दीनदयाल उपाध्याय : गोलवलकरी सांचे में ढला व्यक्तित्व !

सुभाष गाताडे वर्ष 1916 में जनमे दीनदयाल / मृत्यु फरवरी 1968/ ने स्नातक की अपनी शिक्षा सनातन धर्म कालेज, कानपुर से की और इलाहाबाद से एल टी किया। कालेज के दिनों में ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध सुंदर सिंह भंडारी के करीबी दोस्त बने। उन्होंने 1937 में संघ के साथ जुड़ने का निर्णय …
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सुभाष गाताडे

वर्ष 1916 में जनमे दीनदयाल / मृत्यु फरवरी 1968/ ने स्नातक की अपनी शिक्षा सनातन धर्म कालेज, कानपुर से की और इलाहाबाद से एल टी किया। कालेज के दिनों में ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध सुंदर सिंह भंडारी के करीबी दोस्त बने। उन्होंने 1937 में संघ के साथ जुड़ने का निर्णय लिया और 1942 में प्रचारक बनने का अर्थात संघ का पूरा वक्ती कार्यकर्ता बनने का निर्णय लिया। उनके जीवनीकार के मुताबिक

जब वह कानपुर से स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे तब दीनदयालजी अपने वर्गमित्र बालुजी महाशब्दे के माध्यम से संघ के सम्पर्क में आए। वहीं उनकी मुलाकात संघ के संस्थापक-सदस्य डा हेडगेवार से हुई। बाबासाहेब आपटे और दादाराव परमार्थ के साथ हेडगेवार छात्रावास में रहते थे। दीनदयालजी ने एक शाखा पर बौद्धिक विमर्श के लिए उन्हें आमंत्रित किया।…..दीनदयालजी 1937 से लेकर 1941 तक छात्र रहे, उसके बाद उन्होंने प्रयाग से बी टी की डिग्री हासिल की, मगर न उन्होंने कोई नौकरी की और न ही उन्होंने शादी की। उन्होंने नागपुर के संघ शिविर में चालीस दिन के गर्मी के कैम्प में उपस्थिति अवश्य दर्ज करायी। 1939 से 1942 के दरमियान उन्होंने संघ का प्रशिक्षण इन गर्मी के शिविरों में हासिल किया।

हालांकि दीनदयालजी इस प्रशिक्षण के शारीरिक मेहनत को अधिक झेल नहीं सके अलबत्ता वह उसके शैक्षिक हिस्से में सक्रिय रहे। इस सम्बन्ध में बाबासाहब आपटे लिखते हैं:

‘‘ पंडित दीनदयालजी ने उनके उत्तरों के कई हिस्सों का पद्यरूप में प्रस्तुत किया। वह महज पद्य करना नहीं था, न ही वह कल्पना की उड़ान थी। उन्होंने उत्तर लिखने में गद्य के बजाय पद्य का माध्यम अपनाया। वह संतुलित और तार्किक था। ..

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद और संघ के शिक्षा विभाग में प्रशिक्षण लेने के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय संघ के पूरावक्त़ी प्रचारक बने और वह जीवन के अन्त तक इस पथ पर बने रहे। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से राजनीति में आए और भारतीय जनसंघ के महासचिव बने और बाद में उसके अध्यक्ष बने। इस तरह उनका समूचा जीवन राजनीतिक विचार प्रक्रिया का मूर्तिमान रूप था।

(http://deendayalupadhyay.org/rss.html )

वर्ष 1942 में वह लखीमपुर जिले के पूरा वक्ती तहसील संगठनकर्ता बनाए गए, और 1945 तक आते आते वह समूचे संयुक्त प्रांत / आज के उत्तर प्रदेश/ के सहप्रांतीय संगठनकर्ता के तौर पर तैनात कर दिए गए। हालांकि वह कालखण्ड भारतीय समाज के लिए जबरदस्त उथल पुथल का था – जहां ब्रिटिशों के खिलाफ उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष अपने उरूज पर था और लोग जेलों में जा रहे थे, लाठी गोलियां संगीनें झेल रहे थे, मगर अपने तमाम सहमना स्वयंसेवकों/प्रचारकों की तरह दीनदयाल उपाध्याय भी उससे दूर रहे और अपने आप को संगठन निर्माण पर केन्द्रित किए रहे। संगठन के वफादार सिपाही होने के नाते वह संघ सुप्रीमो गोलवलकर द्वारा तय की राजनीतिक लाइन का ही अनुगमन कर रहे थे। गोलवलकर की संकलित रचनाओं में इसका स्पष्ट उल्लेख है जब वह बताते हैं:

‘1942 में कइयों के दिलों में कुछ करने की जबरदस्त तमन्ना थी। उन दिनों में भी संघ का दैनंदिन कार्य चलता रहा और संघ ने तय किया था कि वह प्रत्यक्ष कुछ नहीं करेगा, हालांकि संघ के स्वयंसेवकों में दिलो दिमाग में उथल पुथल जारी रही। हमारे भी कई स्वयंसेवक कहने लगे कि संघ निष्किय लोगों का संगठन है और उसकी बातें निरूपयोगी होती हैं। वह भी काफी निराश हुए।’ [M.S. Golwalkar, Shri Guruji Samagra Darshan (Collected Works of Golwalkar in Hindi), vol. IV, Bhartiya Vichar Sadhna, Nagpur, nd, 40]

