Kavita Arora

मरजाने चाँद के सदके… मेरे कोठे दिया बारियाँ…

Chand Kavita

….कार्तिक पूर्णिमा की शाम से.. वो गंगा के तट पर है… मौजों में परछावे डालता.. सिरते दीप को निहारता.. सुर्ख़ आँखों वाला चाँद.. कच्ची नींद का जागा झींका.. माथे पर ढेर सी रोलियों का टीका… मन्नतों के धागे सँवारे.. आरतियाँ सर से वारे… धुआं-धुआं अगरबत्तियों की ख़ुशबू में गुम.. दौनों में तरते फूलों को चूम… अर्घ्य के छिड़के जल से …

Read More »

.इस छोर… ढूँढता हूँ मैं … गुमशुदा ख़ुशियों का सिरा … उस छोर मेरी तलाश में है … इक गाँव सिरफिरा….

Gaon ka kosa

ऊँची रिहायशी बिल्डिंगों की खिड़कियों से झाँकूँ तो शहर बौना लगता है… चींटियों सी रेंगती कारें और खिलौने से मकाँ.. हवाओ के सफ़र से मैं भी मानने लगा हूँ कि क़द बढ़ गया है मेरा… कुछ लोग मेरे मयार के नहीं रहे.. झुक कर मिलूँ तो ओहदों को फ़र्क़ पड़ता है.. बेवजह नहीं मिलता अब मैं किसी से… पुराने दोस्तों …

Read More »

बाज़ार में पसरा… ये जश्न.. किसका जश्न है…? कोई मामूली बात नहीं… यह राम की घर वापसी का प्रश्न है

Dr. Kavita Arora on Deepawali Diya

बड़ी हसरत से तकते हैं शक्लों को मिट्टी के दिये… बाज़ार के कोनों से… और फिर उदासी ओढ़ कर सोचते हैं अक्सर… क्या उस नदी ने झूठ बोला था… इक उम्र तलक सरयू ने बांची..कथा राम की… बनबास राम का… और राम का लौटना… उसने रोज़ कहा… किस तरह वो जगमगाहटों का आधार बने थे .. इक सीता की पालकी …

Read More »

सुलह की कोशिशों में रात भर इक चाँद भटकता है…..

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

यह सितम्बर के गीला-सीला दिन.. फ़लक को भरमाये.. बादलों की पोटली में कुछ-कुछ धूप लटकाये… शाम को ढलकर.. हौले-हौले चलकर.. जब क्षितिज की ड्योढ़ी पर पसरता है.. बालों से बारिशें झटकती.. साँझ को.. बड़ा अखरता है… सुरमई बादलो की धुँध पर उँगलियाँ चलाकर… गुलाबी सर्दियों के गुनगुने क़िस्से सुनाकर.. जब-जब आह भरें.. तब तब साँझ की त्योरियाँ चढ़ें… नहीं सुहाता …

Read More »

मेरे शहर की/ तरक़्क़ी का यह मंज़र/ किसके हिस्से में आता है

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

काली रात की बस से उतरा रौशनी का छिटका, सहर की चिल्ल पौं, ट्रकों के हॉर्न की आवाज़ में भी बेसुध…बे खटका… वो रोड के डिवाइडर पर औंधे मुँह पड़ा रहेगा… और सैटेलाइट की सड़क कोर वाली झुग्गियों पर सूरज के चमकीले साये चढ़ जायेंगे तो लक दक शहर के बदन पर यह कोढ़ के साये साफ़ नज़र आयेंगे… ईसाइयों …

Read More »

झुमके वाली बरेली से गहरा नाता रहा उन मुंशी प्रेमचंद का जिन्होंने बताया था बहुत से हिन्दू कर्बला में हुसैन के साथ थे

Munshi Premchand

मुंशी प्रेमचंद जयंती स्‍पेशल Munshi Premchand Jayanti Special बरेली, 31 जुलाई 2019. आज उपन्यास सम्राट और हिंदी कहानी के पुरोधा, प्रगतिशील साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। इस अवसर पर “झुमका गिरा रे” वाली बरेली नगरी में बरेली के जिलाधिकारी वीरेंद्र सिंह की पहल पर हिंदी साहित्य के पुरोधा प्रेमचन्द जी की कहानियों पर आधारित नाटकों …

Read More »

अफ़सोस किताबों के लिखने वाले भी किताबों के सफ़हों में दफ़्न हैं किसी सूखे गुलाब की तरह

Munshi Premchand

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए। सवाल यह है कि किताबों ने क्या दिया मुझको ? अफ़सोस किताबों के लिखने वाले भी किताबों के सफ़हों में दफ़्न हैं, किसी सूखे गुलाब की तरह, जब बरक खोलो तो महकने लगती है शख़्सियत उनकी। चमकती जिल्द की सूरत कहाँ बताती है कि किन पथरीली राहों से वो शख़्स गुज़रा …

Read More »

लोग कोस रहे हैं/ यह विकृत मानसिकता वालों का कृत्य है/ मगर मैं पूछती हूँ क्या केवल यही सत्य है ??

