन्न दलों और नेताओं को बार-बार लोहिया की नीति, लोहिया के दर्शन की कसौटी पर कस कर देखा जाता है।

यह स्वाभाविक ही है कि उनकी विचारधारा और उनके आदर्शों के नाम पे राजनीति करने वाली और वर्तमान में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सत्तासीन समाजवादी पार्टी जनता परिवार के घटक दलों के विलय की अगुआ बनकर उभरी है, तो सपा के अब तक के कार्यकाल की समीक्षा और उसके संगठनात्मक कार्यशैली पर विमर्श लोहिया के विचारों के बरक्स किया जाना चाहिए। डॉ लोहिया के राजनीतिक चिंतन में देशी और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों का समावेशन करके अपनी बात को रखने की अद्भुत कला थी।

वैश्विक पूँजीवाद और उसके शोषण के कुचक्र को भारत के सन्दर्भ में साहूकारों और असंगत भूमि वितरण से जोड़ कर देखना हो अथवा नस्लीय भेद को भारत की जाति व्यवस्था के साथ जोड़कर पिछड़ा वर्ग के लिए विशेष अवसर सिद्धांत की पुरजोर वकालत करनी हो, लोहिया हर वक़्त अपने समकालीनों से आगे नजर आये। संसद में अपने संक्षिप्त कार्यकाल में ही उन्होंने पिछड़ा वर्ग के समानुपाती प्रतिनिधित्व को न केवल बहस का मुद्दा बनाया, बल्कि उसके लिए जनता में एक माहौल तैयार करने में भी महती भूमिका निभायी। शायद यही कारण है कि उनके निधन के अवसर पर लोकसभा में बोलते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लोहिया के सपनों को सभी राजनीतिक दलों की "सामूहिक थाती" बताया था, जिसे पूरा करना सभी का दायित्व है। हाल ही में अपनी सरकार के तीन वर्ष पूरी करने वाली समाजवादी पार्टी के शासनकाल पर नजर डाली जाए तो यह शासन आदर्शों और व्यावहारिक जरूरतों के द्वंद्व में फंसा हुआ नजर आता है, जिसका खमियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। तीन साल पहले जब उत्तर प्रदेश की जनता ने नयी ऊर्जा और विकास के प्रतीक के रूप में अखिलेश यादव को भारी बहुमत दिया था, उस वक़्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि खुद को किसानों और पिछड़ा वर्ग की पार्टी कहने वाली सपा के शासनकाल में किसानों को यूरिया खाद के लिए लाठियां खाने को मिलेंगी, गन्ना जैसी नकदी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने को सड़कों पर उतरना पड़ेगा और सामाजिक न्याय का पुरोधा होने का दावा करने वालों के राज में ही युवा प्रतियोगियों को इलाहाबाद में पुलिस की बर्बरता का शिकार होना पड़ेगा। मगर यह सपा सरकार के शासनकाल का एक पहलू है, जिसे नकारा नहीं जा सकता है। यहाँ यह बात गौर करने वाली है कि ….. जारी….आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…… उपरोक्त तीनों मुद्दे कभी लोहिया के आदर्शों की धुरी थे, ऐसे में अपने ही वैचारिक आदर्श के मुद्दों पर सपा सरकार का यह विचलन सोचने पर मजबूर करता है कि समाजवाद का यह कौन सा काल है, जहाँ मूलभूत आदर्शों की बलि चढ़ानी पड़ रही है।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि अखिलेश यादव सरकार ने समाजवादी मूल्यों पर सिर्फ उपेक्षा का ही रुख अपनाया है। स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए मुफ्त एम्बुलेंस सेवा से लेकर प्रदेश के जनपदों में मेडिकल कॉलेज की स्थापना, दो साल की किरकिरी के बाद गन्ना के मूल्य पर संज्ञान लेना, महिला सुरक्षा हेतु हेल्प लाइन शुरू करना, समाजवादी पेंशन योजना, मौजूदा वित्तीय वर्ष को "किसान वर्ष " घोषित करना आदि कुछ ऐसे कदम हैं, जो उत्तर प्रदेश में किसानों और आम जनता की बेहतरी के लिए राज्य सरकार की सक्रियता को व्यक्त करते हैं।

हाल ही में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य की सभी सरकारी भर्तियों में आरक्षण के नियमों का सही अनुपालन का आदेश भी जारी किया है, किन्तु यहाँ यह सवाल सहज ही उठता है कि जब कोई सरकार लोकलुभावन फैसलों के अलावा भी कुछ बेहद संजीदा मुद्दों पर लोकहितकल्याणकारी फैसले ले रही है, तो फिर उसे आखिर किस कारण वैचारिक द्वंद्व में उलझना पड़ रहा है और लोक सभा चुनाव में क्यूँ जनता ने सपा को सिरे से ख़ारिज कर दिया। इस सवाल का जवाब लोहिया की संगठन में गतिशीलता और युवाओं को रचनात्मक तरीके से राजनीति में आगे बढ़ाने के विचार में निहित है।