अगर हम 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन पर अलग अलग स्थानों पर दिए विवरणों पर निगाह डालें तो उस भारी उथलपुथल की तीव्रता दिखाई देती है। मालूम हो कि 9 अगस्त 1942 से 21 सितम्बर 1942 के बीच भारत छोड़ो आन्दोलन में

550 डाकघरों पर, 250 रेलवे स्टेशनों पर हमले हुए, तमाम रेल लाईनों को नुकसान पहुंचाया गया, 70 पुलिस स्टेशन तबाह किए गए और 85 से अधिक सरकारी इमारतों को नष्ट किया गया। 2,500 से अधिक स्थानों पर टेलिग्राफ की लाइनों को काट दिया गया। सबसे अधिक हिंसा बिहार में हुई। व्यवस्था फिर कायम करने के लिए भारत सरकार को 57 बटालियन ब्रिटिश सेना तैनात करनी पड़ी।

(John F. Riddick, The History of British India: A Chronology (2006) p 115)

‘करो या मरो’ के नारे के साथ उठे इस आन्दोलन को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया, यहां तक जनविद्रोह को कुचलने के लिए कई स्थानों पर ब्रिटिश सेना को हेलिकॉप्टरों से भी गोलीचालन करना पड़ा। भारत छोड़ो आन्दोलन के इन झंझावाती दिनों में हजारों लोग मारे गए। कई स्थानों पर हड़तालें हुई। महाराष्ट्र का सातारा या उत्तर प्रदेश के बलिया जैसे कई स्थानों पर ब्रिटिश शासन को समाप्त घोषित कर ‘‘समानान्तर सरकारें’’ कायम की गयीं। जनता का दमन करने के लिए कई स्थानों पर ब्रिटिश सेना ने जनता को सरेआम चाबूकों से पीटा। /विस्तार से देखें:  [ D, Fisher D; Read A (1998). The Proudest Day: India’s Long Road to Independence. WW Norton. p. 330] /

सभी जानेमाने राष्ट्रीय नेताओं को या तो गिरफ्तार कर लिया गया या उन्हें भूमिगत होकर अपने संघर्ष का संचालन करना पड़ा। गुप्त रेडियो स्टेशनों से वह अपने संदेशों को लोगों तक पहुंचाते रहे। इस उग्र जनान्दोलनों, जनहलचलों से ब्रिटिश इतने आतंकित हुए थे कि उन्होंने एक जंगी जहाज तैयार रखा था, जिसमें गांधी और अन्य कांग्रेसी नेताओं को देश के बाहर ले जाने की योजना बनायी गयी थी। बाद में उन्होंने इस योजना पर अमल नहीं किया क्योंकि उन्हें लगा कि इस कदम से जनविद्रोह अधिक भड़क सकता है।

यह अलग बात है कि इतने बड़े पैमाने पर उठी जनहलचलों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके कार्यकर्ताओं पर कुछ भी असर नहीं था, वह बेहद अनुशासित तरीके से संगठन निर्माण में, शाखा लगाने में और स्वयंसेवकों को बौद्धिक सुनाने में मुब्तिला था। संघ के अग्रणी गोलवलकर जैसे लोगों से लेकर दीनदयाल उपाध्याय जैसे हजारों कार्यकर्ताओं के बीच यही आलम था कि वह आंदोलन के हिसाब से देखें तो पूरी तरह निष्क्रिय थे। संघ के कारिन्दों की यह निष्क्रियता या उनकी तटस्थता ब्रिटिश सरकार की जासूसी एजेंसियों के उन दिनों के रिपोर्टो में भी दिखती है। ऐसी एक रिपोर्ट के मुताबिक

.. संघ ने अपने आप को बेहद सुनियोजित तरीके से कानून के दायरे में रखा है और अगस्त 1942 की घटनाओं के आलोक में उठे संघर्षों में शामिल होने से इन्कार किया हैं । (Andersen, WalterK.&Damle, Shridhar D.The Brotherhood in Saffron: the Rashtriya Swayamsevak Sangh and Hindu Revivalism, Westview Press, 1987, 44.)

बाद में दीनदयाल उपाध्याय ने निम्नलिखित शब्दों में आंदोलन से अपनी दूरी को उचित ठहराते हुए लिखा। न इसमें कोई आत्मालोचना का स्वर था और न ही यह स्वीकारोक्ति की हमारी यह गलती थी बल्कि यह उन तमाम लोगों को अपमानित करना था जिन शहीदों ने अपनी जान कुर्बान की थी, आज़ादी के जिन दीवानों ने अपना सबकुछ उसके लिए कुर्बान किया था।

‘‘हम लोग इस गलत धारणा से अभिभूत थे कि स्वतंत्रता का मतलब महज विदेशी शासन की समाप्ति है। विदेशी हुकूमत के विरोध का मतलब यह कोई जरूरी नहीं कि मात्रभूमि के लिए सच्चा प्यार हो। …स्वतंत्राता के लिए संघर्ष के दरमियान ब्रिटिश शासन की मुखालिफत पर अधिक जोर दिया गया।.. और यही माना जाने लगा कि जिस किसी ने ब्रिटिशों का विरोध किया वही देशभक्त है। उन दिनों ब्रिटिशों के खिलाफ असन्तोष पैदा करने के लिए एक सुनियोजित मुहिम चलायी गयी जिसमें देश की जनता के सामने मौजूद हर समस्या और तकलीफ के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा।

(C. P. Bhishikar, Pandit Deendayal Upadhyaya: Ideology and Perception: Concept of the Rashtra,vol. v, Suruchi, Delhi, 169. )

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