New Delhi: All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (AIMIM) MP Asaduddin Owaisi at Parliament in New Delhi, on Dec 20, 2018. (Photo: IANS)

अयोध्या फ़ैसले के बाद मुसलमानों में पार्टी और लीडरशिप को लेकर मंथन

अयोध्या फ़ैसले के बाद मुसलमानों में पार्टी और लीडरशिप को लेकर मंथन

राजनीति के जानकर मानते हैं कि ऐसा साफ़ नज़र आ रहा है कि सभी राजनीतिक पार्टियों ने कहीं न कहीं बहुसंख्यकवाद के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है (All political parties have surrendered to majoritarianism

वामपंथी पार्टियों को छोड़कर किसी राजनीतिक दल ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपियों को सज़ा देने का ज़िक्र तक नहीं किया है। Except for the left parties, no political party has even mentioned punishing the accused of the Babri Masjid demolition.

अयोध्या विवाद के फ़ैसले पर प्रतिक्रिया (Reaction to Ayodhya dispute verdict) देते समय वामपंथी पार्टियों को छोड़कर किसी राजनीतिक दल ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपियों को सज़ा (Accused of Babri Masjid demolition punished) देने का ज़िक्र तक नहीं किया। मुस्लिम समाज का मानना है कि इस फ़ैसले का प्रभाव भविष्य की राजनीति पर ज़रूर पड़ेगा। ऐसे में देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समाज इस बात पर विचार कर रहा है कि वह किस दिशा में जाए ताकि वह अपने अधिकारों की लड़ाई मज़बूती से लड़ सके जबकि सांप्रदायिक ताकतें सत्ता के शीर्ष पर हैं।

Muslim votes have an important role in elections in many states of India.

भारत के कई प्रदेशों में चुनाव में मुस्लिम वोटों की अहम भूमिका होती है। उत्तर प्रदेश में क़रीब 20 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में लगभग 28 प्रतिशत और बिहार की क़रीब 17 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस समेत कई छोटे-बड़े दलों की नज़र मुस्लिम वोटों पर रहती है।

देश की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में कांग्रेस लगभग 29 साल से सत्ता दूर है। कहा जाता है कि जब से मुस्लिम और दलित कांग्रेस से दूर हुए तब से उसके हाथ में सत्ता नहीं आई है। मुस्लिम वोट 2007 में एकजुट होकर बहुजन समाज पार्टी को मिला तो प्रदेश में मायावती की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी और 2012 में मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी के पक्ष में गया तो अखिलेश यादव ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया।

सिर्फ़ उत्तर प्रदेश में ही नहीं बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की राजनीति चमकने के पीछे भी मुस्लिम वोटों का समर्थन था। बंगाल में मुसलमान वोटर समय समय पर वामपंथी दलों और तृणमूल कांग्रेस के साथ दिखाई दिया। देश के दूसरे प्रदेशों में मुसलमान सांप्रदायिक दलों के ख़िलाफ़ या तो कांग्रेस या किसी दूसरे क्षेत्रीय दल के साथ रहते आए हैं।

इस तरह समय समय पर ख़ुद को सेक्युलर दल कहने वालों ने मुस्लिम वोटों की मदद से सरकार बनाईं है। लेकिन हाल में अयोध्या विवाद के फ़ैसले के बाद, 6 दिसंबर 1992 के अभियुक्तों को सज़ा देने की बात वामपंथी दलों के अलावा किसी ने नहीं उठाई। इसके अलावा केवल एआईएमआइएम के असदुद्दीन ओवैसी अकेले ऐसे नेता हैं, जो आदलत के फैसले के ख़िलाफ़ खुलकर बोल रहे हैं।

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सभी ने अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया है। लेकिन बाबरी मस्जिद के विध्वंस के अभियुक्तों को सज़ा देने की बात तक नहीं की। हर विषय पर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाली तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और  पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर एक शब्द भी नहीं बोला है।

सिर्फ़ वामपंथी दलों ने मुखर हो कर कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में आरोपी नेताओ जिनमें लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे बड़े नाम शामिल हैं, को तुरंत सज़ा दी जाए।

सभी का मानना है कि भाजपा अभी इस मामले में भले ही खुद को बहुत संयमित दिखा रही है लेकिन भाजपा ख़ामोशी के साथ भविष्य में इस फ़ैसले का राजनीतिक लाभ ज़रूर लेगी।

किसके साथ जाएं?

अब मुस्लिम समाज इस बात पर विचार कर रहा है कि भविष्य में वह किस पार्टी को समर्थन करे जिससे उनके अधिकार की बात को मज़बूती से रखा जा सके।

लखनऊ यूनिवर्सिटी के ऐन्थ्रपॉलजी के पूर्व विभागाध्यक्ष और विचारक प्रोफ़ेसर नदीम हसनैन (Professor Nadeem Hasnain, former Head of Department of Anthropology, Lucknow University) कहते हैं कि अब मुसलमानों को ऐसा विकल्प चुनना चाहिए जो उनके अधिकारों की पूरे देश में रक्षा कर सके। वह मानते हैं कि क्षेत्रीय दल ऐसे माहौल में जब साम्प्रदायिक ताक़तें सत्ता में हैं, मुसलमानो के अधिकारों की लड़ाई लड़ने में सक्षम नहीं है।

असद रिज़वी

आप तक यह लेख न्यूज़क्लिक और पीपी कनेक्ट मीडिया के सहयोग से पहुँचाया जा रहा है.

Churning over party and leadership among Muslims after Ayodhya verdict

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