Mahatma Gandhi statue in the Parliament premises. (File Photo: IANS)
Mahatma Gandhi statue in the Parliament premises. (File Photo: IANS)

कारपोरेट राजनीति के बदलाव का गांधीवादी तरीका

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आने पर कई संजीदा साथियों ने गहरी चिंता व्यक्त की कि नरेंद्र मोदी की एक बार फिर जीत संविधान और लोकतंत्र के लिए बहुत बुरा संकेत है. पिछले पांच सालों के दौरान धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील साथियों से यह बात अक्सर सुनने को मिलती है कि हम बहुत बुरे समय से गुजर रहे हैं; संकट बहुत गहरा है; संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन किया जा रहा है; अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है; पूरा देश भगवा फासीवाद से आक्रान्त है; प्रतिरोध की शक्तियां कमजोर हो गयी है … . इन उद्गारों के साथ जनवादी शक्तियों को एकजुट कर संघर्ष तेज करने का आह्वान किया जाता है. जनवादी शक्तियों की एकजुटता और संघर्ष के स्वरूप को लेकर विभिन्न विचारधारात्मक समूहों की अपनी-अपनी मान्यताएं और प्रयास हैं. वे निरंतर चलते रहते हैं. इस सबके बावजूद नरेंद्र मोदी लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ चुनाव जीत गए, तो संकट को थोड़ा और गहराई से समझने की जरूरत है. संकट को सही रूप में समझ कर ही उसके समाधान का रास्ता निकाला जा सकता है

भारतीय जनता पार्टीBharatiya Janata Party, (भाजपा) लोकतंत्र के रास्ते सत्ता में आई है. यूं तो लोकतंत्र संविधान के तीन आधारभूत मूल्यों – समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र – में परिगणित है, लेकिन वह एक प्रणाली और दृष्टि (विज़न) भी है. इस प्रणाली के तहत केंद्र और राज्यों की सरकारों, पंचायतों और नगर निकायों, तरह-तरह के मजदूर-कर्मचारी-अधिकारी संगठनों, किसान संगठनों, छात्र संगठनों, सामाजिक संगठनों, संस्थाओं, न्यासों, राजनीतिक पार्टियों आदि के चुनाव होते हैं. नीतियां एवं कानून बनाने तथा न्याय की प्रक्रिया में लोकतांत्रिक पद्धति अपनाई जाती है. इसीलिए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संस्थाओं समेत राज्य और नागरिक जीवन की समस्त संस्थाओं को लोकतांत्रिक संस्थाएं कहा जाता है. ज़ाहिर है, देश की समूची गतिविधियां लोकतंत्र के तहत लोकतांत्रिक दृष्टि से संचालित होनी चाहिए. समझने की जरूरत यह है कि लोकतंत्र की ताकत पर पलने वाली मौजूदा दौर की कारपोरेट राजनीति ही भारत के संविधान और लोकतंत्र लिए बुरा संकेत है. मोदी की राजनीति देश में चलने वाली कारपोरेट राजनीति की एक उग्र बानगी भर है.

प्रचलित कारपोरेट राजनीति (Corporate politics) भारतीय संविधान की आधारभूत संकल्पना एवं मान्यताओं की कसौटी पर अवैध ठहरती है. कहने की जरूरत नहीं कि इस राजनीति की जगह संविधान सम्मत नई राजनीति की जरूरत है, जिसे लोकतंत्र की ताकत से स्थापित किया जाए. यानी लोकतंत्र की ताकत को एक नई संविधान-सम्मत राजनीति खड़ा करने की दिशा में सक्रिय बनाया जाए. लोकतंत्र को संवैधानिक रूप से अवैध राजनीति का जरिया बनाने वाला राजनीतिक नेतृत्व इस उद्यम के लिए तैयार नहीं होगा. यह एक बड़ी समस्या है. लेकिन इससे बड़ी समस्या यह है कि भारत का बौद्धिक वर्ग– Intellectual class of india, (इंटेलिजेंसिया) अभी भी मौजूदा राजनीति के विकल्प की जरूरत नहीं समझता. बल्कि मौका पड़ने पर वह कारपोरेट राजनीति के बरक्स वैकल्पिक राजनीति के विचार को अपदस्थ करने में गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) के कर्ताओं जैसी तत्परता दिखाता है. लाखों किसानों की आत्महत्याओं, असंख्य मजदूरों की छंटनी, बेरोजगारों की अपार भीड़ के बावजूद देश का एक भी नामचीन विद्वान निर्णायक रूप से यह कहने को तैयार नहीं है कि देश से कारपोरेट राजनीति का खात्मा होना चाहिए.

