मेधा पाटकर से मिलने पहुंचा बिलाल कैसे नजीब बनने से बचा, पढ़ें आपबीती

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अस्पताल में मेधा पाटकर से मिलने की कोशिश में एक्टिविस्ट के अपहृत होने की आपबीती-

बिलाल खान

(अनुवाद -पलाश विश्वास )

मैं मेधा पाटकर से मिलने अपने चार साथियों के साथ 8 अगस्त को इंदौर के बांबे अस्पताल जा पहुंचा, जिन्हें मध्य प्रदेश पुलिस ने उनके अनिश्चितकालीन अनशन के बारहवें दिन 7 अगस्त को जबरन उठाकर वहां दाखिल करवाया था।

सरदार सरोवर के उफनते पानी में मध्यप्रदेश के 192 गांवों और एक कस्बे को गैरकानूनी रूप से डुबाने के विरोध में मेधा पाटकर पीड़ित ग्यारह ग्रामीणों के साथ अनिश्चितकालीन अनशन पर थीं। क्योंकि चालीस हजार परिवारों की जान दांव पर लगी थी।

मेधा पाटकर सुप्रीम कोर्ट के ताजा और पिछले फैसले के दिशा निर्देश के मुताबिक डूब की हालत में पहले से निर्देशित ऐहतियाती इंतजाम के तहत प्रभावित इन सभी परिवारों को पूरा पुनर्वास दिये जाने की मांग कर रही हैं।

मैं आवास के अधिकार के अभियान के तहत मुंबई में घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन(जीबीजीबीए) में सक्रिय हूं। घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन ने शिवालिक डेवेलपर के गोलीबार में गंदी बस्ती पुनर्वास योजना के तहत आदर्श घोटाला समेत अनेक घोटालों का पर्दाफाश किया है।

जीबीजीबीए उन लोगों के लिए, जो औपचारिक आवास खरीद नहीं सकते, न्यूनतम आवास सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय कानून बनवाने का अभियान भी चला रहा है। इस अभियान की मांगों में संयुक्त राष्ट्र संघ,आर्थिक,सामाजिक सांस्कृतिक अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन और भारत सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देशों के मुताबिक घर के हकहकूक की आवाज उठायी जाती है।

जीबीजीबीए के मुंबई की बीस अनौपचारिक आबादियों में स्थानीय संगठन हैं,जिसके तहत इसका मोहनतकश तबके में व्यापक जनाधार है। मेधा पाटकर इस आंदोलन की नेता रही हैं।

मैं नर्मदा बचाओं आंदोलन में भी अंशकालिक कार्यकर्ता बतौर सक्रिय हूं। मैं भी नर्मदा बचाओ आंदोलन के अनिश्चितकालीन अनशन विरोध में शामिल हूं।

अनशनस्थल चिखल्दा से जबरन उठाकर मेधा पाटकर पुलिस कहां ले गयी है, इसका पता लगते ही हम लोगों ने इंदौर के बांबे अस्पताल जाने का फैसला कर लिया। अस्पताल पहुंचकर ही हमें मालूम पड़ा कि किसी को उनसे अस्पताल में मिलने की इजाजात नहीं है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने ट्वीट किया है कि अनशन की वजह से गिरती हुई सेहत के मद्देनजर मेधा को सिर्फ अस्पताल में दाखिल किया गया है और उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है। इसलिए मेधा से मुलाकात करने से रोक रही पुलिस से हमारी बहस हो गयी।

हम मांग कर रहे थे कि अगर उनसे मिलने की इजाजत नहीं है तो उनकी तीमारदारी के लिए कम से कम एक व्यक्ति को इजाजत दे दी जाये।