रेप के मौसम नहीं होते.. उम्र-वुम्र ठिकाने भी नहीं… मंदिर-वंदिर, मस्जिद-वस्जिद, घर-रिश्तेदारी, इराने-वीराने किसी भी कारण ..किसी बहाने .. कहीं भी हो सकता है … चस्का है, लत है हिन्दुस्तान को रेप की .. शर्त लडकी है किसी भी खेप की .. सब चलती है … संविधान हर नये रेप पर नया क़ानून बनाता है … लागू हो गया लागू …

Read More »

अँधियारे पाख की इक कविता है जिसने चाँद बचा रक्खा है ..

डॉ. कविता अरोरा शुक्ल पक्ष फलक पर ढुलकता चाँद …टुकड़ी-टुकड़ी डली-डली घुलता चाँद …सर्दी ..गरमी ..बरसात ..तन तन्हा अकेली रात …मौसमों के सफ़र पर मशरिक़ से मगरिब डोलता है ..निगाहों-निगाहों में सभी को तोलता है…मसरूफियात से फ़ुरसत कहाँ आदमी को ..अब भला चाँद से कौन बोलता है ….दिन जलाये बैठी इन बिल्डिंगों का उजाला ….बढ़ा के हाथ फलक से रात …

Read More »

देश नशे में है .. अफीम की खेती ही फूलेगी फलेगी…तमाशा ख़त्म हुआ ..चलो बजाओ…ताली…

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

महीनों से चल रहा मेला उखड़ने लगा.. खर्चे-वर्चे, हिसाब-विसाब, नफ़े-नुक़सान के कुछ क़िस्से कौन सा घाट किसके हिस्से… अब बस यही फ़ैसला होगा… बंदर बाट होगी काट छाँट होगी… बस कुछ दिन और चलेगा… पान की दुकानों पर बातें… लोगों की आपस में चंद मुलाक़ातें… उसके बाद सब सब कुछ भूल जायेंगे.. गली-गली के मुहाने लगे.. चुनावी चेहरों के पोस्टर …

Read More »

धूल भरे मौसमों की ख़ुमारी पर दो बूँद की बारिश….

Ishq

धूल भरे मौसमों की ख़ुमारी पर दो बूँद की बारिश…. सौंधी महक से बौराई.. फ़िज़ां में…. शबनमी अल सुबहा के जोगिया लशकारे.. दरख़्तों के चेहरों से सरकते हैं.. तो.. अलसाये मजबूत काँधो वाले आबनूसी जिस्म.. उठाकर बाज़ुओं को अंगडाईयाँ.. लेने लगते हैं… इक मनचली शाख़.. उंगलियों में लपेट-लपेट कर कभी खोलें.. कभी बाँधे सिरे… अटका के सुबह को पहलू से …

Read More »

एय मेरी तुलू ए नूर .. तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर ..

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

डॉ. कविता अरोरा एय मेरी तुलू ए नूर .. तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर .. कर शुरूआत नयी .. लिक्ख उजाले  अपनी लकीरों में .. तू ख़ुशियों का अर्क पी .. रक्साँ- रक्साँ बढ़ चल .. हो बड़ी ..मेरे भरोसे पर .. कि यह माँ .. ता उम्र तुम्हारा साथ नहीं छोड़ने वाली … तू …

Read More »

यह खुद बेहद डरे हुए हैं ….इस नंगी औरत से ….

mob lynching

यह खुद बेहद डरे हुए हैं ….इस नंगी औरत से …. डॉ. कविता अरोरा कौन है ..? किसकी क्या लगती है ? कुछ भी तो नहीं पता …बद़जात का … एैसी वैसी ही है  …यह औरत … शायद औरत भी नहीं है … यह तो महज़ जिस्म है … जिस्म … रेड लाइट एरिया का … बिका हुआ ..जिस्म .. …

Read More »

तुम मनाओ 15अगस्त…./ मैं अफ़सोस मनाऊँगी…./  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस…..

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

तुम मनाओ 15अगस्त…./ मैं अफ़सोस मनाऊँगी…./  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस….. डॉ. कविता अरोरा हाँ हमने मान लिया…. हम रिश्ते नहीं..महज़..जिस्म हैं… जिस्म…. बग़ैर फ़र्क़ कि उम्र क्या है… 5..7..12…14…सब चलती हैं……, उफ़ वक़्त के वफ़्फ़े…. चुप्पी साधे कोने …. हर छ: घंटे में .. सामने बेबसी से तकते हैं… सख़्त गिरफ़्त में… गपचे हुए जिस्म .. सुनते …

Read More »

यूँ तो मुझे ….. खुद छूना था उसे … छू ..भी लेती …. पर क्या करूँ ….

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

डॉ. कविता अरोरा कल शाम छत पर … बारिशों के रूके पानी में शफ़क घोल रहीं थी अपने रंग … कि मैंने कलाई थाम लीं … फँसा दी साँझ की गुलाबी उँगलियों में उँगलियाँ अपनी और उँगलियाँ कस लीं … भिंची मुट्ठियाँ खुल गयीं साँझ की और मुट्ठियों के बेताब …लाल ..पीले.. गुलाबी ..सिन्दूरी रंग उतर आयें हथेलियों पर मेरी …

Read More »