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“चौथी दुनिया” का बड़ा खुलासा : मोदी सरकार गेट्स फाउंडेशन की मदद से चला रही जनसंख्या सफाए का अभियान

नई दिल्ली। आपातकाल में नसबंदी अभियान को अपना मुद्दा बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार एक खतरनाक खेल रही है। चौथी दुनिया साप्ताहिक समाचारपत्र ने वरिष्ठपत्रकार प्रभात रंजन दीन की एक बड़ी ख़बर प्रकाशित की है। “मोदी सरकार का खतरनाक नसबंदी अभियान” शीर्षक से प्रकाशित दो पेज की यह खबर बताती है कि “जनसंख्या वृद्धि रोकने के लिए केंद्र सरकार देश की मांओं को बांझ बनाने की दवा चुभो रही है. राष्ट्रधर्मी मोदी सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ मिल कर महिलाओं में वह जहर इंजेक्ट कर रहा है जो खूंखार यौन अपराधियों को ‘केमिकल कैस्ट्रेशन’ की सजा के तहत ठोका जाता है. बलात्कारियों और यौन अपराधियों की यौन-ग्रंथि नष्ट करने के लिए दी जाने वाली दवा ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर महिलाओं में अनिवार्य रूप से इंजेक्ट की जा रही है, ताकि देश की जनसंख्या कम की जा सके.”

अब यह शंका पैदा होने लगी है कि क्या “आधार” के जरिए चिन्हित करके जनसंख्या सफाए का अभियान तो नहीं चलाया जा रहा है?

इस खबर को प्रभात रंजन दीन ने अपने ब्लॉग पर चस्पा किया है। हम पूरी ख़बर वहीं से साभार कॉपी कर रहे हैं। आप भी पढ़ें पूरी खबर

मोदी सरकार का खतरनाक नसबंदी अभियान

जनसंख्या वृद्धि रोकने के लिए केंद्र सरकार देश की मांओं को बांझ बनाने की दवा चुभो रही है. राष्ट्रधर्मी मोदी सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ मिल कर महिलाओं में वह जहर इंजेक्ट कर रहा है जो खूंखार यौन अपराधियों को ‘केमिकल कैस्ट्रेशन’ की सजा के तहत ठोका जाता है. बलात्कारियों और यौन अपराधियों की यौन-ग्रंथी नष्ट करने के लिए दी जाने वाली दवा ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर महिलाओं में अनिवार्य रूप से इंजेक्ट की जा रही है, ताकि देश की जनसंख्या कम की जा सके. यह ‘मिशन परिवार विनाश’ अभियान है जो विदेशी कुचक्र और धन के कंधे पर चढ़ कर भारत के सात राज्यों के 145 जिलों में दाखिल हो चुका है. इनमें उत्तर प्रदेश के 57 जिले शामिल हैं.

मोदी सरकार के मिशन परिवार विनाशकार्यक्रम के लिए भाजपा शासित सात राज्य चुने गए हैं, जिससे धन और षड़यंत्र का खेल निर्बाध रूप से खेला जा सके.

उत्तर प्रदेश समेत बिहार, झारखंड, असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के 145 जिलों के जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए महिलाओं को ‘डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एक्सीटेट’ (डीएमपीए) इंजेक्शन अनिवार्य रूप से दिया जा रहा है. यही दवा कई देशों में खूंखार यौन अपराधियों की यौन-ग्रंथी नष्ट करने के लिए सजा के बतौर इंजेक्ट की जाती है.

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अधिक जनसंख्या वाले सात भाजपा शासित राज्यों के अधिक से अधिक जिलों में ‘मिशन परिवार विनाश’ का धंधा फैलाने के लिए जेपी नड्डा के नेतृत्व वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने आधिकारिक आंकड़ों का सुनियोजित ‘फ्रॉड’ किया.

आंकड़ों का फर्जीवाड़ा करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का वर्ष 2010-11 का पुराना डाटा उठा लिया और नेशनल टोटल फर्टिलिटी रेट 3.8 दिखा कर अधिक से अधिक जिलों को अपनी चपेट में लेने का कुचक्र रचा.