मीडिया ने पुलिस के साथ हमारी बहस रिकार्ड कर ली और इसका प्रसारण करना शुरू कर दिया। जैसे ही यह एक मुद्दा बन गया, पुलिस ने आखिरकार साथी कार्यकर्ता लतिका राजपूत को मेधा से एकबार मिलने की इजाजत दे दी। लेकिन इसे मुद्दा बना देने के लिए पुलिस हमसे नाराज हो गयी। अस्पताल परिसर में ही मुझे इसका आभास हो गया था कि मुझ पर नजर रखी जा रही है और जैसे ही वाशरूम जाने के लिए वाचमैन को कहकर मैं परिसर में दाखिल हुआ तो इसकी पुष्टि भी हो गयी। इसी हिस्से से होकर मेधा के वार्ड को जाने का रास्ता है। मैं परिसर में दाखिल होने के बाद कुछ ही कदम चल पाया था कि पीछे से एक पुलिसवाला ने लपककर मुझे पकड़ लिया। उसने एक हाथ से मेरी गर्दन का घेरा डाला तो दूसरे हाथ से मेरा दाहिना हाथ इस तरह पकड़ लिया कि जैसे वह मुझसे हाथ मिला रहा हो। इस तरह मुझे पकड़ने के बाद वह मुस्करा रहा था। उसकी मुस्कान से मुझे लगा कि मैं मुसीबत में नहीं हूं और मुझे यह भी लगा कि वह या तो मुझे वापस जाने को कहेगा या मेधा से मिलाने ले जायेगा।

मुझे लगा कि मेधा के किसी निकट सहयोगी बतौर वह मुझे जान रहा होगा। लेकिन मेरे ये सारे विचार यकायक तब गायब हो गये जब उसने किसी से कहा कि मेरी जेब से सेल फोन निकाल लें। मुझे लगा कि विरोध करने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि तब तक पुलिसवालों ने मुझे घेर लिया था। मैंने यह देख लेने की भी कोई परवाह नहीं कि कौन मेरा सेल फोन मेरी जेब से निकाल रहा है। तब तक मैं मान चुका था कि अब मैं वाकई मुसीबत में हूं और मेरा बच निकलना मुश्किल है क्योंकि मुझसे पुलिस जिस तरह बर्ताव कर रही थी, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती और मेरे लिए यह एक सदमा था।

पुलिसवाला मुझे लाउंज की तरह दीख रहे एक परिसर में ले गया। वहां मौजूद सभी लोगों से परिसर खाली करवा दिया गया। खाली परिसर में और पुलिसवाले आ गये।

मैं एक सिपाही के हाथ में लाठी देखकर आगे होने वाली कार्रवाई के लिए खुद को तैयार करने लगा। हालांकि मुझे मालूम था मेरे किसी अनुरोध से कुछ होने वाला नहीं है, फिर भी अपनी तरफ से मैंने कोशिश की और मुझे पकड़े हुए पुलिसवाले के कान में मैंने कहा कि मैं तो सिर्फ वाशरूम जाने के लिए परिसर में दाखिल हुआ। उसने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

कुछ देर बाद लठैत सिपाही बाहर निकल गया, जिससे मुझे थोड़े वक्त के लिए राहत मिली। आखिरकार उस पुलिसवाले ने मेरा हाथ छोड़ दिया और मुझे अलग खड़ा कर दिया। उसने सादा ड्रेस वाले दो सिपाहियों को अंदर बुला लिया। वे लोग मुझ पर नजर गाढ़े हुए थे। मुझे लगा कि वे मुझे धुन डालेंगे। उनमें से एक बाहर निकल गया। मुझे दूसरे के साथ एक बेंच पर बैठा दिया गया और वह बेंच कई कुर्सियों के साथ जुड़ा हुआ था। तब पुलिस वाले ने मेरे दूसरे साथियों की तस्वीरें दिखायीं जो उसने तब खींची जब हम मीडिया से बात कर रहे थे।

उसने तस्वीरों में मीडिया से बात कर रहे मेरे हर साथी के नाम पूछे। कुछ देर बाद एक सिपाही भीतर आया और उसने बताया कि जीप आ चुकी है। मुझे जीप में बिठाया गया। मैंने देखा कि सीनियर अधिकारी मुझे कहीं ले जा रहे सिपाहियों के कान में कुछ कह रहे थे।

मुझे जीप में बिठाकर बहुत दूर किसी थाने में ले जाया गया। मैं थाने का नाम भी पढ़ नहीं पाया। बेगुनाह होने के बावजूद अपनी मर्जी मुताबिक जिस तरह उन्होंने मुझे उठा लिया, इससे मैं अपसेट हो गया। मैंने विरोध करना या प्रतिक्रिया जताना छोड़ दिया और सिर्फ जो कुछ हो रहा था, उसे ध्यान से देख रहा था।

जब भी मुंबई में किसी बस्ती को हटाया जाता तो मैं अक्सर पुलिस थाने में चला जाता रहा हूं और आला पुलिस अफसरों से आत्मविश्वास के साथ बातचीत करता रहा हूं। लेकिन इस दफा मेरा वह आत्मविश्वास ही चला गया।

