बिहार में भाजपा विरोधी लड़ाई :  तेजस्वी यादव को कन्हैया से लगने लगा है डर ?

बिहार में भाजपा विरोधी लड़ाई :  तेजस्वी यादव को कन्हैया से लगने लगा है डर ?

कन्हैया की राजनीतिक यात्रा:जेएनयू के बाद बेगूसराय प्लेटफॉर्म।

रिंकु यादव

जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की राजनीतिक यात्रा जेएनयू प्लेटफॉर्म से शुरु होकर बिहार के लेनिनग्राद कहे जाने वाले बेगूसराय प्लेटफॉर्म तक पहुंच गई है। बिहार में भी कन्हैया लगातार चर्चा में हैं। वे अभी नरेन्द्र मोदी विरोधी राजनीति के दायरे के चमकते युवा सितारा हैं।

लेकिन बिहार में लेनिनग्राद और सीपीआई अपनी चमक खो चुकी है। संसदीय उपलब्धियों के लिहाज से अभी सीपीआई जीरो है। लेनिनग्राद सहित पूरे बिहार में उसके पास न तो एक भी विधायक है और न ही कोई सांसद। जनसंघर्ष के मोर्चे पर भी लेनिनग्राद सहित पूरे बिहार में सीपीआई की पहचान व चमक धुंधली हो चुकी है। ऐसे हालात में बिहार की राजनीति में बेगूसराय के प्लेटफॉर्म पर सीपीआई की उम्मीद का सितारा कन्हैया राजनीतिक यात्रा के क्रम में पहुंचा है और 2019 के संसदीय चुनाव में खेलने की तैयारी कर रहा है।

अभी बिहार में सीपीआई की राजनीति के केन्द्र में कन्हैया ही दीख रहे हैं!

कन्हैया के वैचारिक-राजनीति दृष्टि व व्यवहार को सीपीआई की विचारधारा व राजनीति से अलग कर नहीं ही देखा जाना चाहिए। बुनियादी तौर पर वामपंथी राजनीति के दायरे में वह सीपीआई की समर्पणकारी-दक्षिणपंथी व संसदीय अवसरवादी राजनीति का ही नया चेहरा है। इसी किस्म की राजनीति को नये दौर में आगे ले जाने और कहिए तो विकसित करने की क्षमता व संभावना को वह अभिव्यक्त कर रहा है।

लेकिन बहुतेरे लोग उसे सीपीआई से अलग-थलग कर वाम राजनीति के उद्धारक के बतौर देखते हैं। वाम राजनीति के पुनर्जीवन/नवजीवन की उम्मीद और नई संभावनाओं का सितारा मान बैठे हैं।

वाम-लोकतांत्रिक विचारधारा व राजनीति की न्यूनतम समझ रखने वाले भी यह जानते हैं कि कुछ सितारों-नायकों के बल पर वाम राजनीति का ठहराव व गतिरोध नहीं टूटना है। वह भी वैसे सितारे-नायक के जरिए जिसके निर्माण में संघर्ष कम, मीडिया की हिस्सेदारी ज्यादा हो। जो संघर्ष की लंबी प्रक्रिया में सितारे के रूप में निर्मित नहीं हुआ हो, बल्कि एक आंदोलन से आकस्मिक तौर पर चर्चा व चमक में आ गया हो।

वाम राजनीति की नई जमीन तोड़ने में विफलता, ठहराव-गतिरोध की स्थिति और भाजपा के नेतृत्व में मनुवादी-सांप्रदायिक फासीवादी हमले के दौर में संपूर्ण विपक्षी राजनीति की अक्षमता-निराशाजनक राजनीतिक माहौल में वाम-लोकतांत्रिक दायरे में अब चमकते सितारों से उम्मीद बन रही है। नजरें जमीन के बजाय ऊपर की ओर देख रही हैं। खैर, उम्मीद तलाशती इस नजर के दायरे में तेजस्वी यादव और राहुल गांधी भी हैं! इस नजर पर कुछ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है!

भले ही आधिकारिक तौर पर सीपीआई ने घोषणा नहीं की हो,लेकिन कन्हैया और सीपीआई बेगूसराय में 2019 के चुनाव के लिहाज से सक्रिय है। बिहार में बेगूसराय से वामपंथ के चुनाव लड़ने और संभावित प्रत्याशी के बतौर कन्हैया चर्चा में हैं। अभी ऐसी चर्चा किसी सीट और प्रत्याशी को लेकर नहीं हो रही है।

महागठबंधन के स्तर पर तय नहीं हुआ है, लेकिन चर्चा इस स्तर पर है कि कन्हैया ही महागठबंधन से चुनाव लड़ेंगे। सीपीआई की ओर से भी बार-बार कहा जा रहा है कि सीपीआई और वामपंथी पार्टियों में लगभग सहमति है। लेकिन कन्हैया महागठबंधन के प्रत्याशी के बतौर लड़ेंगे।

सीपीआई के नेता कहते आ रहे हैं कि राजद और लालू यादव भी कन्हैया के चुनाव लड़ने पर सहमत हैं, लेकिन अभी इस दिशा में औपचारिक बातचीत शुरु नहीं हुई है।