केंद्रीय सत्ता के इस नियोजित ‘फ्रॉड’ में यूपी का फर्टिलिटी रेट 5 दिखाया गया और इस आधार पर यूपी के 57 जिलों में धंधा फैला लिया गया. राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) का ताजा आंकड़ा 2015-16 का है, जो यह बताता है कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट घट कर 2.1 पर आ चुका है.

ताजा आंकड़े के मुताबिक उत्तर प्रदेश का फर्टिलिटी रेट 2.7 पर आ गया है. अगर स्वास्थ्य मंत्रालय इस अद्यतन (करेंट) आंकड़े को आधार बनाता तो इंजेक्शन का कुचक्र बहुत कम जिलों में फैल पाता. लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने जानबूझ कर पुराने आंकड़े (एनएफएचएस-3) को आधार बनाया और अधिकाधिक जिलों का चयन कर लिया.

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ताजा आंकड़ों के आधार पर मिशन परिवार विकास का दायरा कम जिलों में ही केंद्रित होता, लेकिन अधिक स्थानों पर घुसने के लिए सरकार और गेट्स फाउंडेशन ने बढ़ा हुआ टीएफआर दिखा कर देशभर के 145 जिलों और यूपी के 57 जिलों में घुसपैठ बना ली.

सुनियोजित फर्जीवाड़े की जमीन तैयार कर मांओं में जहर निरूपित करने और देश को बांझ बनाने का धंधा चल रहा है. यौन अपराधियों को सजा के बतौर दिया जाने वाला इंजेक्शन डीएमपीए सात राज्यों के 145 जिला अस्पतालों तक पहुंच चुका है और बड़ी तेजी से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने वाला है. अभी थोड़ा समय बचा है, जनता चाहे तो इसे समय रहते रोक सकती है. जिला, सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और मददगार विभागों और संस्थाओं को बाकायदा यह टार्गेट दिया गया है कि वे अधिकाधिक संख्या में महिलाओं में डीएमपीए दवा इंजेक्ट करें.

‘अंतरा’ के नाम से दिया जाने वाला इंजेक्शन ‘डिपो मेडरॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एक्सीटेट’ (डीएमपीए) महिलाओं को भीषण रोग की सुरंग में धकेल रहा है. इस दवा के इस्तेमाल के कुछ ही दिनों बाद महिलाएं फिर मां बनने लायक नहीं रह जातीं. अगर बनती भी हैं तो बच्चे इतने कमजोर होते हैं कि शीघ्र मौत का शिकार हो जाते हैं, जो बच जाते हैं वे विकलांग और पंगु होकर रह जाते हैं. विश्व के कई देशों में खतरनाक यौन अपराधियों की यौन ग्रंथि को रासायनिक विधि से नष्ट करने (केमिकल कैस्ट्रेशन) के लिए डेपो-प्रोवेरा (डीएमपीए) इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता रहा है. फार्माकोलॉजी विशेषज्ञों का कहना है कि डीएमपीए के इस्तेमाल से स्थायी तौर पर शारीरिक परिवर्तन हो जाता है और हड्डियां गलने लगती हैं. पुरुषों में इसका इस्तेमाल करने से उन्हें हृदयाघात और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा रहता है. पुरुषों की छाती महिलाओं की तरह फूलने लगती है. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का शारीरिक विन्यास विद्रूप हो जाता है, हड्डी के घनत्व (बोन-मास) में गलन और संकुचन होने लगता है, होठ का रंग बदलने लगता है, बाल झड़ने लगते हैं और मांसपेशियों का घनत्व भी गलने लगता है.

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डीएमपीए इंजेक्शन ऑस्टियोपोरोसिस और स्तन कैंसर होने में योगदान देता है और इसके इस्तेमाल से कालांतर में गर्भधारण करना मुश्किल हो जाता है. यह एचआईवी के संक्रमण का आसान मददगार बन जाता है.