चूंकि मैं मुसलमान हूं, मैं अपनी इस पहचान को लेकर भी घबड़या हुआ था। मैं घबड़ाहट के मारे अपना पूरा नाम बता नहीं पा रहा था। उनके जोर डालने पर हालांकि मैंने अपनी उपाधि बता दी।

आखिरकार मैं थाने के भीतर था और मैंने तुरंत ही तीन चीजों की मांग रख दी- वकील, पानी और बाथरूम। मुझे बाथरुम की मांग खारिज कर दी गयी और मुझसे लाकअप के टायलेट के इस्तेमाल के लिए कहा गया। मैंने इस कोई तरजीह नहीं दी कि बाथरुम लाकअप में है या और कहीं, मैं भागकर अंदर गया और फारिग हो लिया। इस टायलेट का कोई दरवाजा नहीं था लेकिन वह 2-3 फीट ऊंचाई की दीवार से वह घिरा था। मैं जब अंदर ही था तो मैंने देखा कि कोई अनजाने में लाकअप का दरवाजा बंद कर रहा है। मैं चीखा कि मैं अंदर हूं। यह मैंने इसलिए किया ताकि मुझे मालूम पड़ जाये कि मुझे लाकअप में बंद किया जा रहा है या बाहर बिठाया जा रहा है। बहरहाल दरवाजा बंद नहीं किया गया। मैंने जींस पहन ली और लाकअप से बाहर चला आया।

तब अस्पताल से मुझे उठाकर लाने वाले सिपाही ने मुझे ड्यूटी अफसर के सामने खड़ा कर दिया। उसने मेरा नाम पता पूछा। उसने पूछा कि मैं कहां से और क्यों आया हूं। मैंने उसे बता दिया कि मैं मुंबई से आया हूं और यह भी कि कैसे मैं मेधा पाटकर से जुड़ा हूं और उनसे मिलना चाहता हूं।

उसने जबाव में मुझे गंदी सी गाली दी और मुझे जूते उतारकर कोने में एक बदबूदार गंदी जगह बैठा दिया। पलभर में उसने मुझे बुलाया और मेरे पास मौजूद सारे पैसे जमा करने के लिए कहा। मैंने सारी नकदी निकाल ली और गिनकर उसके हवाले कर दिया।

दूसरे कोने पर बैठे एक और अफसर ने ड्यूटी अफसर से पैसे अपने पास रखने के लिए मना् कर दिया। मैं फोन के बिना खुद को बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटा हुआ महसूस कर रहा था। मैं किसी वकील या मित्र से संपर्क भी नहीं कर सकता था। किसी को दरअसल मालूम नहीं था कि मैं कहां हूं। मैं लापता हो गया।

मैं घुटनों के बीच सिर रखकर सोचने लगा कि मेरे साथ क्या बीत सकती है। अचानक तभी मैंने किसी की पिटाई की आवाजें सुन लीं। उसकी चीखें तेज होती चली गयीं। आखिरकार दूसरे कोने में प्लास्टिक की पाइप से पिटने के बाद कुछ लड़के मेरे कोने में पहुंच गये।

मुझे लगा कि किसी भी वक्त अब नाराज पुलिसवाले मेरी भी इसी तरह मरम्मत करने वाले हैं। इसी बीच पिटाई बंद हो गयी तो मैं वापस उसी हालत में पहुंच गया और उसी सोच में उलझ गया। तमाम फिल्मों में दिखाये उत्पीड़न के दृश्य मेरी आंखों में तिर रहे थे और मैं मानसिक तौर पर इसके लिए खुद को तैयार करने लगा। मैं यह भी सोच रहा था कि मुझसे संपर्क न होने की हालत में मेरी मां पर क्या बीत रही होगी। वह फोन पर मुझसे रोज बात करती हैं। कभी कभी दिन में दो-दो बार। उनके तरह तरह के बहाने होते सिर्फ यह जानने के लिए कि मैं सुरक्षित हूं। पहले पहल वह मेरे काम से नाखुश थीं। बाद में उन्हें मालूम हो गया कि मेरी सक्रियता खत्म होने से रही। तब उन्होने मुझे आगाह करना जारी रखा कि मैं किसी आंदोलन में सामने न रहूं और इसके खतरों के बारे में वे लगातार मुझे चेतावनी देती रहीं। मैं हमेशा चालाकी के साथ उनके कहे के खिलाफ काम करता। मैं उन्हें जानबूंझकर सदमे की हालत में देखने की कल्पना नहीं कर सकता।

