अनिल कुमार पुष्कर : कवि और आलोचक
अनिल कुमार पुष्कर

देह-विमर्श के मसालों और सेहतमंद स्त्रीवादी मसालों में फर्क क्या है

स्त्रीवादी बनाम देहवादी विमर्श पर एक टिप्पणी A commentary on feminist versus sexist discourse

हिन्दुस्तान में कई तरह के मसालों को बनाने की तमाम विधियाँ लम्बे समय से ईजाद की जाती रही हैं. जिस तरह मसालों की सूची में संसद से पारित स्पाईस बोर्ड में शामिल कुल 52 मसाले हैं और आइएसओ की सूची में 109 मसाले हैं. यहाँ तक कि मसाला रंजित पोशाकें भी हैं.

ठीक इसी तरह स्त्री-शुचिता, स्त्री-यौनिकता, स्त्री-मुक्ति, स्त्री-प्रश्न, स्त्री-विमर्श, स्त्री देह-विमर्श आदि के मापदंडों पर अगर ६४ कलाएं और ८४ आसनों के मसाले साहित्य में गर आ ही गये तो समाज के  सेहतमंद होने की चिंता और साहित्य के अदब में एहतराम मिजाज, खैरियत की फ़िक्र करने वालों, नये-नये सेहतमंद मसाले बनाने वाले साहित्यिक बिरादरी और जमात को आखिर इतनी भी दिक्कत क्यूँ है?

यही है न सवाल?

है कि नहीं? साहित्य की श्रेष्ठ स्त्रीवादी [देहवादी] लेखिकाओं और उनके कद्रदानों ?

अब जिन्हें समाज की सेहत से वास्ता है उनके बनाये मसालों में यह मिक्चर थोड़ा ज्यादा ही सामाजिक हया, अदा, रंगरोगन, तहजीब, तरन्नुम, रूमानी अंदाज़ लेकर हाजिर होता रहा है।

Woman meat is being served in the new sexist decorations

तो जो देहवाद के मसाले बनाने वाली/वाले, चाहने वाले हैं, जिन्हें चिंता है कि 64 आसनों और 84 कलाओं का क्या होगा? अगर सब यथार्थ में ही डूबकर पकाया जाएगा. उन आजमाइशों का क्या होगा जो मादा-देहों और लज़ीज़ गोश्त की शौकीन हैं. वो गजब की कला में माहिर देखिये कैसे गोश्त-की नई-नई डिश में लपेटकर पका जवान औरतों की देहवादी विमर्शों की तश्तरी में कमसिनों का गोश्त परोसने में लगी हैं. यहाँ मर्द-औरत का भेद नहीं, जवान कामिनियाँ ही परोस रही हैं स्वाद-सुगंध का अलबेला मस्ताना बहकाने वाला नर्म-गर्म गोश्त, नये देहवादी अलंकरणों में परोसा जा रहा है औरत का गोश्त. नई-नई रंगत में ढाला जा रहा है विमर्श का फसाना, म्ह्फीलों में शुरुर का मिजाज़ जरा ज्यादा ही मदहोश और बदहवासी के आलम में गुम है. इन्हें खूब नई किस्मों के संग कौन सी सम्मोहित करने वाली तरकीब ईजाद की जाय. सारी हरकतें बड़ी बेफिक्री और बेधड़क जारी हैं.

तो फिर सेहतमंद स्त्री-विमर्श के मसालों के इल्मियों, दस्तकारों और रसोइयों को ये बातें सुरख्वाब की नई किस्में पच क्यूँ नहीं रही हैं.

बताइए तो भला?

ख्वामखाह रह-रहकर तमाम इलाकों से देहवादी मसालों के खिलाफ आवाजें उठ  रही हैं बाज़ रह-रहकर मुखालफत की बू की आमद हुई हैं. आपत्तियाँ उठ रही हैं. जो देहवादी अपनी नई जमीन में स्त्रीदेह का गोश्त परोसना चाहते हैं और ज्यादा खुशबूदार और अधिक लजीज बनाना चाहते हैं, उन्हें हक नहीं है क्या? आप कभी स्पाइसी और कभी ब्वाइल और कभी सादा खाना खाते हैं कि नहीं?

तो फिर कभी-कभी थोड़ा ज्यादा स्त्रीवादी गर्म मसालों से लबरेज़ देहवादी रेसिपी और पकवान पचाने में दिक्कत क्यूँ है जनाब? सेहतमंद होने की मंशा पर देहवादी आखिर कोई आपत्ति नहीं जताते तो फिर स्त्रीवादी इन गर्म गोश्त मसालों में लिपटी किफायती और लसदार कोरमे की फरमाइश और आजमाइश से कैसा खतरा हैं.

अरे भाई चाहे सेहतमंद और सुपाच्य मसाला हो, चाहे स्त्री-देह के शोरबे में लिपटा मसाला हो, हर तरह का मसाला ईजाद करने, बेचने और लुभाने का हक सबके पास है. सबकी अपनी स्त्रीवादी और देहवादी धारणाएँ हैं. सबकी अपनी जिस्मानी और रूहानी सोच है. सब नये नुस्खे इजाद कर रहे हैं तो नये-नये देहवादी विमर्शों के गर्म मसालों में इजाफा होने और उनसे लुत्फ़ लेने में हर्ज़ क्यूँ हैं?