चिकित्सा विशेषज्ञ कहते हैं कि डीएमपीए के मामले में स्थिति अत्यंत जटिल है. विडंबना है कि देश की मांओं में डीएमपीए दवा इंजेक्ट करने के लिए सरकार प्रायोजित ‘फ्रॉड’ तो हुआ, लेकिन इस खतरनाक दवा के कारण महिलाओं में होने वाले ऑस्टियोपोरोसिस और स्तन कैंसर जैसे तमाम जानलेवा रोगों को लेकर कोई सरकार प्रायोजित शोध नहीं हुआ.

डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल करने के एक वर्ष के अंदर 55 प्रतिशत महिलाओं के मासिक धर्म में अप्रत्याशित बदलाव देखा गया है और दो वर्ष के अंदर इस अप्रत्याशित घातक बदलाव ने 68 प्रतिशत महिलाओं को अपने घेरे में ले लिया. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में एचआईवी और यौन संक्रमण (क्लैमाइडिया इन्फेक्शन) का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है. डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं बाद में जब गर्भधारण करना चाहती हैं तब पैदा होने वाला उनका बच्चा अत्यंत कम वजन का होता है और अधिकतर मामलों में ऐसे बच्चों की साल भर के अंदर मौत हो जाती है.

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दवा का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के कालांतर में गर्भधारण करने के बाद होने वाले बच्चों के यौन संक्रमित होने का खतरा अत्यधिक रहता है. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के मस्तिष्क तंत्र पर भी बुरा असर पड़ता है.

इस दवा से ब्रेस्ट कैंसर के अलावा सर्वाइकल (रीढ़ की हड्डी) का कैंसर होने का भी बड़ा खतरा रहता है.

वर्ष 2006 का एक अध्ययन बताता है कि दवा के दो साल के प्रयोग से ऑस्टियोपोरोसिस होने की संभावना प्रबल हो जाती है.

वर्ष 2012 के एक अध्ययन में यह पता चला कि 12 महीने या उससे अधिक समय तक डीएमपीए के उपयोग से आक्रामक स्तन कैंसर होने के कई केस सामने आए.

डीएमपीए इंजेक्ट करने के पहले सम्बन्धित महिला को आगाह (कॉशन) करना जरूरी होता है. साथ ही डॉक्टर का यह दायित्व भी होता है कि वह इंजेक्शन लेने वाली महिला को डीएमपीए से होने वाले नुकसान के बारे में पहले ही बता दे. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है.

‘अंतरा’ के पैकेट्स पर भी हिदायत या जोखिम की चर्चा नहीं है, यहां तक कि दवा निर्माता कंपनी का नाम भी दर्ज नहीं है. सामान्य तौर पर बच्चों को दिए जाने वाले टीके में भी चार हिदायतों के साथ टीका लगाया जाता है, लेकिन डिम्पा इंजेक्शन लगाने के पहले कोई हिदायत नहीं दी जा रही है. दिहाड़ी मजदूर मुकेशचंद्र की पत्नी का नाम महज एक उदाहरण के बतौर पेश किया जा रहा है, जिसे डिम्पा इंजेक्शन लगाया गया और उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. इंजेक्शन के पहले मुकेश की पत्नी पूरी तरह से स्वस्थ थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद हालत उनकी बिगड़ने लगी. 20 दिन में ही इतना रक्तस्राव हुआ कि एक निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. डिम्पा इंजेक्शन लगाने वालों का कुछ पता नहीं चला. महिला की हालत गंभीर हुई तो महिला के पहले से ही बीमार होने का तोहमत मढ़ दिया गया. मुकेश की पत्नी की तरह के दर्जनों उदाहरण सामने आ चुके हैं, जो इंजेक्शन का नतीजा अपने शरीर और अपनी सीमित आर्थिक क्षमता पर भुगत रहे हैं. डीएमपीए इंजेक्शन महिलाओं को रोगग्रस्त कर भावी नस्लों को खराब करने की साजिश साबित हो रहा है.