पिछले दिनों कन्हैया की उम्मीदवारी पर लालू यादव की सहमति की मीडिया में आई खबरों का राजद की ओर से खंडन भी किया गया।

इस खबर के साथ ही पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे राजद प्रत्याशी तनवीर हसन पर भी चर्चा हुई। मुस्लिम प्रत्याशी की कुर्बानी की शर्त पर कन्हैया को प्रत्याशी बनाने पर सवाल भी खड़ा हुआ। ऐसे तो पिछले दौर की चुनावी उपलब्धियों के आधार पर देखें तो संभावित महागठबंधन में सीपीआई और कन्हैया की उम्मीदवारी का दावा कमजोर पड़ता है। सीपीआई के पास बेगूसराय क्षेत्र में कोई विधानसभा की सीट नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के खिलाफ राजद प्रत्याशी दूसरे स्थान पर थे और सीपीआई, जद-यू के साथ लड़कर तीसरे स्थान पर थी। लेकिन संभावित महागठबंधन में सीपीआई किसी सीट पर पहला दावा करेगी तो वह बेगूसराय ही होगी, यह लंबे समय से सीपीआई का मजबूत गढ़ रहा है और अभी भी सीपीआई वहीं उल्लेखनीय तौर पर अपने अतीत की उपलब्धियों के साथ मौजूद है।

ऐसे तो मुस्लिम नुमांइदगी की कुर्बानी पर राजद के लिए महागठबंधन की ओर से कन्हैया की उम्मीदवारी तय करना मुश्किल होगा।

लेकिन कहा जा रहा है कि भूमिहार सामाजिक आधार में सकारात्मक संदेश देने और कन्हैया के जरिए चुनावी सामाजिक समीकरण में भूमिहारों के एक हिस्से को खींच लाने की कोशिश में लालू यादव कन्हैया को महागठबंधन का प्रत्याशी बना सकते हैं। याद कीजिए जेएनयू घटनाक्रम के बाद जब कन्हैया पहली बार बिहार आए थे तो कन्हैया के मुलाकात के बाद लालू यादव ने कहा था- 'ब्रह्मर्षि समाज का होकर भी कन्हैया दबे-कुचलों की भाषा बोलते हैं।'

लालू यादव ने ब्रह्मर्षि पहचान पर खड़ा कर ही कन्हैया पर प्रतिक्रिया दी थी। इस पहचान के साथ वे महागठबंधन की ओर से कन्हैया को प्रत्याशी बना ही सकते हैं!

कन्हैया के बेगूसराय और बिहार में सक्रियता बढ़ने के साथ यह भी साफ दीखता है कि तेजस्वी यादव और राजद ने कन्हैया से एक दूरी बना रखी है। अभी पटना से लेकर बेगूसराय तक में कन्हैया पर हुए हमलों पर भी तेजस्वी यादव की ओर से प्रतिक्रिया नहीं आई। कहा जा रहा है कि तेजस्वी यादव बिहार में भाजपा विरोधी राजनीति के दायरे में अपने लिए कोई चुनौती खड़ा करना नहीं चाह रहे हैं। लेकिन अभी श्री कृष्ण सिंह की जयंती के कार्यक्रम में तेजस्वी यादव ने ब्रह्मर्षि समाज के प्रति प्रेम का इजहार किया है।

खैर जो भी, लेकिन कन्हैया और सीपीआई का जोर भी महागठबंधन का प्रत्याशी बनने पर ही है।

स्वतंत्र दावेदारी की स्पिरिट के साथ संसदीय चुनाव में कन्हैया और सीपीआई दांव लगाने के लिए तैयार नहीं है।

अंतिम तौर पर कन्हैया की उम्मीदवारी का फैसला राजद और लालू यादव ही करने जा रहे हैं।

इस तरह की चर्चा भी रही है कि कन्हैया खुद भी महागठबंधन के प्रत्याशी के बतौर ही चुनाव में जाना चाहते हैं ।

इससे कन्हैया की गढ़ी गई छवि और ऊंचाई पर खड़ी की गई उसकी लोकप्रियता व अपील की असलियत व खोखलापन बिखर कर सामने आती है। आज के समय के बड़े रेंज में जारी छात्र-युवा आंदोलन के अखिल भारतीय प्रतिनिधि के बतौर दीख रहे चेहरे की समर्पणकारी असलियत सामने आती है।

तो साफ तौर पर कन्हैया और सीपीआई की जद्दोजहद महागठबंधन के समीकरण में फिट बैठकर आगे की राजनीतिक यात्रा करने की है। साफ तौर सीपीआई के साथ कन्हैया की राजनीति का सार सामने आ जाता है।

यह नया चेहरा-चमकता सितारा भी कुछ नया नहीं करने जा रहा है। सीपीआई की पुरानी राजनीति का नया चैंपियन बनने की कोशिश में है।

वामपंथी-लोकतांत्रिक राजनीति को पुनर्जीवित/नया जीवन देने और जुझारु छात्र-युवा आंदोलन के प्रतिनिधि के बतौर मुख्य धारा की राजनीति में दावेदारी जतलाने व लोकतांत्रिक मूल्यों को विस्तार देने की हिम्मत के साथ खड़ा होने की संभावना व उम्मीद देखना मुश्किल है!