जिसे देह विमर्श का मसाला सूट नहीं करता वो सादगी और सेहतमंद ‘करी’ वाले मसाले खरीदे और खाए बनाए. किसे हर्ज़ है? पर आपको ये हक कौन दे रहा है कि आप ये जोर-आजमाइश से पुख्ता और सख्त त्रिकोण से दर्ज करें या देह विमर्श के गर्म मसालों में लिपटी खुशबूदार डिश की तौहीन करें, और कंटेंट, स्वाद, उत्तेजक रंग-रोगन पर ये इल्जाम मढें कि स्त्री-विमर्श की इजाद ये नई तरकीबें, कतई अलहदा हैं सही मायनों में स्त्रीवादी विमर्शों के कोरमा से, ये क्यूँ कहेंगे आप कि देहवादी गर्म मसालों में लिपटी मुगलई, अफगानी या और किसी किस्म के गोश्त की नई किस्में साहित्य की रसोई में लाना कतई ठीक नहीं, हरगिज़ मंजूर नहीं. कम से कम ये बेबुनियाद इलज़ाम तो न लगायें.

देहवादी-स्त्रीवाद के नये नए ईजाद मसालों के पैरोकार कह रहे हैं गर ये गर्म गोश्त पकाने वाले मसाले खाना खराब कर रहे हैं तो इन्हें बड़ी तादाद में, लिटरेरी बिरादरी चाव से चटखारे ले-लेकर खाने को आमादा हैं क्यूँ? बूढ़े और जवान सभी इन तमाम देहवादी-स्त्रीवाद के खेमों में, जवान गोश्त की चस्क औ मदहोशी भरने वाली गर्म और लुत्फ़ देहयुक्त मसालों की कतारों में इजाफा किये लार टपकाए क्यूँ खड़े हैं?

स्त्री-देह विमर्श के बहाने ‘असली मसाले सच-सच’ तक पहुँचने की होड़ क्यूँ मची है भाई? सब गोश्तखोर अपनी-अपनी बारी आने का बेसब्री से इंतज़ार क्यूँ कर रहे हैं?

सेहतमंद और बेहतरीन डिसेज़ बनाने वालों और साहित्य के व्यंजनों को नये लब्बोलुआब में डुबोने वालों ये तो बताओ कि इन देहवादी गर्म मसालों से इतनी गुस्ताखी क्यूँ इतना परहेज़ क्यूँ?

 

आप साहित्य में सेहतमंद होने की हर कवायद हर किफायत हर इनायत देते चलिए 

देहवादियों को लज़ीज़ जिस्म परोसने मदहोश करामातों की कतई कोई परीशानी नहीं.

Essence of feminism of the flesh

हाँ, इन्हीं पेंचोखम में कहीं गर

दोनों के बीच कोई इकरार हो तो भी बेहतर है. क्या कहते हैं?

सेहतमंद और लजीज स्वाद हर जुबान को नहीं चाहिए क्या ?

देहवादियों के स्त्रीविमर्श का सार तो यही है न कि दंडी की काव्यादर्श कला का प्रदर्शन हो. ‘कामार्थसंश्रया’ अर्थात काम और अर्थ कला के ऊपर आश्रय पाते हैं.

What is the objection of feminists?

स्त्रीवादियों की आपत्ति क्या है? कि लजीज गोश्त वाले व्यंजनों में मसालों का अनुपात ठीक नहीं है?

मंशा क्या है आपकी, आप भी शुक्राचार्य की तरह ही ‘शुक्रनीति-सार’ चाहते हैं. ‘शैव-तन्त्र’ चाहते हैं, ‘ललितविस्तर’ चाहते हैं. जिसमें राज्य-सम्बन्धी विचार, राजा और राजपद, मंत्रिपरिषद, राष्ट्र का प्रशासन और कार्मिक व्यवस्था, समाज व्यवस्था, कर-नीति, न्याय एवं न्यायपालिका, अपराध एवं दण्ड, परराष्ट्र नीति यही तो चाहते हैं न ?

क्या चाहते हैं ? ये तो बतायें? आखिर यजुर्वेद में भी तो 64 कलाएं (64 arts in the Yajurveda) मिलती ही हैं.

आपकी स्त्रीवादी डिश में कौन से मसाले चाहिए. कुछ तो बताएं.

देह-विमर्श की रंगीन महफिलों में मशरूफ स्त्रीवादियों ने तो खुलेआम बता दिया है. चुनौती दी है. आंकड़े भी बहुतायत में गिना दिए हैं. पसंदगी और फरमाइश की लिस्ट जारी की है. वे अपनी कोशिशों में कामयाब हैं और कायम हैं.

सेहतमंद स्त्रीवादी सुगन्धित स्वाद परोसने वालों कहिये आपके पास क्या है ?

अनिल पुष्कर

 

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