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केंद्र सरकार का यह अभियान देश के निम्न वर्गीय, निम्न मध्यम वर्गीय ग्रामीण और गांव आधारित अशिक्षित, अर्ध-शिक्षित कस्बाई आबादी को टार्गेट कर रहा है. जिला स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए ‘अंतरा’ के नाम से डीएमपीए दवा का इंजेक्शन महिलाओं में ठोका जा रहा है. जिला स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक कौन सी महिलाएं जाती हैं और वे किस वर्ग से आती हैं, इसके बारे में सबको पता है.

स्वास्थ्य केंद्रों को अधिकाधिक इंजेक्शन लगाने का लक्ष्य दिया गया है. इन स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात डॉक्टरों को यह भी नहीं कहा गया है कि इंजेक्शन देने के पहले वे सम्बन्धित महिला का हारमोनल-असेसमेंट करें उसे डीएमपीए इंजेक्शन के खतरों के प्रति आगाह करें. इंजेक्शन के स्टरलाइजेशन और उसके रख-रखाव को लेकर कोई हिदायत नहीं है. यहां तक कि महिलाओं को खुद ही इंजेक्शन ले लेने की सलाह दी जा रही है. इंजेक्शन देने के पहले सम्बद्ध महिला से सहमति लेने की औपचारिकता केवल कागज पर पूरी की जा रही है. महिलाओं से बिना पूछे धड़ल्ले से इंजेक्शन ठोका जा रहा है. जिस वर्ग से महिलाएं आती हैं, उनकी जागरूकता का स्तर उन्हें इस काबिल ही नहीं बनाता कि वे लगने वाले इंजेक्शन के खतरों और जोखिम के बारे में कुछ जान पाएं.

बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, दवा बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘फाइज़र’ और चिल्ड्रेन्स इन्वेस्टमेंट फंड फाउंडेशन के साथ मिल कर कई गरीब देशों में डीएमपीए को ही ‘सायाना-प्रेस’ नाम से बेच रहा है.

डीएमपीए इंजेक्शन सिरिंज के जरिए दिया जाता है जबकि ‘सायाना-प्रेस’ के पाउच में सुई लगी होती है. सुई को शरीर में चुभोकर पाउच का सिरा दबा देने से दवा शरीर के अंदर इंजेक्ट हो जाती है.

स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि भारत में भी ‘सायाना-प्रेस’ को सीधे महिलाओं को देने की तैयारी चल रही है.

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डीएमपीए का इस्तेमाल 1993-94 में कुछ खास प्राइवेट सेक्टर में हो रहा था. कई सामाजिक संस्थाएं इस इंजेक्शन के इस्तेमाल पर बैन लगाने की सुप्रीमकोर्ट से मांग कर रही थीं. 1995 में ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड (डीटीएबी) और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑरगेनाइजेशन ने खास तौर पर राष्ट्रीय परिवार नियोजन अभियान में डीएमपीए के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था. बोर्ड ने कहा था कि विशेष स्थिति में यह इंजेक्शन उसी महिला को लगाया जाएगा, जो इसके खतरों और जोखिम के बारे में जानकारी के साथ बाकायदा सूचित रहेंगी. वर्ष 2001 में कई दवाएं प्रतिबंधित हुई, लेकिन डीएमपीए को प्रमोट करने वाली लॉबी इतनी सशक्त थी कि वह बैन नहीं हुई, बस उसे प्राइवेट सेक्टर में सीमित इस्तेमाल की मंजूरी मिली, इस हिदायत के साथ कि इंजेक्शन का इस्तेमाल उन्हीं महिलाओं पर किया जाएगा जिनकी पहले काउंसलिंग होगी और उन्हें खतरों के बारे में आगाह कर उनकी औपचारिक सहमति ली जाएगी.

डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल को लेकर हो रही कानूनी और व्यापारिक खींचतान में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के कूद पड़ने से डीएमपीए लॉबी मजबूत हो गई.