एक तरफ जहाँ लोहिया ने समाजवाद को तत्कालीन नेहरूवादी कांग्रेस के अधिनायकवाद के मुकाबले विपक्ष का प्रतीक बनाया और सदन में सार्थक विपक्ष की नयी परिभाषा गढ़ी, वहीँ वो लगातार नए-नए युवा नेताओं को भी संगठन में आगे बढ़ाते रहे। मगर समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह पहली बार पूर्ण बहुमत का जनादेश हासिल करने के बाद, संगठन और पार्टी के अहम पदों पर उन वैचारिक रूप से समर्पित युवाओं को आगे बढ़ाने में नाकाम रहे, जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए दिन रात सड़कों पर संघर्ष करके सपा के पक्ष में माहौल बनाया था। यह अपने आप में आश्चर्यजनक बात है कि जिस पार्टी को इतना प्रचंड बहुमत मिला हो वो महज ढाई साल में सिर्फ अपने परिवार तक सिमट कर रह जाए।

दरअसल इन तीन सालों में सपा की छवि बिगाड़ने और लोकसभा चुनाव में करारी हार में सपा के उन नेताओं की भूमिका रही है, जिन्हें अर्थशास्त्र की भाषा में गैर निष्पादित संपत्तियां या नॉन परफार्मिंग एसेट कहा जाना ज्यादा उचित होगा। यह उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि जनता ने जिस अखिलेश यादव को उम्मीदों की साइकिल चलाने के लिए बागडोर थमाई थी, वो चाह कर भी अपनी पार्टी के भीतर इन भार सरीखे नेताओं और उनके विवादित कारनामों पर नियंत्रण नहीं रख सके, परिणाम स्वरूप जनता ने महज ढाई साल के भीतर ही उन्हें नकार दिया। यह उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जिस अखिलेश यादव द्वारा डीपी यादव जैसे व्यक्ति को पार्टी का टिकट न देने पर एक उम्मीद बंधी थी वही अखिलेश यादव अपनी सरकार में राज्यमंत्री विनोद सिंह की लगातार बढ़ती कारगुजारियों पर मौन साधे हुए हैं। इस अकर्मण्यता का भावार्थ जनता गुंडा तत्वों पर अखिलेश यादव की रहमदिली के रूप में लगा रही है। लोहिया कहते थे कि समाज और सरकार जब सड़ने लगे तो युवाओं को सुधार का बीड़ा उठाना चाहिए।

युवा मुख्यमंत्री को अपने आदर्श की इस बात को जितना जल्दी हो सके कार्य रूप में निष्पादित करना ही होगा। ऐसा नहीं है कि अखिलेश यादव के पास योग्य और विचारधारा की राजनीति को समर्पित युवा नेताओं की कोई कमी है, बल्कि डॉ. इमरान इदरीस, अभिषेक यादव जैसे ऊर्जावान और जनता के बीच लोकप्रिय युवा नेता, जिन्हें कोई भी पार्टी अपने साथ रखना चाहेगी, उन्हें संगठन या सरकार में वाजिब महत्व न मिलना सपा की अंदरूनी सेहत के ही खिलाफ जा रहा है। मौजूदा साल समाजवादी पार्टी और जनता परिवार की विचारधारा के लिए बहुत संवेदनशील साबित होने जा रहा है, यह तय कर देगा कि सपा अपने आदर्शों और मूल्यों के आधार पर आगामी विधान सभा चुनाव में जनता के बीच वापसी कर पायेगी अथवा चाटुकारों का खामियाजा अखिलेश यादव भुगतेंगे। यहाँ यह भी ध्यान रखना होगा कि बिहार में आसन्न विधान सभा चुनाव में समाजवादी घटक दलों की विजय या पराजय भी सपा के लिए भविष्य का निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। विचारधारा के इस संक्रमण काल में अखिलेश यादव और उनके सहयोगी खुद लोहिया से कितना सबक सीखते हैं, और किसानों के बीज, खाद-फसलों के मूल्य जैसे सवालों से लेकर प्रतिनिधित्व की आकांक्षा लिए वंचित पिछड़ा वर्ग की मांगों के साथ कैसे समन्वय बैठाते हैं, यह देखने वाली बात होगी। दिव्यांशु पटेल

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