मुझे अब फिक्र हो रही थी कि मेरी गुमशुदगी पर मेरी मां पर क्या असर होने वाला है। पाठकों को लगता होगा कि मैं बहुत जल्द हताश हो गया। हां, मैं खासकर दो वजहों से हताश हो गया था। पहली वजह यह है कि पुलिस ने मुझे अगवा कर लिया है, कोई आसानी से इसकी कल्पना नहीं कर सकता। इसलिए मुझे लापता माना लिया जायेगा। अगर मेरी गुमशुदगी की शिकायत भी किसी ने दर्ज करा दी तो भी पुलिस मदद नहीं करने वाली है क्योंकि पुलिस ने ही मुझे अगवा कर लिया है। दूसरी वजह यह है कि व्यवस्था पर मेरा भरोसा खत्म हो चुका था। मेरी रिहाई पूरी तरह मेरी किस्मत के भरोसे थी।

थोड़े थोड़े अंतराल के बाद कोई सिपाही या दूसरा सिपाही लगातार आकर मुझसे एक ही जानकारी मांगता रहा – मेरे नाम और मेरे घर के बारे में। हर बार मेरा जबाव एक सा होता। करीब घंटे भर बाद मैं सिपाहियों के बर्ताव में बदलाव देखने लगा और वे मेरे साथ सही तरीके से पेश आने लगे। मुझे मिनरल वाटर का बोतल दिया गया और उन्होंने खाने के बारे में भी पूछ लिया।

मैंने पानी ले लिया और खाने को पूछने के लिए धन्यवाद कह दिया। कुछ देर बाद ड्यूटी अफसर ने बुलाकर कहा कि सीनियर अफसरों के थाना आने के बाद मुझे रिहा कर दिया जायेगा। उसने मुझे चाय भी दी। मुझे आधी अधूरी राहत महसूस होने लगी, लेकिन मुझे उनपर अभी पूरा भरोसा नहीं हो रहा था।

इस बीच मुझे अगवा करने के दो घंटे बीत चुके थे। अब मैं अपनी रिहाई के लिए उनसे कहने के बारे में सोचने लगा क्योंकि सीनियर अफसर आ नहीं रहे थे। हालांकि अगवा होने का मुझे गहरा सदमा लगा था और मैं किसी से कुछ कहना नहीं चाहता था और न अपने साथ कुछ होने देना चाहता था। मेरे साथ पहले ही नाइंसाफी हो चुकी थी। इसकी खिलाफत करने का मतलब था इंसाफ की भीख मांगना। मैं चैरिटी में दी गयी जिंदगी जीना नहीं चाहता और कमाकर जिंदगी जीने का ही मेरा मकसद है।

आखिरकार मुझे बुलाया गया और बिना इजाजत अस्पताल में घुसने के लिए मुझसे एक माफीनामा लिखवा और दस्तखत करवा लिया गया। माफीनामे पर दस्तखत के बाद मुझे मेरा सेल फोन लौटाकर जाने के लिए कह दिया गया..

मैंने एक आटो रिक्शा लिया और चालक से मुझे फौरी तौर पर बांबे अस्पताल छोड़ने के लिए कहा, जहां से पुलिस ने मुझे अगवा कर लिया था। ऐसा यह सोचकर किया कि अगर वापसी के रास्ते कोई खतरा महसूस हो तो मैं अपना रुट बदल सकता हूं। मेरा खतरे का अंदेशा सच निकला और इंदौर के स्थानीय समर्थकों से बात करने के लिए फोन का स्विच आन करते ही ही मुझे उस थाने से फोन आ गया जहां मुझे घंटों ( 1.30 बजे दोपहर से 4.30 चार बजे अपरान्ह) तक रखा गया। उन्होंने मुझे कोई वजह बताये बिना फौरन पांच मिनट के भीतर थाने वापस लौटने के लिए कहा। मैंने मना नहीं किया और कह दिया कि मैं वापस लौट रहा हूं। लेकिन चूंकि बांबे अस्पताल की तरफ आधा रास्ता मैंने तय कर लिया था, मैंने अस्पताल पहुंचने का ही फैसला किया। मैंने सोचा कि अगर मुझे थाने वापस जाना पड़ा तो मैं किसी वकील के साथ वहां पहुंचू। इसके साथ ही मुझे डर था कि कहीं वे रास्ते में ही मुझे पकड़ न लें। फिर भी मैंने यह जोखिम उठाना तय किया क्योंकि मैं वापस चला जाता तो मेरी वापसी की कोई संभावना नहीं थी। जबकि मैं अस्पताल तक पहुंच गया तो मेरी सुरक्षा के अवसर बनते थे।