फाउंडेशन ने पहले तो वर्ष 2012 में ब्रिटिश सरकार को साधा और फिर विश्व के विकासशील और गरीब देशों में जनसंख्या नियंत्रण में सहयोग देने के बहाने अपना रास्ता साफ कर लिया. फाउंडेशन ने मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को साधा और स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘सधते’ हुए परिवार कल्याण विभाग के जरिए ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड (डीटीएबी) के पास प्रस्ताव भिजवाया कि डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल पर लगी पाबंदी हटाई जाए. डीटीएबी ने उस समय इस प्रस्ताव को टाल दिया और कहा कि इंजेक्शन का कुप्रभाव और गहरा गया है. इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं पर ओस्टिपोयोरोटिक-कुप्रभाव भीषण पड़ रहा है. लिहाजा, डीटीएबी ने परिवार कल्याण विभाग को यह सलाह दी कि डीएमपीए इंजेक्शन के इस्तेमाल के बारे में देश के नामी स्त्री रोग विशेषज्ञों (गायनाकोलॉजिस्ट) से राय ली जाए और इसकी गहन पड़ताल कराई जाए. डीटीएबी ने अमेरिका के फूड और ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा डीएमपीए को ‘ब्लैक-बॉक्स’ में रखे जाने का हवाला भी दिया. लेकिन लोकतांत्रिक मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया, उल्टा चारों तरफ से दबाव बढ़ा दिया गया और सम्बद्ध महकमों पर सरकार का घेरा कस गया.

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मंत्रालय के निर्देश पर परिवार कल्याण विभाग ने 24 जुलाई 2015 को विशेषज्ञों का सम्मेलन बुलाया और इस मसले पर विशेषज्ञों से सलाह-सुझाव लेने का प्रायोजित-प्रहसन खेला. इस सम्मेलन में उन संस्थाओं, विशेषज्ञों और समाजसेवियों को बुलाया ही नहीं गया, जो डीएमपीए जैसी खतरनाक दवा के इस्तेमाल पर लगातार विरोध दर्ज कराते रहे और कानूनी लड़ते रहे हैं. एक हजार से अधिक संगठनों की साझा संस्था जन स्वास्थ्य अभियान, सहेली, सामा जैसी तमाम संस्थाओं को इस सम्मेलन में प्रवेश नहीं करने दिया गया.

इस सम्मेलन ने यह तय भी कर लिया कि प्राइवेट सेक्टर में डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल पहले से हो रहा है, इसलिए इसकी अलग से जांच कराने की कोई जरूरत नहीं है और अब इसे सार्वजनिक क्षेत्र में भी आजमाना चाहिए.

दिलचस्प मोड़ यह आया कि अब तक विरोध दर्ज करते आ रहे ड्रग्स टेक्निकल एडवाइज़री बोर्ड ने सामुदायिक स्वास्थ्य प्रणाली (पब्लिक हेल्थ सिस्टम) में डीएमपीए इंजेक्शन का इस्तेमाल किए जाने की 18 अगस्त 2015 को मंजूरी दे दी. इस तरह मोदी सरकार ने देश की मांओं को बांझ बनाने वाली और भावी नस्ल को पंगु और विकलांग पैदा करने वाली दवा के अराजक इस्तेमाल की भूमिका मजबूत कर दी.

डीएमपीए जैसी खतरनाक दवा के इस्तेमाल का विरोध करने वाले लोगों का मुंह बंद करा दिया गया और मीडिया के मुंह पर ‘ढक्कन’ पहना दिया गया, ताकि कोई शोर न मचे, कोई वितंडा न खड़ा हो.

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मोदी सरकार के ताकतवर और हठी स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने जुलाई 2017 में ‘मिशन परिवार विकास’ के नाम पर ‘मिशन परिवार विनाश’ अभियान की शुरुआत कर दी.

नड्डा ने खुलेआम कहा कि इसके जरिए वे 2025 तक देश की जनसंख्या को काबू में ले आएंगे. कैसे काबू में लाएंगे, अब तक तो आप इसे समझ ही चुके होंगे.

