Jai Prakash Narayan and Dr Ram Manohar Lohia

जेपी और लोहिया थे अगस्त क्रांति के नायक

अगस्त क्रांति (9 अगस्त) पर विशेष Special on August Revolution (9 August)

नई दिल्ली। भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) का आगाज महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने किया था पर आंदोलन के शुरुआत में उनके साथ ही जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) और सरदार पटेल समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसे में जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली जैसे युवा समाजवादी नेताओं ने भूमिगत रहते हुए आंदोलन की अगुआई की। यह इन समाजवादियों का सधा हुआ नेतृत्व ही था कि वह आंदोलन आजादी की लड़ाई में 1857 की क्रांति के बाद दूसरा बड़ा और तीव्र आंदोलन साबित हुआ। यह आंदोलन की व्यापकता ही थी कि लोहिया अगस्त क्रांति को स्वतंत्रता दिवस से भी ज्यादा महत्व देते थे।    उनका कहना था कि देश के आजाद होने कुछ दिन पहले से ही कांग्रेसियों को सत्तालोलुपता झलकने लगी थी।

अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का मकसद भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराना

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की ओर से चलाए गए भारत छोड़ो इस आंदोलन को अगस्त क्रांति आंदोलन (August revolution movement) भी कहा जाता है, जो वास्तव में भूमिगत क्रांतिकारी आंदोलन और गांधी के नेतृत्व में चले जनता के अहिंसक आंदोलन का एक मिलन था।

उस समय लोहिया और जेपी के सधे नेतृत्व की वजह विचारवान युवा वर्ग कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (Congress socialist party) में विश्वास कर रहा था। कांग्रेस के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद इन क्रांतिकारियों ने भूमिगत रहते हुए आंदोलन को गति दी। उस दौर में अपनी बात रखने का माध्यम या तो पत्राचार ही था। जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन और हौसलाअफजाई करने और आंदोलन के तरीके को लेकर दो लंबे पत्र अज्ञात स्थानों से लिखे।

भारत छोड़ो आंदोलन की बड़ी विशेषता

भारत छोड़ो आंदोलन की एक बड़ी विशेषता यह थी कि आंदोलन के दौरान जनता खुद अपनी नेता थी। जेपी और लोहिया के काम करने की यह विशेषता रही है कि उनके आंदोलन में जनता नेता होती थी। ऐसा ही जेपी क्रांति में भी देखने को मिला था। जिसमें भी जनता आगे थी और नेता पीछे।

वह जेपी और लोहिया का सधा हुआ नेतृत्व ही था कि उन्होंने गांधी के आह्वान को बखूबी जनता के समक्ष रखने में सफलता प्राप्त की। इस आंदोलन में जेपी और लोहिया को बहुत सी यातनाओं का सामना करना पड़ा। कहना गलत न होगा कि जेपी और लोहिया की कुर्बानी के बिना यह आंदोलन जन-जन का आंदोलन नहीं बनता।

हर आंदोलन के कुछ नायक होते हैं। ऐस ही भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और अरुणा आसफ अली जैसे नेता नायक के रूप में उभर कर सामने आये। समाजवादियों के इस आंदोलन से अंग्रेजी हुकूमत की नींव पूरी तरह से हिल गई थी।

इस आंदोलन का एक प्रकरण यह भी है कि हजारीबाग सेंट्रल जेल में रखे गये जयप्रकाश नारायण ने जेल को फांदा था।

Quit India Movement History भारत छोड़ो आंदोलन का इतिहास

दरअसल आंदोलन को गति देने के लिए जेपी ने जेल से बाहर निकलने की योजना बनाई। नवंबर 1942 को दीवाली के दिन जब बड़ी संख्या में गार्ड त्योहार की वजह से छुट्टी पर थे तब जेपी ने यह साहसिक कदम उठाया था। जेपी के इस कदम ने उन्हें लोकनायक बना दिया था।