जिस लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा-विरोधी विपक्ष की हार पर गहरी चिंता जताई गई, और विश्लेषण प्रस्तुत किये गए, वह चुनाव दरअसल विपक्ष की तरफ से लड़ा ही नहीं गया. भाजपा ने 2014 में पूर्ण बहुमत में आने के एक साल के भीतर 2019 के चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी. जबकि राष्ट्रीय स्तर के चुनाव में विपक्ष अंतिम समय तक पूरी तरह बिखरा हुआ और अनिर्णय की स्थिति में बना रहा. सरकार की कारपोरेट-सेवी आर्थिक नीतियों और अर्थव्यवस्था को लेकर किये गए लालबुझक्कड़ फैसलों के परिणामस्वरूप किसानों, मजदूरों, छोटे-मंझोले  व्यापारियों और बेरोजगार नौजवानों में जो स्वाभाविक असंतोष पैदा हुआ था, उसे विपक्ष के ढुलमुलपन और निठल्लेपन ने निरर्थक बना दिया. उन्नीस सौ इक्यानवे में निजीकरण-उदारीकरण की शुरुआत करने वाली कांग्रेस को लगता था कि जैसे निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों से उपजने वाले असंतोष का फायदा उठा कर वाजपेयी की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार बनी, उसके बाद मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार बनी, और मोदी की भाजपा के पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी; उसी तरह मोदी सरकार के बाद कांग्रेस की सरकार बनेगी. कारपोरेट राजनीति की इस कार्य-कारण श्रृंखला में विश्वास के चलते कांग्रेस मोदी सरकार के दो कार्यकालों के लिए भी तैयार थी. लेकिन बिना परिश्रम के तीन राज्यों में सरकार बन जाने पर उसे 2019 में ही सत्ता में लौटने का लालच हो गया

लेकिन मोदी सरकार ने अपना हिंदू-राष्ट्र का आख्यान ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की टेक पर तेज कर कारपोरेट राजनीति की इस कार्य-कारण श्रृंखला को भंग कर दिया. हड़बड़ाई कांग्रेस ने हिंदू-राष्ट्र के रास्ते पर कदम रखा, जिसे निष्फल होना ही था. केवल लोकतंत्र की ताकत के बूते सत्ता में आने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों ने उसी लोकतंत्र की हत्या करके अपनी साख काफी पहले गिरा ली थी. उनमें से कुछ अपने राज्यों में जीतने में कामयाब भले रहे, लेकिन कुल नतीज़ा केंद्र में एक बार फिर भाजपा की पूर्ण बहुमत सरकार के रूप में सामने आया. इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया कि कारपोरेटपरस्त आर्थिक नीतियों से पैदा होने वाले जन-असंतोष की काट हिंदू-राष्ट्र(वाद) है. यह स्वयंसिद्ध है कि इस परिघटना का तात्कालिक और दूरगामी फायदा सबसे ज्यादा भाजपा को मिलता रहेगा. भले ही भगवा फासीवाद के खिलाफ कितने ही हवाई फायर किए जाते रहें

इस रास्ते पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)/भाजपा के तरकश में अभी बहुत तीर बाकी हैं. अयोध्या के बाद काशी और मथुरा की बारी की घोषणा अक्सर सुनने को मिलती है. इनके अलावा अन्य छोटे-मोटे मंदिर-मस्जिद विवाद ढूंढ निकालने में दिक्कत नहीं होगी. अभी औरंगजेब का नाम दिल्ली की सड़क से हटाया गया है, कल को औरंगाबाद स्थित उनका मकबरा हटाने की बात हो सकती है. औरंगजेब के बाद अकबर और उनके बाद किसी अन्य मुस्लिम शासक की बारी आ सकती है. फिलहाल यह दूर की कोड़ी लगती है, लेकिन वाजपेयी के बाद के आरएसएस/भाजपा का जो चेहरा और चरित्र सामने आया है, उसके चलते यह असंभव नहीं होगा. गाय तो है ही – वह सताई भी जाएगी, काटी भी जाएगी, और हिंदू-राष्ट्र के लिए लगातार दुही भी जाएगी. आरएसएस/भाजपा के हिंदू-राष्ट्र का उपभोक्तावादी पूंजीवादी व्यवस्था के साथ पूर्ण मेल बैठ गया है. अगर वैश्विक पूंजीवादी सत्ता-प्रतिष्ठान को भारत में अपने अस्तित्व के लिए वाकई किसी कोने से कोई संकट अनुभव होगा तो वह सीधे अपने तरकश से कुछ तीर चला सकता है. मसलन, भारत को सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता प्रदान करना, ओलंपिक खेल आयोजित करने की अनुमति देना, पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकार किसी नेता को नोबल शांति जैसा कोई पुरस्कार देना … आदि. मुझे लगता है, हालांकि यह एक अंदाज़ ही है, कि नरेंद्र मोदी ने गांधी को इसीलिए उठाया हुआ है कि उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार मिल सके. ध्यान रहे, कॉर्पोरेट राजनीति के दौर में शिक्षा का अर्थ और शिक्षण व्यवस्था को इस कदर अवमूल्यित किया जा रहा है कि समाज से संवैधानिक और मानव-मूल्यों के पक्ष में सच्ची आवाज़ पैदा ही न हो सके. समाज में अन्तर्निहित सहनशीलता और भाईचारे की जो परंपरा रही है, उसे पिछले तीन दशकों का बाज़ारवाद पहले ही बहुत हद तक छिन्न-भिन्न कर चुका है