नड्डा ने यह भी दावा किया था कि इस परियोजना की पहल उन्होंने ही की है. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव सीके मिश्रा ने इस परियोजना के पक्ष में लंदन से अपना संदेश दिया. इस पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की सह अध्यक्ष मेलिंडा गेट्स ने कहा कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए यह काम किया जा रहा है.

मिशन परिवार विकास लॉन्च करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने दावा किया कि इस अभियान के जरिए वर्ष 2025 तक टोटल फर्टिलिटी रेट को 2.1 पर ले आया जाएगा. जबकि सच्चाई यह है कि देश का टोटल फर्टिलिटी रेट 1015-16 के सर्वेक्षण में ही 2.1 दर्ज किया जा चुका है.

स्पष्ट है कि आधिकारिक आंकड़ों के फर्जीवाड़े में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा की सीधी मिलीभगत है.

बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के फंड पर चलने वाले इस अभियान की मॉनिटरिंग गेट्स फाउंडेशन का इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट कर रहा है.

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इस सिलसिले में बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व अन्य सम्बद्ध राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लगातार सम्पर्क में हैं. उनकी सौहार्द मुलाकातें भी लगातार हो रही हैं.

मिशन की फंडिंग का ब्यौरा क्या है, मिशन के ऑपरेशन का खर्च कहां से आ रहा है, दवा कहां से आ रही है, इसकी कीमत क्या है, इस पर रहस्य बना कर रखा जा रहा है, कोई पारदर्शिता नहीं है.

बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के आगे-पीछे सरकारें नाच रही हैं. फाउंडेशन के आगे विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था भी नतमस्तक रहती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन को फाउंडेशन ने 40 अरब डॉलर का फंड दे रखा है. इसके अलावा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन विश्व स्वास्थ्य संगठन (वर्ल्ड हेल्थ ऑरगेनाइजेशन) को हर साल तीन अरब डॉलर देता है, जो संगठन के सालाना बजट का 10 प्रतिशत होता है. पूरी दुनिया के स्वास्थ्य-अर्थशास्त्र पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और उसके ‘सिंडिकेट’ का बोलबाला है, फिर मोदी सरकार, योगी सरकार, नीतीश सरकार, रघुबर सरकार, सिंधिया सरकार, रमन सरकार, शिवराज सरकार और सोनोवाल सरकार क्या बला है..!

जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर किया जा रहा है महिलाओं का केमिकल-कैस्ट्रेशन

भारत में निर्भया कांड के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने यौन अपराधियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने की तैयारी की थी, लेकिन फिर यह ठंडे बस्ते में चला गया. कांग्रेस ने यह प्रस्ताव न्यायमूर्ति जेएस वर्मा आयोग को सौंपने का फैसला किया था, लेकिन बाद में इसे हटा लिया. जब कांग्रेस ने वर्मा आयोग को अपने सुझाव सौंपे तब उसमें केमिकल कैस्ट्रेशन का प्रस्ताव शामिल नहीं था. कांग्रेस सरकार ने बलात्कारियों को 30 साल तक की सजा देने, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने और आयु सीमा घटाकर जुवेनाइल एक्ट को नए सिरे पारिभाषित करने की सिफारिश की थी. कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और तत्कालीन मंत्री रेणुका चौधरी ने बलात्कारियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने की मांग की थी. बलात्कारियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने के कांग्रेसी विचार को भाजपा सरकार ने ठीक विपरीत तरीके से देश में लागू कर दिया. भाजपा सरकार जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर देश की महिलाओं का केमिकल कैस्ट्रेशन करा रही है.

