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आज करप्शन, अपराधीकरण और काला धन ही सभी पार्टियों का चेहरा : प्रो.आनंद कुमार

आज करप्शन, अपराधीकरण और काला धन ही सभी पार्टियों का चेहरा : प्रो.आनंद कुमार

जयपुर, 15 नवंबर 2019. जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच द्वारा तीन दिवसीय जन साहित्य पर्व की शुरुआत आज देराश्री शिक्षक सदन ,राजस्थान विश्वविद्यालय में हुयी। इस बार का आयोजन जलियांवाला बाग की शहादत को समर्पित किया गया है और आयोजन की थीम “भारत के सौ साल” रखी गयी है।

आयोजन की शुरुआत राजस्थान विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर लोकेश जैन और उनकी टीम द्वारा जलियाँवाला बाग की मार्मिक एवं जीवंत प्रदर्शनी के साथ हुआ।

उद्घाटन सत्र ‘संघर्ष की विरासत’

इस सत्र में प्रो.जीवन सिंह ने सभी का स्वागत करते हुए लोकतंत्र के खतरे की और संकेत किया और समकालीन सवालों एवं नवजागरण तक के इतिहास पर भी प्रकाश डाला।

वरिष्ठ पत्रकार शीबा असलम फहमी ने इस सत्र में बोलते हुए कहा कि हमें संघर्ष की विरासत को बचाने के लिए पुनः एक संघर्ष की जरूरत है। आज यह कोशिश हो रही है कि धरोहर और संग्रहालयों को बदला जा रहा है, हमें यह सोचना पड़ेगा कि जिस देश के इतिहास को गायब कर दिया जायेगा तो उसकी पहचान कैसे होगी।

प्रख्यात समाजशास्त्री और जेएनयू के प्रोफ़ेसर रहे प्रो.आनंद कुमार ने कहा कि सौ साल पहले हमारे समाज का  सामना साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से था, इसलिए उस समय हमने कलम के साथ-साथ हल और फावड़े से भी लड़ाईयां लड़ीं, लेकिन आज की लडाई क्रोनी कैपिटल्जिम की है क्यों कि सरकारी कम्पनियों को बंद करके प्राइवेट कम्पनियों को दिया जा रहा है। आज भारतीय राजनीति की दिशा भी एनआईआई तय करते हैं। एक भारत छोड़ो आन्दोलन भारत की आज़ादी के लिए तब चला था और एक आज चल रहा है जहाँ हर परिवार अपने बच्चों को विदेश भेजना चाहता है। आज करप्शन, अपराधीकरण और काला धन ही सभी पार्टियों का चेहरा बन गया है। वोट बैंक ने पूरे समाज को बाँट दिया गया है इसलिए राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए सामाजिक मंथन की आवश्यकता है। ऐसे ही स्त्री, दलित,आदिवासी विमर्श पर मंथन की आवश्यकता थी लेकिन इन विमर्शों में हम एकता स्थापित नहीं कर पाए।

इस सत्र का संचालन प्रो.राजीव गुप्ता ने किया।

दूसरा सत्र -वैज्ञानिक चेतना, इतिहास और धर्म

इस सत्र में बोलते हुए दिनेश अबरोल ने कहा कि स्वतंत्रता से पूर्व भारत अनेक जागीरों में बंटा हुआ था इसलिए एक नए भारत की कल्पना की जरूरत थी और इसी बात को ध्यान में रखकर प्रथम शिक्षा नीति (राधाकृष्ण नीति) 1948 में बनी तो वह सपने की तरह था लेकिन वह सपना पूरा नहीं हो सका क्यों कि अंग्रेजों ने जिस भेद भाव को पैदा किया वह आज़ादी के बाद भी ख़त्म नहीं हुआ।

जब हम वैज्ञानिक चेतना की बात करते हैं तो हमें यह सोचना होगा कि विज्ञानं का ज्ञान भारतीय भाषाओँ में हो। रूरल यूनिवर्सिटी की कल्पना भारतीय कृषि विज्ञान को बढ़ाने के लिए थी, इसलिए आज हमें उन औजारों को विकसित करना पड़ेगा जिनके द्वारा समय की चुनौतियों से लड़ सकें।

इसी विषय पर बोलते हुए रवि श्रीवास्तव ने कहा कि कहने के लिए हमारे पास एक समृद्ध परम्परा है लेकिन इसके बावजूद हम पिछड़े हुए क्यों हैं ? इसका मुख्य कारण है बौद्धिकता और कर्म के बीच का भेदभाव। जिस समाज में परत दर परत विभाजन हो वहां विज्ञानं या वैज्ञानिक चेतना का विकास कैसे संभव हो सकता है। अज्ञान,अन्धविश्वास और सत्ता का एक सम्बन्ध है जिससे पाशविकता, अराजकता और अन्धराष्ट्रवाद को ही बढ़ावा मिलेगा।

इस सत्र का संचालन विशाल विक्रम सिंह ने किया।

तीसरा सत्र- पत्रकारिता के रास्ते

इस सत्र में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी ने कहा कि आज मीडिया वहां नहीं जो स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व था। आज एडिटोरियल इंस्टिट्यूशन नहीं हैं। आज वह स्वतंत्र नहीं है बल्कि उसका मालिक है। अतः आज चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो उसका मालिक ही तय करता है कि वहां क्या छापा जायेगा या दिखाया जायेगा।

हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित पत्रकार पंकज बिष्ट ने कहा कि हमें सोचने की जरूरत है कि हिंदी की तुलना में अंग्रेजी के अख़बारों में संतुलन रहता है। आखिर अख़बार की स्वतंत्रता क्यों खत्म हो गयी है। ज्यों-ज्यों अख़बारों का विस्तार हुआ है और एक राज्य में ही अलग-अलग एडिशन निकलने लगा है और अनेक लोग इसमें इन्वेस्ट करने लगे हैं इसलिए इनके हितों का ध्यान भी रखना पड़ता है।

लेखक और प्रोफ़ेसर बलवंत कौर ने जलियांवाला बाग ह्त्या के पीछे के कारण बताते हुए कहा कि गुरुद्वारों में जो ग्रन्थी थे उन्हें भी अंग्रेज सरकार नियुक्त करती थी और उसमें उनका बड़ा हिस्सा होता था और इसे अख़बार ही लोगों के सामने लेकर आये। 1915 के आस पास ग़दर पार्टी का काम और उसका मुख्य अख़बार, जिसने जनचेतना का काम किया और जिस वजह से लोगों का विरोध अंग्रेजों की खिलाफ शुरू हुआ। बलवंत जी ने 1984 सिक्ख दंगे,बाबरी मस्जिद तथा 2002 के गुजरात दंगे की चर्चा करते हुए कहा कि उस समय की पत्रकारिता भी पक्षपातपूर्ण रही।

इस सत्र का संचालन सामाजिक कार्यकर्त्ता भंवर मेघवंशी ने किया।

इसी सत्र में भंवर मेघवंशी द्वारा लिखित पुस्तक ‘मैं एक कारसेवक था’ का लोकार्पण भी किया गया।

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