Greenpeace India

सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन में भारत पहले नंबर पर : ग्रीनपीस रिपोर्ट

सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन (Sulfur dioxide emission) वायु प्रदूषण की सबसे प्रमुख वजहों (The main causes of air pollution) में से एक है।

नई दिल्ली। 19 अगस्त 2019। जलवायु परिवर्तन (Climate change) पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस (Greenpeace) के एक नए अध्ययन के मुताबिक भारत सबसे अधिक सल्फर डाइऑक्साइड  SO2  का उत्सर्जन करता है। नासा के ओजोन मॉनिटरिंग इंस्ट्रूमेंट सैटेलाइट (NASA’s Ozone Monitoring Instrument Satellite) ने ये पता लगाया है कि 15 फीसदी से अधिक मानवजनित सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन (Emission of anthropogenic sulfur dioxide) भारत करता है। भारत में ये उत्सर्जन सबसे अधिक कोयले के जलने के कारण होता है।

Fossil fuels burning in factories : Source of origin of sulfur dioxide in the atmosphere

सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन वायु प्रदूषण की सबसे प्रमुख वजहों में से एक है। वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड की उत्पत्ति का स्रोत फ़ैक्टरियों में जलने वाले जीवाश्म ईंधन होते हैं। धातु से अयस्क निकालना, वो गाड़ियां जिनके ईंधन में सल्फर की मात्रा अधिक पाई जाती है और ज्वालामुखी से निकलने वाला सल्फर, सल्फर डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के दूसरे स्रोत हैं।

दिसंबर 2015 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पहली बार फैक्ट्रियों के लिए कोयला पावर प्लांट से होने वाले सल्फर डाइऑक्साइड के उत्सर्जन की सीमा तय की थी जिसकी समयसीमा मंत्रालय ने दिसंबर 2017 तय की थी। लेकिन बिजली मंत्रालय और पावर प्लांट संचालकों के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार ये समयसीमा दिल्ली-एनसीआर के पावर प्लांट के लिए बढ़ाकर दिसंबर 2019 और देश के अन्य पावर प्लांट के लिए 2022 कर दी गई थी।

ग्रीनपीस के अध्ययन के मुताबिक सिंगरौली, नेवयली, तलचर, झारसुगुड़ा, कोरबा, कच्छ, चेन्नई, रामगुंडम, चंद्रपुर, कोरडी जैसे इलाकों से भारत में सबसे अधिक सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। रिपोर्ट के मुताबिक रूस के नॉरिलस्क स्मेलटर कॉम्प्लेक्स से दुनिया में सबसे अधिक सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है इसके बाद दक्षिण अफ्रीका के मपूमालांगा और ईरान के जगरोज़ से सबसे अधिक सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।

ग्रीनपीस की सीनियर कैंपेनर पुजारिनी सेन कहती है,

“यह रिपोर्ट साफ बताती है कि हम कोल पावर प्लांट्स को प्रदूषण फैलाने और लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की खुली छूट नहीं दे सकते। हम प्रदूषण से जुड़े आपातकाल का सामना कर रहे हैं लेकिन अभी भी तस्वीर साफ नहीं कि है कोल प्लांट्स प्रदूषण को रोकने के लिए तय की गई समयसीमा पूरी कर पाएंगे या नहीं। अगर हमने इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया तो स्थिति और बिगड़ती चली जाएगी। सरकार को लोगों के स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना चाहिए और प्रदूषण फैलाने वालों और कानून का पालन न करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।”

इस अध्ययन के मुताबिक वायु प्रदूषण का संबंध सीधा लोगों के स्वास्थ्य से है। दुनिया की 91 फीसदी आबादी उन इलाकों में रहती है जहां बाहरी वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ संगठन की तरफ से तय की गई गाइडलाइंस की सीमा को पार कर चुका है और इसका नतीजा यह है कि हर साल 40 लाख से अधिक लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण अपनी तय उम्र से पहले ही हो जाती है।

ग्रीनपीस के कैंपेन स्पेशलिस्ट सुनील दहिया कहते हैं,

“अब वक्त आ गया है कि प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों की जगह तकनीक की ओर कदम बढ़ाया जाए। वायु प्रदूषण और जलवायु आपातकाल का एक ही समाधान है। दुनियाभर में सरकारों का ये दायित्व है कि वो जीवाश्म ईंधन की जगह सुरक्षित और सतत् ऊर्जा के इस्तेमाल पर ज़ोर दे।”

About हस्तक्षेप

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.