Narendra Modi An important message to the nation

हताश मोदी भाजपा के बुरे दिनों का संकेत देने लगे हैं

प्रसिद्ध मनोविश्लेषक जॉक लकान (French psychoanalyst Jacques Lacan) ने आदमी में हताशा की गति ( Dialectics of Frustration) का एक चार्ट बनाया था जिसमें बताया गया था कि किसी में भी इसका सूत्रपात अपनी शक्ति को गँवाने (castration) की कल्पना से होता है और वही आदमी में हताशा का वास्तविक रूप ले लेती है, हताश आदमी (Desperate man) के मन को बींध कर उससे अस्वाभाविक व्यवहार कराती है।

मोदी-शाह का अभी यही दौर चल रहा है।

अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।
अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

दरअसल, उलट कर देखें तो हताशा के मूल में मर्यादाओं की बड़ी भूमिका होती है जिसे मनोविज्ञान की भाषा में ईडिपस ग्रंथी {ईदिपस ग्रंथि (Oedipus complex) } कहते हैं। सामाजिक शील। मोदी की मुश्किल यह है कि वे जनतंत्र की मर्यादा की बंदिशों में रहना नहीं चाहते, जनतंत्र को कुचल देना चाहते हैं। लेकिन भारत का जनतंत्र उनके लिये लोहे के चने साबित हो रहा है। आज वे लहूलुहान हो चुके हैं। इसीलिये हताश भी हैं।

तीसरे दौर के मतदान के बाद से ही मोदी वैसे तो होश खो चुके हैं, सामने आने वाली किसी भी चीज को खिलौना समझ कर उससे खेलने लगते हैं। लेकिन अब ‘टाइम’ पत्रिका के कवर पेज की तरह की चीज़ों से कैसे खेले ?

मोदी अब दुनिया को अपने बारे में लोगों की धारणा के बारे में बताने लगे हैं कि उन्हें क्या-क्या नहीं कहा जा रहा है। ‘टेलिग्राफ़ ’ ने उनके खुद के बताए नामों के आधार पर उनके एक दसानन स्वरूप को पेश किया है, जिसमें उनके खुद के चेहरे के साथ ही औरंगज़ेब,गद्दाफ़ी, दाऊद इब्राहिम, हिटलर, मुसोलिनी, रावण, भस्मासुर, बंदर और चूहा तक के चेहरे शामिल हैं। शामिल नहीं था बस उनका स्वघोषित ‘चौकीदार’ का चेहरा।

‘टेलिग्राफ’ अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में यह भी जोड़ा कि ये तो उनके सहस्त्र नामों में से बहुत थोड़े से नाम है। उनके अपने चायवाला, चौकीदार, कामदार, घुस कर मारने वाला, आदि के अलावा साँप, छुछुंदर, नाली का कीड़ा, आदि और अनेक प्राणियों के नाम इस सूची में शामिल है। मोदी अपने भाषणों में सौ-सौ बार तो खुद मोदी-मोदी दोहराते हैं। ऊपर से अन्यों के दिये हुए इतने और नाम !

कुरुक्षेत्र की एक सभा में मोदी जब अपने नामों को गिना रहे थे, लगा जैसे महाबली के सहस्त्र नामों के महा-संकीर्तन का राग उन्होंने छेड़ दिया है। चहुँओर आज इस चौकीदार की उसके ‘चोरी’ के गुण के बखान के साथ सचमुच धूम मची हुई है। मोदी ने अपने भाषणों को भी अब अपने ही नामों के कोरे नाम-संकीर्तन का रूप दे कर चारों ओर अजब का ‘चोर-चोर’ वाला उन्माद पैदा कर दिया है !

राहुल ने सही कहा है – मोदी कबड्डी के खेल की तरह कांग्रेस के पाले में पूरी तरह से दबोच लिये गये हैं। अब और पाँच-दस सेकंड में कबड्डी-कबड्डी की उनकी साँस टूटने वाली है।

सचमुच जब से मोदी ने अपने नामों का यह विचित्र खेल शुरू किया, हमें उनमें गहरे तक पैठ रही विक्षिप्तता के लक्षण दिखाई देने लगे थे। हमने उन्हें जुनूनी विक्षिप्तता का शिकार कहा था। वे अपने पर सारी गंदगियों को लाद कर उस कीचड़ में से ‘कमल’ बन कर निकलने की हठ योगियों की शवसाधना में लग गये हैं जो भाजपा के लिये एक अशनि संकेत ही है।

मोदी ने खुद बड़े शान से अपने पर चौकीदार का बिल्ला लगाया था। अब यह बिल्ला उन्हें बुरी तरह से डराने लगा है।तब तो वे इस कीचड़ से कमल पैदा करना चाहते थे। अब हर दिन सिर्फ यह कीचड़ गाढ़ा हो रहा है, कमल कहीं दिखाई नहीं दे रहा !

और मीडिया ?

आपने ब्राह्मण और तीन ठगों की कहानी सुनी होगी जिसमें ठगों ने ब्राह्मण को यह विश्वास दिला दिया कि वह कंधे पर बकरी नहीं, कुत्ता लाद कर जा रहा है। ब्राह्मण ने घबड़ा कर रास्ते में ही बकरी को फेंक दिया और ठगों ने हड़प लिया।

अभी का भारत का मीडिया उन तीन ठगों की भूमिका में ही लगा हुआ है।

भाजपा की जीत के गढ़ यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, आदि से उसके तंबू के उखड़ने के समाचारों के बाद बंगाल, उड़ीसा जैसे प्रदेशों से जहाँ वे अब तक शून्य रहे हैं, भाजपा के नुक़सान की भरपाई की कल्पना करने वाले विश्लेषकों को हम विश्लेषक नहीं, मोदी से डरे हुआ मासूम व्यक्ति भर मानते हैं।

मोदी अपने गढ़ों में क्यों हार रहे हैं, इसे समझने की ताक़त भी वे खो चुके हैं और यह नहीं समझ रहे हैं कि वे कारण एक अखिल भारतीय परिघटना है, चंद राज्यों तक सीमित परिघटना नहीं है।

इसी प्रकार चुनाव आयोग के बारे में कांग्रेस ने बहुत सही सवाल उठाया है कि क्या उसने मोदी-शाह जोड़ी को एंटीसिपेट्री क्लीन चिट दे चुका है ?

बहरहाल, इस चुनावी प्रतियोगिता के अंत के बाद देश की सभी सेकुलर ताक़तों को मिल कर मोदी जैसी भारत-विरोधी सांप्रदायिक ताक़तों को भारत की राजनीति से हमेशा के लिये दूर करने के संकल्प के साथ अपने निर्णय लेने होंगे। यही इस चुनाव का सही मतलब होगा।

Desperated Modi has started showing signs of bad days of BJP

About अरुण माहेश्वरी

अरुण माहेश्वरी, प्रसिद्ध वामपंथी चिंतक हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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