मैंने हमारे इंदौर के समर्थक को फोन लगाया और उसे कह दिया कि मैं बांबे अस्पताल पहुंच रहा हूं। उसने मेरे लोकेशन के बारे में पूछा ताकि वह मुझे ले जा सके। मैंने उससे कहा कि मैं खुद ही अस्पताल पहुंच रहा हूं क्योंकि उसके इंतजार में फिर पुलिस के हाथ लगने का जोखिम उठाने को मैं तैयार नहीं था।

मैं जब तक बांबे अस्पताल पहुंचा तब तक मुझे थाने से कई फोन काल वहां वापस लौटने के लिए मिले। जैसे ही मुंबई अस्पताल मैं पहुंचा तो मुझे समर्थकों की भीड़ ने घेर लिया जो मेरी रिहाई की मांग कर रहे थे। मुझे मीडिया वालों ने भी बाइट देने के लि्ए घेर लिया। जैसे ही मीडिया पर मैं पेश होने लगा, थाने से काल आना बंद हो गया। हर प्रांतीय चैनल ने दावा करना शुरु किया कि उनकी खबर की वजह से में रिहा हो गया।

जल्दी ही एक राजनेता का फोन आ गया जो कुशल क्षेम पूछने के बहाने यह बता रहे थे कि उनके असर की वजह से ही मैं छूट गया।

बहरहाल लतिका और दीपमाला (इंदौर में एक और समर्थक ) ने मेरे लापता होने के दस मिनट के अंदर मीडिया को मेरी गुमशुदगी की खबर दी थी, जिससे मीडिया का शोरगुल शुरू हो गया था।

दरअसल मैंने वाशरूम जाने से पहले लतिका को बता दिया था और उसने हंसकर पूछा भी था कि मैं उसे यह क्यों बता रहा हूं। मुझे बताया गया कि आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखने वाले इंदौर के एक पूर्व आईजी ने मेरी रिहाई में मदद की है।

शायद मीडिया की प्रतिक्रिया और कुछ असरदार लोगों के हस्तक्षेप की वजह से थाने में पुलिस का बर्ताव बदल गया था।

इसी बीच मैंने देखा कि जिस पुलिसवाले ने मुझे अस्पताल से उठा लिया, उसने हमारे इंदौर के समर्थक को बुला लिया। अस्पताल में मेधा पाटकर की सुरक्षा का जिम्मेदार यह पुलिसवाला इंदौर के आला पुलिस अफसरों में एक है। समर्थक उनके साथ भीतर चले गये।

यह समर्थक इंदौर के एक जाने माने पत्रकार और लेखक हैं और अस्पताल में हमारे साथ मौजूद वकील के वे पिता हैं। इंदौर के मशहूर नागरिक होने के कारण इस समर्थक को अस्पताल में मेधा पाटकर से मिलने के लिए सीमित प्रवेशाधिकार मिला हुआ है, जबकि असरदार एमएलए एमपी समेत बड़े राजनीतिक दलों के किसी राजनेता को भी अस्पताल में प्रवेशाधिकार नहीं मिला है चाहे इसका कितना ही विरोध हुआ हो।

उस आला अफसर के साथ अंदर गये और बैठे समर्थक ने कुछ देर बाद अपने वकील बेटे को फोन पर मुझे तुंरत अस्पताल से मुझे दूर ले जाने के लिए कहा। मुझे पक्का यकीन है कि हमारे समर्थक से उस आला् अफसर ने मुझे फिर मीडिया पर दिखने से मना कर दिया है और इसी मकसद से अस्पताल से जाने के लिए कहा है।

पुलिस मेरे मीडिया के सामने आने से नाराज थी और उस आला पुलिस अफसर ने मीडिया से मेरे अगवा होने या गिरफ्तार किये जाने से मना कर दिय़ा था। लेकिन मेरे फिर मीडिया के सामने आ जाने पर मध्यप्रदेश पुलिस विभाग का यह दावा गलत साबित हो गया। बहरहाल स्थानीय समर्थक की सलाह पर मैं बाकी दिन भूमिगत ही रहा।

