भगत सिंह हैं आज की जरूरत : भगत सिंह का देश ऐसे नहीं बनता

आज शहादत दिवस पर विशेष

Special on Shahadat Day today

सुसंस्कृति परिहार

भगत सिंह समाजवादी व्यवस्था के ध्येय को स्वीकार कर चुके थे। वे मनुष्य द्वारा मनुष्य और राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण से मुक्तविहीन समाज के पक्षधर थे। वे साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ थे। आज साम्राज्यवादी ताकतों के साथ पूंजीवाद ने बाजार के माध्यम से शोषण के सरलीकृत तरीके ढूंढ लिए हैं। मुखौटाविहीन बाजार के इस शेाषणकर्ता की पहचान आसान नहीं है लेकिन गहराई से इन मसलों पर अध्ययन कर हमारे युवा इस दिशा में सक्रिय भागीदारी निभाकर देशवासियों को इस खतरे से सावधान कर सकते हैं। समाजवाद की बात तो दूर पूंजीवाद की जन्मजात शत्रु धारायें उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। जिन्हें समझना भी होगा।

पिता को भगत सिंह का खत

Bhagat Singh's letter to father

भगत सिंह के एक खत से शुरूआत करते हैं जो उन्होंने अपनी शादी की बात के संदर्भ में पिता को लिखकर घर छोड़ दिया था-

पूज्य पिताजी जी, नमस्ते।

मेरी जिन्दगी मकसदे आला (ऊंचे जीवन उद्देश्यों) यानि आकाादी-ए-हिंद के असूल के लिए वक्फ (दान) हो चुकी है इसलिये मेरी जिन्दगी में आराम और दुनियाबी ख्वाहसात (ख्वाहिशें) वायसे कोशिश (आकर्षक) नहीं हैं।

उन्होंने अपने पिता सरदार किशन सिंह को यह भी याद दिलाया था कि आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था तो बापू जी ने मेरे जनेऊ के समय ऐलान किया था कि मुझे खिदमते वतन के लिए वक्फ (दान) दिया गया है।

महात्मा गांधी ने भगत सिंह को बताया था महानायक

Mahatma Gandhi told Bhagat Singh great hero

निस्संदेह भगत सिंह देश प्रेम की अनूठी मिसाल थे। उन्हें सिर्फ शहीदे आजम कहना उनके कद को छोटा करना है। वे तो आजाद भारत के सम्पूर्ण विकास का रास्ता बना कर गए थे। काश! देश उस रास्ते पर बढ़ा होता। यही वजह है कि महात्मा गांधी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते वक्त कहा था-

‘भगत सिंह के अलावा मुझे और कोई ऐसा महानायक याद नहीं पड़ता जो अपने जीवनकाल में ही आख्यान बन गया।’

आज देश में जिस तरह का माहौल है उसमें भगत सिंह की याद बरबस आ जाती है। उन जैसे क्रांतिकारी अग्रदूत की आज जरूरत महसूस होने लगी है। युवा शक्ति भटकाव के रास्ते पर है। देश को अपने मूल विचारों से किनारा करने के लिए विचारकों साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और ऊर्जावान विद्यार्थियों पर साजिशन हमले हो रहे हैं। साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने और संविधान-विरोधी गतिविधियों को सरकार का कथित संरक्षण प्राप्त हो रहा है।

झूठ बोलने का एक अजीब दौर है। प्रगतिशील विचारों को खत्म करने का सिलसिला जारी है। धर्मान्धता और आडम्बरों के जाल में जनमानस को उलझाया जा रहा है।

एक नहीं कई कन्हैयाओं और भगत सिंहों की जरूरत है

कहते हैं- जब अत्याचार बढ़ता है तो भगवान कृष्ण अवतार लेकर आते हैं। शायद कन्हैया का अवतरण जेएनयू में हो चुका है। उसकी कंसों से मुठभेड़ जारी है। पर एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में एक नहीं कई कन्हैयाओं और भगत सिंहों की जरूरत है। जिनमें क्रांतिकारी भगत सिंह के विचारों, देश प्रेम और जीवन के प्रति मोह न हो।

आईये, इंकलाबी भगत सिंह को जानें जब उन्होंने अंग्रेजी शोषण कर्ताओं से संघर्ष करने के लिए गदर पार्टी में जुझारू नौजवानों को लेकर संगठन बनाया। जो आन्दोलन के इतिहास में एक बड़ी पहल थी। इसने राजनीति को धर्म से मुक्त किया और धर्मनिरपेक्षता को अपनाया और धर्म को व्यक्ति का निजी मामला घोषित कर दिया उन्होंने लिखा कि समस्या हिंदू-मुसलमान की नहीं है भारतीय बनाम अंग्रेज शोषण की है। हिन्दू-मुस्लिम एकता को इतना मजबूत किया जाये कि कोई उसे तोड़ न सके। आज दोनों दो राहों पर खड़े नकार आते हैं। दोनों का शोषण हो रहा है। अमीर निरंतर अमीर और गरीब निरंतर गरीब हो रहा है। यह हमारी आज की तस्वीर है। भगत सिंह को याद करते हुए हमें सबसे पहले यह फैसला करना होगा कि हम सब भारतवासी एक हैं और सिर्फ भारतीयहैं। हमारी एकजुटता ही हमें शोषण मुक्त कर पायेगी। धर्म से राजनीति के घालमेल के वे सख्त विरोधी थे। भाई का भाई से लड़ाना। जनता के हौसले पस्त करता है। उनकी दृष्टि धुंधला जाती है। असली दुश्मन की पहचान वे नहीं कर पाते। इस तरह साम्राज्यवादी ताकतें हम पर हावी होती जा रही हैं। उन्होंने गदर पार्टी के सदस्यों को इस धर्मवादी जहर से दूर रखा था। इनकी यह हम सब के लिए एक जरूरी सीख होनी चाहिये।

