Rajiv Gandhi

जब राजीव गांधी ने कहा था – ”रक्त बहाने के बजाय, घृणा को बह जाने दो’

भाषाविद् डॉ. मन्नूलाल यदु की पुस्तक “राजीव गांधी: भारतीयता की तलाश” का यह अंश प्रतिष्ठित समाचारपत्र देशबन्धु में प्रकाशित हुआ था। स्व. राजीव गांधी की पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि (Tribute to Rajiv Gandhi’s death anniversary) के साथ साभार पुनर्प्रकाशन…

डॉ. मन्नूलाल यदु, भाषाविद

राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनने के बाद 31 अक्टूबर,1984 को राष्ट्र के नाम जो संदेश प्रसारित किया था, वह ऐसी घड़ी थी, जब इंदिरा जी की हत्या हो चुकी थी और पूरा राष्ट्र आंदोलित था। उस घड़ी में उन्होंने राष्ट्र की एकता बनाए रखने के लिए लोगों से संकल्प चाहा था और इसी संकल्प को पुन: 2 नवंबर, 1984 को दुहराते हुए उन्होंने कहा था कि ”रक्त बहाने के बजाय, घृणा को बह जाने’ और यह तभी संभव है, जब लोग साथ-साथ चलें, साथ-साथ सोचें। भारत को सदैव महान और सबल राष्ट्र बनाने की कामना उनके प्रत्येक भाषणों और संदेशों में मिलता है। उनके द्वारा दिए गए भाषणों तथा लेखों के संग्रह में प्रारंभिक 90 पृष्ठ राष्ट्रीय एकता से ही सम्बद्ध है।

राष्ट्रीय एकता के लिए बार-बार किसी प्रधानमंत्री को विविध मंचों से क्यों बोलना पड़ता है, इसकी मीमांसा  हम उस समय अधिक अच्छी तरह से कर सकते हैं, जब राजीव जी के प्रधानमंत्रित्व के पूर्व भारत की अस्मिता की समझ लें। यह भी समझ लेना आवश्यक है कि राष्ट्रीय एकता के लिए कौन से बाधक तत्व रहे हैं और कौन से बाधक। हम यह भलीभांति जानते हैं कि भारत में जातीय आंदोलनों का सारा इतिहास औपनिवेशिक काल की देन है और चूंकि नव साम्राज्यवाद से आज भी हम उबर नहीं पाए, इसलिए विघटन की स्थिति यथावत बनी हुई है।

भारतीय जनता के जातीय जागरण का समारंभ ब्रिटिश उपनिवेश में ही था। उस समय भारत दो भागों में बंटा हुआ था। एक तो प्रत्यक्षत: शासनाधीन ब्रिटिश भारत और दूसरा देशी भारत। इन दोनों के बीच किसी प्रकार का तालमेल नहीं था। उस युग को सामंत राष्ट्रीय एकता में बाधक थे और ब्रिटिश अधिकारी उन्हें इस अलगाव के लिए जानबूझ कर प्रोत्साहित करते थे।

इतना ही नहीं, अंग्रेज चाहते थे कि इस देश को जनता को कई प्रकार के लेबिलों  में बांट दिया जाए जिससे उनमें आपस में संवाद की स्थिति न रहे। प्रसिद्ध मानवविज्ञानी बैरियर एल्विन ने 1939 में आदिवासियों के लिए एक निषिद्ध क्षेत्र की वकालत की थी, जिसमें दूसरे क्षेत्रों का प्रवेश वर्जित हो। उपनिवेशवादी अधिकारी इसी तरह के विचारों को प्रोत्साहित करते थे और वे चाहते थे कि यह देश जातियों, प्रजातियों, उपजातियों, क्षेत्र, उपक्षेत्रों आदि में बंट जाएं।

19वीं शताब्दी के अंतिम दशक तक इस देश में नवजागरण के लक्षण प्रकट होने लगते हैं और लोगों के जातीय जीवन में नई चेतना का उदय होता है। इसी के साथ प्रबोधक और सुधारक  इस देश में पैदा होते हैं, जो जाति, उपजाति, धर्म, भाषा आदि के नाम से होने वाले खतरों से लोगों को चेतावनी देते हैं।

भारत के बंटवारे के साथ सांप्रदायिक वैमनस्य का एक घिनौना स्वरूप हमारे सामने आता है। होना यह चाहिए था कि आजादी के बाद देश में एकता की ताकतें बढ़तीं, किन्तु स्वतंत्रता के बाद भाषावाद प्रांतों के विभाजन से हमने पुन: वही भूल दुहरा दी, जो नहीं करना चाहिए था। आज भारतवर्ष में जो विखंडन और अलगाव की स्थिति है, वह इस रूप में हमें विरासत के रूप में मिली प्रतीत होती है।