अभी भी नागरिक समाज के बहुत से लोग सोशल मीडिया पर मोदी और उनके भक्तों के खिलाफ लड़ाई छेड़े हुए हैं. चुनाव के दौरान और चुनाव के पहले भी वे यह काम पूरी शिद्दत के साथ कर रहे थे. उनका मोदी-विरोध अक्सर चुटकुलों के रूप में सामने आता है. मोदी को यह स्थिति माफिक आती है – चुनाव में चुनौती न मिले, चुटकुलों में भले ही मिलती रहे! बुद्धिजीवियों का विरोध भी फुटकर किस्म का है. मोदी जो कहते और करते हैं, उस पर बुद्धिजीवी प्रतिक्रिया करते हैं. वह भी ज्यादातर किसी राजनीतिक पार्टी अथवा नेता का पक्ष लेकर. फासीवाद के बरक्स लोकतंत्र की वकालत करते वक्त भी उनकी बात में दम नहीं आ पाता. क्योंकि वे चयनित (सेलेक्टिव) तरीके से यह करते हैं. भारत के पड़ोस का ही एक उदाहरण लें. पिछले दिनों चीन के वर्तमान राष्ट्रपति ने उम्र भर के लिए राष्ट्रपति बने रहने का फैसला ले लिया. भारत के फासीवाद विरोधी बुद्धिजीवियों में से शायद ही किसी ने इस फैसले का विरोध अथवा आलोचना की हो. चार जून दो हजार उन्नीस को चीन के थ्येनमन चौक की घटना के तीस साल होने पर दुनिया भर के मानव अधिकार/नागरिक अधिकार संगठनों ने हमेशा की तरह चीनी नेतृत्व की आलोचना की. लेकिन भगवा फासीवाद के विरुद्ध लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की वकालत करने वाले बुद्धिजीवियों ने तीस साल बाद भी उस घटना का नोटिस नहीं लिया.

कहने का आशय यह है कि फुटकर किस्म के असम्बद्ध और चयनित विरोध से संविधान और लोकतंत्र की पुनर्बहाली नहीं की जा सकती. बल्कि यह एक शगल जैसा बन गया है, जो परिवर्तनकारी जनचेतना को उलझाए रखता है और मुकम्मल निर्णय तक नहीं पहुंचने देता.

उपनिवेशवाद के खिलाफ आज़ादी का संघर्ष तभी गतिमान और फलीभूत हुआ, जब पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में आज़ादी के हक़ में समग्र रूप से निर्णायक फैसला हो गया. नवउपनिवेशवाद का चरित्र और शिकंजा उपनिवेशवाद से ज्यादा जटिल है. इसमें किसी देश के राष्ट्रीय संसाधनों के साथ राष्ट्रीय जीवन को देश का शासक वर्ग ही साम्राज्यवादी कब्जे में दे देता है.

