भाजपा ने लोकतांत्रिक राजनीति ही नहीं भारतीय संस्कृति पर भी हमला बोल दिया है

लखनऊ। 30 अप्रैल 2018 को लखनऊ में हुई हेड क्वार्टर की बैठक में अखिलेन्द्र प्रताप सिंह सदस्य, राष्ट्रीय कार्यसमिति, स्वराज अभियान ने साथियो से बातचीत करते हुए कहा कि संघ-भाजपा की अगुवाई में चल रही मोदी सरकार द्वारा देश के समक्ष पैदा किए गए खतरे को हर स्तर पर शिकस्त देना बेहद जरूरी है और संघ व भाजपा की राजनीति को शिकस्त देने के लिए तमाम ताकतों को एकताबद्ध होना चाहिए।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि चुनाव में ‘भाजपा हराओ‘ देश का प्रमुख नारा होना चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि भाजपा का उभार सारतः दक्षिणपंथ का ही उभार है और दक्षिणपंथ के उभार को महज भाजपा तक सीमित करना भी गलत होगा। नव उदारवादी आर्थिक-औद्योगिक नीति, सांप्रदायिकता-बहुसंख्यकवाद-संकीर्णतावादी पहचान की राजनीति और फासीवादी अभियान-राज्य का अधिकाधिक अधिनायकवादी होते जाना-लोकतांत्रिक संस्थाओं का विलोपन और उनका बढ़ता कार्पोरेटीकरण (कारपोरेट टेकओवर), मेहनतकशों के अधिकारों पर जारी हमला इस दक्षिणपंथी उभार की लाक्षणिक विशेषतायें हैं।

उन्होंने कहा बेशक भाजपा-संघ की अपनी विशिष्टता है जिसे चिन्हित किया जाना चाहिए। इसका शासक वर्ग की सबसे विश्वसनीय पार्टी के तौर पर उभरना-हिंदू राष्ट्र का प्रोजेक्ट-अल्पसंख्यकों की राजनीतिक पहचान खत्म करने और उन्हें अधिकारविहीन करने का अभियान, हिंदू राष्ट्र की संघीय अवधारणा को जो न माने उसे राष्ट्र विरोधी करार दिया जाना, भीड़ द्वारा निर्दोष लोगों पर हमले और बौद्धिक प्रतिवाद करने वाले लोगों के साथ गाली-गलौज और कुछ एक की हत्या आदि। भारतीय जनता पार्टी ने लोकतांत्रिक राजनीति ही नहीं भारतीय संस्कृति पर भी हमला बोल दिया है और इसके द्वारा पैदा किया गया संकट राजनीतिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत भी है। यहीं इसका विशिष्ट चरित्र है जो इसे अन्य शासक वर्गीय दलों से अलग करता है।

लेकिन देश में दक्षिणपंथ के इस उभार में गैर भाजपा दलों की भी भूमिका है। यह ढ़ाचागत संकट है, इसके मूल चरित्र को अनदेखा नहीं करना चाहिए। वस्तुतः यह वैश्विक परिघटना है। कारपोरेट और वित्तीय पूंजी के राज ने जो असाध्य आर्थिक सामाजिक संकट पैदा किया है उसका समाधान किसी शासक वर्ग के दल के पास नहीं है।

उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में सीपीएम के अंदर जो गहरे राजनीतिक मतभेद थे खासतौर पर कार्यनीति के प्रश्न पर उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। सीपीएम के अंदर के संघर्ष को दो व्यक्तियों या दो राज्यों के बीच में देखना भी गलत है। कांग्रेस के प्रति रूख को लेकर कम्युनिस्ट आंदोलन में शुरू से ही विवाद रहा है और उस संदर्भ में ही इसे देखने की जरूरत है। राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थिति में उदारपंथियों का एक हिस्सा जैसे-तैसे कांग्रेस के साथ मोर्चा बनाने की वकालत करता है। परिणामवादी नजरिये से भी सर्व विपक्षी एकता से भाजपा हार ही जाये यह कोई आवश्यक नहीं है, यह तो उदारवादियों की सदिच्छा है। गणितीय रूप से सही लगते हुए भी इससे राजनीतिक जीवन में कभी अपेक्षित परिणाम भी नहीं निकलते, जैसा पश्चिम बंगाल में 2016 के विधान सभा चुनाव में दिखा। यही वह हिस्सा है जो कांग्रेस से राजनीतिक संश्रय का विरोध करने वालों पर यह लांछन लगाता है कि भाजपा और कांग्रेस को वह एक जैसे खतरे के बतौर पेश कर रहे हैं, जबकि यह सत्य नहीं है। आज के दौर में कोई भी भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी की बात नहीं करता है और करना भी नहीं चाहिए। भाजपा को कैसे राजनीतिक शिकस्त दिया जाए और जनराजनीति को आगे बढ़ाया जाए लोकतांत्रिक ताकतों के लिए यह महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न है। सर्वविपक्षी एकता और क्षेत्रीय दलों का कथित फेडरल फ्रंट बिना किसी कार्यक्रम और जनवादी दिशा के भारतीय समाज और राज्य में तेजी से पनप रहे फासीवादी तत्वों से निपटने में अक्षम तो है ही यह लोगों की चेतना को भ्रष्ट करता है और जन पहलकदमी को बाधित करता है।

उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की वैविध्यपूर्ण विशिष्ट संरचना, जनता के चेतना के स्तर तथा मौजूदा राजनैतिक परिस्थितियों में एक व्यापक आधार वाले जन राजनीतिक संगठन को मजबूत करना वक्त की जरूरत है। ऐसा संगठन एक स्वीकृत राजनीतिक कार्यक्रम के आधार पर विभिन्न लोकतांत्रिक विचारधाराओं- कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, आंबेडकरवादी, गांधीवादी, पर्यावरणवादी, उदारवाद से जुड़े व्यापक जन समुदाय की सामूहिक राजनीतिक कार्यवाही का मंच बन सकता है, समाज के तमाम उत्पीड़ित समुदायों का अपने राजनैतिक सांगठिक नेतृत्व में समुचित प्रतिनिधित्व कर सकता है, जनता की चेतना के क्रांतिकारी रूपांतरण का माध्यम बन सकता है, अपने सदस्यों, घटकों की अधिकाधिक स्वायत्तता, पहल की स्वतंत्रता की गारण्टी कर सकता है तथा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय, सामयिक, प्रभावी पहल ले सकता है। यह महज एक विचार ही नहीं है बल्कि भौतिक स्वरूप भी ग्रहण कर रहा है चाहे इसका स्तर प्रारम्भिक ही क्यों न हो। स्वराज अभियान का प्रयोग इसी दिशा में एक कदम है जिसको बनाने में फिलहाल कुछ समाजवादी, रेडिकल उदार मूल्यों में विश्वास करने वाले लोगों और दलित आंदोलन, मार्क्सवादी विचार के लोग प्रयासरत है, इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। लोकतांत्रिक आंदोलन का बड़ा समूह विभिनन रूपों में और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत है उसके साथ संवाद कायम करना और उन सबकों जो विभिन्न लोकतांत्रिक विचारधारा के हैं और राजनीतिक-गैर राजनीतिक हैं, उन्हें एक समावेशी मंच पर लाने की जरूरत है। इसमें शरीक होने वाले कुछ लोग, दल, आंदोलन चुनाव में हिस्सेदारी कर भी सकते है और न करने के लिए भी स्वतंत्र होगें। जिस नाम पर भी हो लेकिन यह मंच चरित्र में राजनीतिक ही होना चाहिए। इसको बनने में कम्युनिस्ट पार्टियों को भी मदद करनी चाहिए क्योंकि उनके वाम जनवादी मोर्चे की धारणा में इस तरह का राजनीतिक मंच एक मजबूत घटक बन सकता है। इस तरह का मंच लोकतांत्रिक सांगठनिक व्यवहार उत्पीड़ित समुदायों खासकर दलित, आदिवासी, महिला, अल्पसंख्यकों और पिछड़े इलाके के लोगों को राजनीतिक नेतृत्व में लाने और विकसित करने का राजनीतिक मंच बन सकता हैं। इस तरह का मंच राजनीतिक सांगठनिक व्यवहार में पारदर्शिता और लोगों के प्रति जबाबदेही का राजनीतिक मंच बन सकता है। उपरोक्त सवाल अभी भी कम्युनिस्ट आंदोलन में हल होने की मांग करता है, इसे खारिज नहीं किया जा सकता है।

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