आजादी के बाद सांप्रदायिक और क्षेत्रीय दलों में बाढ़ आई है। शिवसेना या मुस्लिम लीग ऐसे ही दल हैं। इनके कारनामों से भारतीय जनता में बेचैनी और चिंता पैदा हो गई। राष्ट्रवाद को धोखा माने जाने लगा और बढ़ती बेरोजगारी की हालत में राज्य सरकारों की नीति असम असमियों के लिए, महाराष्ट्र मराठों के लिए जैसे नारों में बदल गया। 1967 में पहली बार इस तरह के नारे सबसे पहले पश्चिम बंगाल में प्रकट हुए और यह धीरे-धीरे पूरे देश में छा गए।

1956 के सुधार के बाद नए राज्यों का निर्माण हुआ, जनतांत्रिक आंदोलन के दबाव के कारण ऐसा करना पड़ा। असम से नागालैंड अलग हुआ, मेघालय राज्य की स्थापना और मणिपुर और त्रिपुरा बने, अरुणाचल प्रदेश बना, किंतु इन सबके बाद भी क्षेत्रीयता की मांग बढ़ती गई। पंजाब में आंदोलन शुरू हुआ और उसकी विभीषिका से आज हम परिचित हैं।

समय-समय पर अलगाववाद की भावनाएं हिंदू संप्रदायवादियों और मुस्लिम संप्रदायवादियों के द्वारा फैलाई जाती रही हैं। जातीय सीमांकन के बहुत से अनसुलझे सवाल भी पैदा हुए। इन सबको बहुत धैर्य के साथ राजीव गांधी ने सुलझाया। अगस्त 1985 में अकाली दल के नेता संत लोंगोवाल के बीच पंजाब समस्या के समाधान खोजे, किंतु ऐसा लगता है कि लोग समस्याओं का निदान नहीं चाहते तथा राजनैतिक संघर्ष को बनाए रखने के लिए देश की अस्मिता और पहचान को दरकिनार रख देते हैं।

प्रादेशिकता की भावना उतनी ही खतरनाक है, जितनी कि सांप्रदायिकता की और हम यह जानते हैं कि अलग-अलग राज्यों के बन जाने के बावजूद लोगों में एकता नहीं आई। दुर्भाग्य यह है कि सांप्रदायिक, राजनीतिज्ञ कभी उर्दू भाषी आबादी के लिए उर्दूस्तान की मांग करते हैं, तो कभी आंध्र सांप्रदायिकता उस समय और भी खतरनाक हो जाती है, जब आंध्र राष्ट्रवादी हमारी सेनाओं को भी जाति और धर्म से जोड़ने लगते हैं। देश में अंधराष्ट्रवादी भावनाओं की वृद्धि ने राजीव गांधी चिंतित हैं, क्योंकि अहसास है कि मजबूत केंद्र के अभाव में भारत की स्वाधीनता खतरे में पड़ सकती है।

राष्ट्रीय एकता के लिए जो बाधक तत्व हैं, उसमें धार्मिक पुनर्जागरण का उल्लेख सबसे पहले करना होगा, जो अभी हाल की देन है। यह सही बात है कि इस देश का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप हर व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और यह भी सही बात है कि प्रत्येक धर्म लोगों को सकारात्मक लक्ष्यों की पूर्ति का उपाय बताता है, किंतु आज स्थिति दूसरी है। आज धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के अंतर्गत न तो धार्मिक विश्वास को दबा सकते हैं और न ही पूजा या इबादत को रोक सकते, किन्तु इसी की आड़ में नव उपनिवेशवादी इस देश के कुत्सित राजनीतिज्ञों के साथ मिलकर अपनी रोटी सेंक रहे हैं।

अब धर्म कुछ राजनैतिक लक्ष्यों से युक्त हो गए हैं। एक ओर तो मुट्ठी भर सिरफिरे सिख देश और विदेश से खालिस्तान की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर कुछ मुसलमान जम्मू और काश्मीर को अलग कर देना चाहते हैं और तीसरी ओर विश्व हिन्दू परिषद जैसी संस्थाएं हिन्दू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रही है। इसके अतिरिक्त हम यह भी अनुभव कर रहे हैं कि लोग क्रिश्चियन लैंड की बात करते हैं या झारखंड आंदोलन चाहते हैं।

नव उपनिवेशवाद यह चाहते हैं कि इस देश को अस्थिर बनाया जाए और इसके लिए सीआईए जैसी संस्थाओं के माध्यम से भारत में ही नहीं, बल्कि भारत से बाहर भी इस देश के खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हैं। यह समूचे देश में देखने को मिल सकता है।