भगत सिंह समाजवादी व्यवस्था के ध्येय को स्वीकार कर चुके थे। वे मनुष्य द्वारा मनुष्य और राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण से मुक्तविहीन समाज के पक्षधर थे। वे साम्राज्यवादीव्यवस्था के खिलाफ थे। आज साम्राज्यवादी ताकतों के साथ पूंजीवाद ने बाजार के माध्यम से शोषण के सरलीकृत तरीके ढूंढ लिए हैं। मुखौटाविहीनबाजार के इस शेाषणकर्ता की पहचान आसान नहीं है लेकिन गहराई से इन मसलों पर अध्ययन कर हमारे युवा इस दिशा में सक्रिय भागीदारी निभाकर देशवासियों को इस खतरे से सावधान कर सकते हैं। समाजवाद की बात तो दूर पूंजीवाद की जन्मजात शत्रु धारायें उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। जिन्हें समझना भी होगा।

निरा और अंधविश्वास को वे खतरनाक मानते हुए लिखते हैं कि इससे मस्तिष्क कुंठित हो जाता है तथा आदमी प्रतिक्रियावादी।ईश्वर, धार्मिक विश्वास और धर्म को तिलांजलि भगतसिंह के लिए न तो आकस्मिक थी और न ही उनके अभियान या अहम का परिणाम थी। उन्होंने 1926 में ही ईश्वरीय सत्ता को अस्वीकार कर दिया था। उन्हीं के शब्दों में 1926 के अंत तक उन्हें इस बात पर यकीन हो गया था कि स्मृति का निर्माण व्यवस्थापन और नियंत्रण करने वाली किसी सर्वशक्तिमान परम सत्ता के अस्तित्व का सिद्धांत एकदम निराधार है।

उनके इन विचारों को मानने वाले हालांकि अपेक्षाकृतकम है पर अंधविश्वासों को समाप्त करने की जो मुहिम 60 वर्षों तक चली उस पर भी कुछ कट्टरवादियों की नकारलग गई और उन्होंने अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर को दिन दहाड़े गोली से उड़ा दिया। शिवाजी कौन थे- लिखने वाले कामरेड पानसरे को भी गोली का शिकार बनाया गया।

हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वतंत्र देश में गोली का शिकार हुई है। ये अच्छे संकेत नहीं। लोकतंत्र और संविधानविरोधी हैं। देश को आगे बढ़ना है तो जड़ता को तोड़ना होगा। विचारों का सम्मान करना सीखना होगा। भगत सिंह का देश ऐसे नहीं बनता।

कुछ लोग भगत सिंह को भावुक नौजवान यहां तक कि आतंकी कहने से नहीं चूकते। वे भावुक हो सकते हैं पर आतंकी नहीं, क्योंकि उन्होंने आकााद भारत के विकास की पूरी परिकल्पना तैयार कर ली थी। वे बड़े चिंतक-विचारक और अध्ययनशील व्यक्ति थे। उन्होंने जेल के अंदर डेढ़ वर्ष में तकरीबन दुनिया की 100 महान लेखकों की पुस्तकें पढ़ डाली थीं।400 पेज की डायरी में महत्वपूर्ण विचार लिखे जिस दिन उनको फांसी होने वाली थी, वे लेनिन को पढ़ रहे थे और जहां तक पढ़ा वहां पृष्ठ मोड़ गये थे। सोडर्स अंग्रेज की हत्या और असेम्बली में बम फेंकना उनके सुनियोजित कार्यक्रम थे। एक ओर भारतीय अस्मिता का सवाल था दूसरी ओर बहरी सरकार को जगाना उनका लक्ष्य था।

जनता की चेतना को जागृत करने उन्होंने कई संगठनों को खड़ा किया था जिसमें नौजवान भारत सभा, लाहौर स्टूडेंट यूनियन आदि प्रमुख हैं। 1924-25 के दरम्यान उन्होंने 12 से 16 वर्ष के बच्चों के लिए बाल स्टूडेंट यूनियन भी बनाई। देश को ऐसे ही देश हितैषी संगठनों कीजरूरत है। यह मुख्य काम होना चाहिये क्योंकि ऐसे ही लोग जनहित का काम करते हुए गरीब, वंचित और शोषितों की रहनुमाई कर सकते हैं।

उनके एक कथन से अंत करना चाहूंगी कि ‘अन्याय के विरूद्ध जो अपनी राह नहीं छोड़ते, जिनके पैर नहीं लडख़ड़ाते वे तिल-तिल अपने साथियों के लिए दिये से जलते रहते हैं ताकि दिये की लौ मद्धिम न होने पाये। सुनसान डगर पर अंधेरा न छा जाये ऐसे ही लोग मेरे भारत के स्वप्न को साकार कर पायेंगे।’ आईये-तलाश करें ऐसे साथियों की- इंकलाब जिन्दाबाद!

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