भाजपा सरकार का सोचा-समझा अमानुषिक कृत्य और सोची-समझी चुप्पी

संसार के कई देशों में खूंखार यौन अपराधियों को भी केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने का विरोध हो रहा है, लेकिन भारत सरकार केमिकल कैस्ट्रेशन में इस्तेमाल आने वाली दवा भारतवर्ष की आम महिलाओं में धड़ल्ले से इंजेक्ट करने का अमानुषिक कृत्य कर रही है. इस घनघोर सामाजिक अपराध के खिलाफ पूरा देश चुप्पी साधे है. न सामाजिक संगठन सड़क पर आ रहे हैं और न बुद्धिजीवी और मानवाधिकारकर्मी. धुआं और सड़क जाम पर इजलास सजा कर बैठ जाने वाली अदालतें भी इतने गंभीर मामले में चुप हैं.

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आप भी यह जानकारी हासिल करते चलें कि वर्ष 1966 में ही अमेरिका में एक कुख्यात यौन अपराधी पर मेड्रॉक्सी प्रोजेस्टेरोन एक्सीटेट दवा का केमिकल कैस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल किया गया था. इस दवा का आधार-तत्व (बेस इन्ग्रेडिएंट) वही है जो डीएमपीए में है, जिसे भारत की महिलाओं में ठोका जा रहा है. इस दवा के इस्तेमाल का विरोध करते हुए अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसे खारिज कर दिया था. कैलिफोर्निया पेनल कोड (धारा 365) केवल बाल-यौन अपराधियों को डीएमपीए के जरिए केमिकल कैस्ट्रेशन की इजाजत देता है. फ्लोरिडा में बाल-यौन अपराध दोहराने वाले अपराधी के लिए इस सजा का प्रावधान है. जॉर्जिया, लूसियाना, मोंटाना, टेक्सस और विसकॉन्सिन में भी यौन अपराध दोहराने वाले अपराधी को डीएमपीए के जरिए केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने का कानूनी प्रावधान है. अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन शरीर पर नकारात्मक और घातक असर डालने वाली डीएमपीए दवा का यौन-अपराधियों पर भी इस्तेमाल किए जाने का विरोध कर रहा है. अमेरिका के अलावा इंगलैंड, जर्मनी और इजरायल जैसे देशों में भी जीर्ण (क्रॉनिक) यौन-अपराधियों को केमिकल कैस्ट्रेशन की सजा देने का प्रावधान है. भारत सरकार ठीक इसका उल्टा कर रही है.

नियुक्ति देकर आईएएस अफसरों को खरीद लेता है गेट्स फाउंडेशन

prabhat ranjan deen
prabhat ranjan deen

वंश-नाश के इंजेक्शन अभियान को यूपी में मॉनिटर कर रहा है बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट. विचित्र किंतु सत्य यह है कि गेट्स फाउंडेशन ने एक आईएएस अफसर को इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट का प्रमुख बना रखा है. उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अफसर विकास गोठवाल इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट के प्रमुख हैं. सरकारी तंत्र में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की गहरी पैठ का यह नायाब उदाहरण है. गेट्स फाउंडेशन से प्रभावित रहे तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आईएएस अफसर विकास गोठवाल को बाकायदा छुट्टी देकर इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट ज्वाइन करने की मंजूरी दी थी. गोठवाल का कार्यकाल वर्ष 14-15-16 के लिए था. फिर योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और उन्होंने गेट्स फाउंडेशन के त्वरित-प्रभाव में गोठवाल को अगले तीन साल के लिए भी इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट में बने रहने की मंजूरी दे दी.

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अब विकास गोठवाल इंडिया हेल्थ एक्शन ट्रस्ट के प्रमुख के पद पर 2020 तक बने रहेंगे. फिलहाल वे लंदन में रहकर शैक्षणिक-अवकाश का आनंद ले रहे हैं और वहीं से ट्रस्ट के यूपी-ऑपरेशंस को मॉनिटर भी कर रहे हैं. पूंजी संस्थाओं ने सत्ता के राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र दोनों को अपनी मुट्ठी में कर रखा है. शीर्ष सत्ता और उसके तंत्र तक धनपशु संस्था के आधिपत्य की ये कुछ अकाट्य बानगियां आप देख रहे हैं.

First published on January 5,2018 11:20

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