आजादी से पहले संप्रदायवादियों का इस्तेमाल साम्राज्यवादियों ने एक खास प्रकार से किया था। 1857 से 1946 के बीच ब्रिटिश साम्राज्यवादी ‘बांटो और राज्य करो’ की स्थिति चला रहे थे, किन्तु राष्ट्रवाद की धारा इस देश में आई तो संप्रदायवाद समाप्त हुआ और सारे धर्म एक होकर आजादी के लिए दीवाने हो गए। गांधीजी और जवाहर लाल नेहरू ने लोगों में ऐसी चेतना फैलाने का भरसक प्रयास किया और लोगों में भारतीयता का अहसास बढ़ने लगा। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि हम जैसे ही आजाद हुए संप्रदायवाद की धारा फिर बहने लगी। नई आर्थिक संरचना और आधुनिकी करण की प्रक्रिया से यह आशा थी कि धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा, किन्तु दुर्भाग्य है कि शिक्षा में ऊंचाइयों तक पहुंचने के बाद भी हमारा मन अभी भी उन्मादी है। यह बहुत दुर्भाग्य कहा जाएगा कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक का भारत मध्य युगीन चेतना से जुड़ जाए।

ऐसा क्यों हुआ यह समझने के लिए हमें अपने देश की वर्तमान हालतों से परिचित होना पड़ेगा। लोग इसमें दो कारण देखते हैं- एक तो वे हारे हुए राजनीतिज्ञ इसके ला रहे हैं, जिसके लिए जनता के सामने आने का और कोई रास्ता नहीं है तथा दूसरी बात है, संतुष्टीकरण की हमारी नीति। हम इन दोनों ही जवाबों को पूरी तरह सही नहीं मानते, क्योंकि हमें यह समझ लेना चाहिए कि जो अलग-अलग पुनर्जागरण के नारे आ रहे हैं, उनके पीछे कौन सी मानसिकता है। हिंदू नवराष्ट्रवाद पनप रहा है, यह भी हम अनदेखा नहीं कर सकते। मुस्लिम लीग भी खतरनाक है इसे भी हम नहीं भुला सकते। हम यह जानते हैं कि आजादी के बाद जमायतें इस्लामी आंदोलन तेज हुआ है और इस्लामी पुनर्जागरण का  जोर भारत में कहीं ज्यादा है, अपेक्षाकृत उन देशों के जहां इस्लामी राज्य हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो आज भी मुस्लिम पर्सनल ला का ही वकालत करते हैं। उद्योगों में राष्ट्रीयकरण के खिलाफ हैं और यह चाहते हैं कि पूरे राष्ट्र में इस्लाम का नया कानून बने।

देश की प्रभुसत्ता और अखंडता को चुनौती खालिस्तान के नारे से भी समझ में आती है तथा पूर्वांचल इसी प्रकार के धार्मिक उन्माद के कारण सुगबुगा रहा है। प्रत्येक धर्म यह चाहता है कि धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप को वह खत्म कर दें, ताकि उसके धर्म की प्रभुसत्ता हो। यह एक प्रकार से धर्म की राजनीति से मिलाने की बात है, जिसकी राजीव जी निंदा करते हैं। यह नवधार्मिक चाहते हैं कि देश की जड़ों को मिटा दिया जाए और देश फिर से गहरे अंधकार में खो जाए।

राजीव जी ने अपने भाषणों में अनेक बार यह बात दुहराई है तथा यह कहा है कि लोगों में यह पागलपन बंद हो, जिससे राष्ट्र एक उन्नतशाली समृद्ध राष्ट्र का स्वरूप प्राप्त कर सके। पंजाब की समस्या पर उनकी चिंता बहुत गहरी थी तथा वे जानते थे कि यह शांति और प्रेम से निपट सकती है। राष्ट्रीय एकता पर जब वे चर्चा करते हैं, तब उनके मन में यह बात भी होती है कि जब तक लोगों की आर्थिक स्थिति नहीं गुजरेगी, तब तक मन और मस्तिष्क की एकता नहीं आ पाएगी। इसके लिए उपाय सुझाते हुए वे यह भी कहते हैं कि आर्थिक विकास से इस देश की एकता संभव है।

आर्थिक विकास की बात जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी कहते थे, तब उनके मन में सुनियोजित आर्थिक विकास होता था तथा वे उसे बिना उद्योग और तकनीकी के संभव नहीं मानते। वे यह भी जानते हैं कि विश्वपटल पर उन्हें सुदृढ़ और सक्रिय विदेश नीति अपनानी होगी। भारतीय की एकता के लिए जहां-जहां से खतरा है, उनसे साहस के साथ लड़ना होगा। सांप्रदायिकता जब कभी भी किसी भी स्थिति में जन्म लेती है, तब उसके पीछे राजनीतिक और सत्ता प्राप्ति का लक्ष्य होता है। इसीलिए वे मानते थे कि देश का राजनीतिक क्षितिज भी स्वस्थ और स्वच्छ होना चाहिए। इस बात की चर्चा हमने ”राजीव गांधी: इन सर्च ऑफ इंडियननेंस” में की है।

(पुस्तक राजीव गांधी: भारतीयता की तलाश से)

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