भारत छोड़ो आंदोलन में जब अंग्रेजी हुकुमत ने देश भर में कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया तो तो तब एकबारगी ऐसा लगने लगा था कि यह आंदोलन मुकाम पर पहुंचने से पहले ही विफल हो जाएगा। लेकिन कांग्रेस के भीतर ही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाकर क्रांति कर रहे जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं ने आंदोलन का अगले दो सालों तक सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।

यह वह समय था जब आंदोलन की घोषणा होते ही मुंबई में एक भूमिगत रेडियो स्टेशन से आंदोलनकारियों को दिशानिर्देश दिए जाने लगे थे। अंग्रेजी हुकूमत समझ नहीं पा रही थी कि ऐसा कौन कर रहा है। ऐसा करने वाले कोई और नहीं, राममनोहर लोहिया थे। अंग्रेज जब तक उस रेडियो स्टेशन को ढूंढ पाते, तब तक लोहिया कलकत्ता जा चुके थे। वहां वे पर्चे निकालकर लोगों का नेतृत्व करने लगे। उसके बाद वे जयप्रकाश नारायण के साथ नेपाल पहुंच गए। वहां ये लोग आजाद दस्ता बनाकर आंदोलनकारियों को आंदोलन विस्तारित करने का प्रशिक्षण देने लगे।

CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।इस अवधि में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जेपी ने भूमिगत रूप में सक्रिय रूप से काम किया। ब्रिटिश शासन के अत्याचार (Tyranny of british rule) से लड़ने के लिए नेपाल में उन्होंने एक आजाद दस्ता बनाया। कुछ महीनों के बाद सितंबर 1943 में एक ट्रेन में यात्रा करते वक्त उन्हें पंजाब से गिरफ्तार कर लिया गया और स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा उन्हें बहुत सी यातनाएं दी गईं। जनवरी 1945 में उन्हें लाहौर किले से आगरा जेल स्थानांतरित कर दिया गया।

दरअसल भारत छोड़ो आंदोलन में इक्कीस महीने तक भूमिगत आंदोलन चलाने के बाद लोहिया को बंबई में 10 मई 1944 को गिरफ्तार किया गया था।

पहले लाहौर किले में और फिर आगरा में कैद रखा गया। लाहौर जेल में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें अमानवीय यातनाएं दी। दो साल कैद रखने के बाद जून 1946 में लोहिया को छोड़ा गया। इस बीच उनके पिता का निधन हुआ, उस समय अंग्रेजी हुकूमत पिता के अंतिम संस्कार के लिए उन्हें पैरोल पर छोड़ना चाह रही थी पर लोहिया ने यह कहते हुए उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया कि जिन अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए वह खड़े हुए हैं, उनकी कोई सहानुभूमि उन्हें स्वीकार नहीं।

अंग्रेज लोहिया और जेपी से कितने भयभीत थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत छोड़ो आंदोलन के सब बड़े नेताओं को छोड़ दिया गया था, पर लोहिया और जेपी अभी भी जेल में बंद थे और उन्हें यातनाएं दी जा रही थीं।

जब गांधी जी ने जोर देकर कहा कि वे लोहिया और जयप्रकाश की बिना शर्त रिहाई के बाद ही ब्रिटिश शासकों के साथ बातचीत शुरू करेंगे, तब जाकर उन्हें अप्रैल 1946 को छोड़ा गया।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास (History of India’s independence movement) में अगस्त क्रांति के नाम से मशहूर भारत छोड़ो आंदोलन देशव्यापी था, जिसमें बड़े पैमाने पर भारत की जनता ने हिस्सेदारी की और अभूतपूर्व साहस और सहनशीलता का परिचय दिया।

डॉ. राममनोहर लोहिया ने ट्राटस्की के हवाले से लिखा है कि रूस की क्रांति में वहां की एक प्रतिशत जनता ने हिस्सा लिया, जबकि भारत की अगस्त क्रांति में देश के 22 प्रतिशत लोगों ने हिस्सेदारी की।

चरण सिंह राजपूत

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

History of India’s independence movement in Hindi

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