अगले दिन मुझे पता चला कि अस्पताल से मेधा पाटकर को डिस्चार्ज किया जा रहा है। इसकी उम्मीद नहीं थी क्योंकि हम सभी ने अंदेशा जताया था कि मध्य प्रदेश सरकार मेधा को जल्दी रिहा नहीं होने देगी। हालांकि हमने जिस दिन मेधा को डिस्चार्ज किया गया, उसी दिन मेधा पाटकर की गैरकानूनी गिरफ्तारी के खिलाफ एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दी थी। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की खबर लीक हो गयी और इसीलिए अदालत का सामना करने से बचने के लिए मेधा की रिहाई का फैसला कर लिया गया। लेकिन उनकी सबसे गंदी योजना के बारे में हमे बाद में उसी दिन पता चल गया। मैंने अस्पताल जाने का फैसला किया।

मैंने देखा कि पुलिसवाले मेरी तरफ इशारा करते हुए आपस में बातें कर रहे हैं। उनमें से एक पुलिसवाले ने मुझे बुलाकर पूछा कि अस्पताल से निकलने के बाद मेधा की अगली योजना क्या है। जब मैं उसकी तरफ जा रहा था, तब उसने अपने पास खड़े सीनियर पुलिस अफसर को बताया कि मैं ही बिलाल हूं।

मैं समझ गया कि वह मुझे क्यों बुला रहा है और विनम्रता पूर्वक कोई सतही जबाव देकर लौट आया।

हम मेधा को इंदौर में एक दूसरे समर्थक के घर ले गये। वहां भी मीडिया ने उन्हें घेर लिया। मीडिया ने मेधा से पुलिस द्वारा मुझे अगवा किये जाने के बारे में प्रतिक्रिया भी पूछ ली। मेधा ने मध्य प्रदेश पुलिस की इस करतूत पर नाराजगी जतायी।

मीडिया के बाइट लेने के बाद संवाददाताओं में से एक मेरे पास आकर बोले कि डीआईजी ने फोन करके उनसे मेरे लापता होने की खबर न चलाने के लिए कहा है। उसने कहा कि वह दबाव में नहीं आने वाला है और यह समाचार चलाने वाला है क्योंकि उसका बास रिलायंस है (यकीनन वह यह जतलाना चाहता था कि उसका बास बास का बास है)!!

मैंने पूछा कि क्या उसे मालूम है कि उसका बास और डीआईजी हमारे विरोध में एक ही पाले के लोग हैं। वह न्यूज रिपोर्टर मेरी बात समझ नहीं सका और मुझे अपना कार्ड थमाकर हाथ मिलाकर उसने बातचीत खत्म कर दी।

मुझे पिछले दिन मेरे अगवा होने से पहले ऐसे ही वाकया का सामना करना पड़ा था। जब हम अस्पताल पहुंचे तो मुझसे पत्रकारों में से किसी ने आगाह कर दिया कि मैं मेधा पाटकर की गैरकानूनी गिरफ्तारी, उनके अनिश्चितकालीन अनशन और आंदोलन के बारे में कुछ भी कह सकता हूं, लेकिन कैमरे के सामने मैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम नहीं ले सकता। ऐसे में वे खबर नहीं चला सकेंगे।

जाहिर है कि मुझे पता चल गया कि अपना काम करते हुए इन संवाददाताओं की परेशानी आखिर क्या है। वे ऐसे बास के मातहत काम करते हैं जो हमें दुश्मन मानते हैं लेकिन सनसनीखेज खबरों के पीछे वे हमारी मदद कर रहे होते हैं क्योंकि उन्हें अपनी वफादारी के बारे में साफ-साफ कुछ मालूम नहीं होता। जबकि कोई बात हमारे खिलाफ भी जाती हो तो मुझे ईमानदारी बरतनी होती है।

मुझे मालूम है कि मीडिया के त्वरित एक्शन, समर्थकों, मित्रों और असरदार लोगों की वजह से मैं आज लापता नहीं हूं। जबकि मुझे यह भी मालूम है कि ऐसा न होने की स्थिति में मैं भी एक और नजीब बन सकता था।

पुनश्च मैं उस पत्रकार के प्रति बेहद आभार जताना चाहता हूं. जिसने मुझे पुलिस द्वारा अगवा होते देखकर मेरे साथियों को तुरंत इसकी जानकारी दे दी। 

About Palash Biswas

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए "जनसत्ता" कोलकाता से अवकाशप्राप्त। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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