इस तरह कारपोरेट राजनीति नवउपनिवेशवादी सत्ता-सरंचना के हथियार के रूप में काम करती है. भारत में भी कारपोरेट राजनीति नवउपनिवेशवादी सत्ता-सरंचना का हथियार है. नवउपनिवेशवाद से मुक्ति का लक्ष्य तभी हासिल हो सकता है, जब उसे हासिल करने के लिए देश में समग्र रूप से निर्णायक फैसला हो. लेकिन भारत के नागरिक समाज एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी नवउपनिवेशवादी व्यवस्था के अंतर्गत ही अपनी विरोधी भूमिका निभा कर संतुष्ट रहते हैं. वे उसके बाहर आकर उसे चुनौती देने की भूमिका नहीं लेते. मनमोहन सिंह ने बतौर वित्तमंत्री नब्बे के दशक के शुरू में ही चुनौती फेंकी थी कि मुक्त अर्थव्यवस्था का कोई विकल्प हो तो नई आर्थिक नीतियों के विरोधी उसे सामने लाएं. अर्थशास्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की यह चुनौती आज तक अनुत्तरित है. केवल इतनी बात नहीं है कि भारत के बुद्धिजीवी नवउपनिवेशवाद यानी उच्च पूंजीवाद के दायरे में उपलब्ध विशेष सुविधाओं को नहीं छोड़ना चाहते. दरअसल, उन्हें कोई ऐसी अर्थव्यवस्था और विकास का मॉडल स्वीकार्य नहीं है, जो पूंजीवाद के रास्ते हो कर नहीं गुजरता हो. अगर ऐसा नहीं होता तो भारत के अभिजात तबके के साथ जनसाधारण इस अर्थव्यवस्था और विकास के पीछे पागल नहीं हुआ होता.

यहां एक बात की ओर और ध्यान दिया जा सकता है. ये बुद्धिजीवी व्यवस्था के भीतर अपनी भूमिका रख कर मुख्यधारा मीडिया में जगह बनाए रहते हैं. बल्कि केवल अंग्रेजी में लिखने-बोलने के बावजूद जनता के बुद्धिजीवी (पब्लिक इंटेलेक्चुअल) भी कहलाते हैं. जबकि इस व्यवस्था का निर्णायक रूप से विरोध करने वाले जो थोड़े से बुद्धिजीवी देश में हैं, उनके लिए मुख्यधारा मीडिया में जगह लगभग ख़त्म हो गई है. यहां तक कि ज्यादातर सोशल मीडिया/न्यू मीडिया/वैकल्पिक मीडिया में भी उनका पूरी तरह स्वागत नहीं होता

गांधी ने साधारण भारतीय जनता की शक्ति को संगठित करके उस दौर की सभी धाराओं और स्वरों को आज़ादी के लक्ष्य के प्रति समर्पण के लिए बाध्य कर दिया था. नक्कू तत्वों ने देश को तोड़ने की हद तक नुकसान पहुंचाया, लेकिन वे आज़ादी को रोक नहीं सके. नवउपनिवेशवाद से आज़ादी की सूरत तभी बन सकती है, जब साधारण भारतीय जनता की एकजुट शक्ति नागरिक समाज, बुद्धिजीवी और नेताओं को उस लक्ष्य के प्रति बाध्य करे. उपनिवेशवादी दौर में गांधी ने यह दुरूह कार्य किया था. हर दौर में गांधी का होना जरूरी नहीं है. अन्यायकारी व्यवस्था के खिलाफ गांधी की सिविल नाफमानी की कार्यप्रणाली हमारे पास है. यह सही है कि मोदी ने गांधी को अपने कब्जे में लिया हुआ है. उससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए. मोदी-विरोधी खेमे में गांधी की भर्त्सना करने वाले बहुत से विद्वान हैं. गांधी के नाम पर कपट-व्यापार चलाने वाले विद्वान भी देश में शुरू से ही बहुत-से हैं. यह सब सिलसिला गांधी को लेकर चलता रहेगा.

नवउपनिवेशवाद से मुक्ति के सच्चे सिपाही गांधी की अन्याय के प्रतिरोध की कार्यप्रणाली से प्रेरणा ले सकते हैं. यहां अनिवार्यत: गांधीवादी विचारधारा/दर्शन को स्वीकारने से आशय नहीं है, अन्याय के प्रतिरोध की गांधी की कार्यप्रणाली – तरीके – से आशय है. डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने इसके बारे में लिखा है, “अत: हमारे युग की सबसे बड़ी क्रांति कार्यप्रणाली की है, एक ऐसी कार्यपद्धति के द्वारा अन्याय का विरोध जिसका चरित्र न्याय के अनुरूप है. यहां सवाल न्याय के स्वरूप का उतना नहीं है जितना उसे प्राप्त करने के उपाय का. वैधानिक और व्यवस्थित प्रक्रियाएं अक्सर काफी नहीं होतीं. तब हथियारों का इस्तेमाल उनका अतिक्रमण करता है. ऐसा न हो, और मनुष्य हमेशा वोट और गोली के बीच ही भटकता न रहे, इसलिए सिविल नाफ़रमानी की कार्यप्रणाली संबंधी क्रान्ति सामने आई है. हमारे युग की क्रांतियों में सर्वप्रमुख है हथियारों के विरुद्ध सिविल नाफ़रमानी की क्रांति, यद्यपि वास्तविक रूप में यह क्रांति अभी तक कमजोर रही है.” (मस्तराम कपूर, संपा., ‘मार्क्स गांधी और समाजवाद’, राममनोहर लोहिया रचनावली, खंड एक, पृ. एक सौ सैंतीस, अनामिका पब्लिशर्स, दिल्ली, दो हजार आठ) नवउपनिवेशवाद के शिकंजे में फंसे साधारण भारतीय जनता को एकजुट करने में यह कार्यप्रणाली कारगर हो सकती है. तब यह भी हो सकता है कि जनता के दबाव में देश के बुद्धिजीवी/अर्थशास्त्री एक ऐसी अर्थव्यवस्था और विकास के मॉडल के स्वीकार और निर्माण का कार्यभार अपने ऊपर लें, जो ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर विकसित होता हो.

