Acharya Hazari Prasad Dwivedi

डरना किसी से भी नहीं, गुरू से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं वेद से भी नहीं – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

आज आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (Acharya Hazari Prasad Dwivedi) का जन्मदिन है-

काशी की संस्कृति – विद्वत्ता और कुटिल दबंगई

विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘व्योमकेश दरवेश’ में काशी के बारे में लिखा है –

“काशी में विद्वत्ता और कुटिल दबंगई का अद्भुत मेल दिखलाई पड़ता है। कुटिलता, कूटनीति, ओछापन, स्वार्थ- आदि का समावेश विद्बता में हो जाता है। काशी में प्रतिभा के साथ परदुखकातरता, स्वाभिमान और अनंत तेजस्विता का भी मेल है जो कबीर, तुलसी, प्रसाद और भारतेन्दु, प्रेमचन्द आदि में दिखलाई पड़ता है। काशी में प्रायः उत्तर भारत, विशेषतः हिन्दी क्षेत्र के सभी तीर्थ स्थलों पर परान्न भोजीपाखंड़ी पंडों की भी संस्कृति है जो विदग्ध, चालू, बुद्धिमान और अवसरवादी कुटिलता की मूर्ति होते हैं। काशी के वातावरण में इस पंडा -संस्कृति का भी प्रकट प्रभाव है। वह किसी जाति-सम्प्रदाय, मुहल्ला तक सीमित नहीं सर्वत्र व्याप्त है। पता नहीं कब किसमें झलक मारने लगे।”

क्या आप काशी गए हैं ?

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में लिखा है –

“डरना किसी से भी नहीं, गुरू से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, ….लोक से भी नहीं …. वेद से भी नहीं ….”

About जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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