यह सही है कि उपभोक्तावादी पूंजीवाद ने अपने मजबूत और सर्वव्यापी नेटवर्क द्वारा भारत सहित पूरी दुनिया के लोगों के दिलों पर कब्ज़ा जमाया हुआ है. उनके दिलों पर भी, जिनके नागरिक अधिकारों, यहां तक की जीवन अधिकार की कीमत पर यह व्यवस्था चलती है. आम तौर पर देखा गया है कि इस व्यवस्था के अगुआ और लाभार्थी मनुष्य होने की स्वाभाविक स्वतंत्रता की कीमत पर ज्यादा से ज्यादा सुखी होने की स्वतंत्रता के पीछे दीवाने होते हैं.

किशन पटनायक ने एक जगह लिखा है कि धन और सुविधाओं से लैस लोग सुखी भी हैं, या कितने सुखी हैं, इसमें संदेह की गुंजाइश है. उपनिवेशवाद के तहत भी लोगों के दिलों पर आधिपत्य और व्यामोह की मोटी परत जमी थी. स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों और उनमें सक्रिय विविध धाराओं ने उस परत को तोड़ कर उपनिवेशित लोगों के दिलों को मुक्त किया था. लोगों के ह्रदय परिवर्तन का यह महान काम सबसे ज्यादा गांधी ने किया. लोहिया ने गांधी की ह्रदय परिवर्तन की धारणा की समीक्षा नए ढंग से परिवर्तन की राजनीति के संदर्भ में की है. लोहिया का कथन है, “गांधी ने स्मट्स, इरविन और बिरला के ह्रदय परिवर्तन में मात्र एक साल लगाया, जबकि उन्होंने अपने जीवन के चालीस से ज्यादा साल दुनिया के करोड़ों लोगों के हृदयों में साहस भरने, और इस तरह उनका ह्रदय बदलने में लगाए.” (डॉक्टर राममनोहर लोहिया, ‘मार्क्स, गांधी एंड सोशलिज्म’, पृ. एक सौ छप्पन, समता विद्यालय न्यास, हैदराबाद, उन्नीस सौ तिरेसठ)

गांधी ने उपनिवेशवाद से मुक्ति का विचार भारतीयों के साथ-साथ उपनिवेशित दुनिया के करोड़ों लोगों के दिलों में पैदा कर दिया था. उपनिवेश कायम करने वाले देशों के लोगों के दिलों को भी कुछ हद तक गांधी के इस प्रयास ने छुआ था. उनकी हत्या के बाद भी पूरी दुनिया के स्तर पर उनका सिविल नाफ़रमानी और ह्रदय परिवर्तन का विचार उन लोगों/समूहों को प्रेरणा देता रहा, जिनकी मनुष्य अथवा नागरिक होने की स्वतंत्रता का हनन किया गया था. गांधी से प्रेरणा लेकर नवउपनिवेशवादी शिकंजे से मुक्ति का विचार आज भी भारत सहित पूरी दुनिया के लोगों के दिलों में जगह बना सकता है.

डॉक्टर प्रेम सिंह

(लेखक भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फेलो और दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)

Gandhian way of changing corporate politics

About डॉ. प्रेम सिंह

डॉ. प्रेम सिंह, Dr. Prem Singh Dept. of Hindi University of Delhi Delhi - 110007 (INDIA) Former Fellow Indian Institute of Advanced Study, Shimla India Former Visiting Professor Center of Oriental Studies Vilnius University Lithuania Former Visiting Professor Center of Eastern Languages and Cultures Dept. of Indology Sofia University Sofia Bulgaria

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