बेशक, भाजपा को हराने के नाम पर असलियत पर तत्काल परदा डाल ही लिया जा सकता है।

चलिए, कन्हैया की राजनीतिक यात्रा को पीछे लौटकर जेएनयू प्लेटफॉर्म से देखते हैं।

देशद्रोह के फर्जी मुकदमे में जेल जाने के बाद जेएनयू और जेएनयू से बाहर के प्रतिरोध ने कन्हैया को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित बना दिया। शुरुआती दौर में मीडिया के बड़े हिस्से ने नकारात्मक प्रचार किया।लेकिन जेल से आने के बाद मीडिया के बड़े हिस्से ने हीरो के रूप में पेश करना शुरु किया। कुल मिलाकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन और मीडिया के नकारात्मक-सकारात्मक प्रचार ने राष्ट्रीय चेहरा बना दिया। जेएनयू कैम्पस के दायरे का राजनीतिक चेहरा और जेएनयू छात्र संघ का अध्यक्ष अकस्मात राष्ट्रीय राजनीति का युवा चेहरा हो गया। सामान्य तौर पर इस ऊंचाई तक पहुंचना इतने कम समय व संघर्ष के छोटे अंतराल में संभव नहीं होता है।

जेल से बाहर आने के बाद छात्र-युवा आंदोलन व राजनीति से बाहर निकलते हुए मुख्य धारा की राजनीति की ओर उसने कदम बढ़ा दिया।

पहले अपने कुछ साथियों के साथ राहुल गांधी से मुलाकात की। बिहार पहुंचे तो लालू यादव, नीतीश कुमार और अन्य पार्टियों के नेताओं से मुलाकात की। अंत में वामपंथी पार्टियों के नेताओं से मिले। जद-यू नेता नीरज सिंह की अगवानी और सरकारी मेहमाननबाजी चर्चा में रही। सरकारी अतिथि के बतौर वह दीखे तो जद-यू के खास नेता की यात्रा में विशेष भूमिका चर्चा में रही। लालू यादव से मुलाकात तो पैर छूने के कारण खासा चर्चित हुआ। साथ शराब माफिया की मौजूदगी की भी चर्चा हुई। लालू यादव से मिलने के बाद कन्हैया का बयान आया कि मनुवादी-जातिवादी ताकतों से लड़कर लालू यादव ने समाजवाद को एक मुकाम तक पहुंचाया है। उसने सामाजिक न्याय की लड़ाई में लालू यादव से सहयोग मांगने का उल्लेख किया।

इस दरम्यान श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल के कार्यक्रम और उसके प्रचार-प्रसार ने भी उसके सरकारी पार्टी द्वारा प्रायोजित होने पर चर्चा को जन्म दिया।

जेल से निकलने के बाद बिहार तक पहुंचते हुए कन्हैया ने अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा और दिशा का इजहार कर दिया।

दरहकीकत, 'आजादी' और 'जय भीम-लाल सलाम' के नारे के साथ वामपंथी राजनीति को नये दौर में नये सिरे से गढ़ने की जद्दोजहद में उतरने के बजाय वह भाजपा विरोधी राजनीति में जगह बनाने और आगे बढ़ने के लिए परदे के पीछे पॉलिटिकल लॉबीईंग का मास्टर बनने की कोशिश में रहा है। उसके नारों-भाषणों और राजनीतिक व्यवहार में बड़ा गैप है! यह गैप तो चर्चित होने के बाद जेएनयू में ही खुलकर सामने आ गया है।

छात्र संघ चुनाव में वादे व दावे के अनुरूप अध्यक्ष के बतौर उसकी भूमिका सवालों के घेरे में रही है। लिंगदोह कमिटी की सिफारिशों का सवाल हो या फिर सामाजिक न्याय का सवाल हो और हाल के दौर में अनिवार्य अटेंडेंस विरोधी आंदोलन हो। वह अपनी जुबां से बुलंद करने वाले नारों से दूर खड़ा रहा है।

जेल से निकलने के बाद जेएनयू से बिहार तक पहुंचते हुए कन्हैया ने साफ तौर पर संकेत दे दिया है। उसकी पीठ वाम-लोकतांत्रिक आंदोलन व राजनीति की ओर है और चेहरा भाजपा विरोधी शासक वर्गीय विपक्षी राजनीति की ओर!

आगे बढ़ते हुए उसका पिछला पैर लेफ्ट की तरफ है और अगला राइट की ओर!

संभव है, वह तीव्र राजनीतिक महात्वाकांक्षा के साथ उसके शब्दों में 'कंफ्यूज्ड पार्टी ऑफ इंडिया'- सीपीआई की राजनीति के साथ भी लंबे समय तक कदमताल न कर पाए!

लेकिन तत्काल वह बेगूसराय के प्लेटफॉर्म पर है। सीपीआई के राजनीतिक मंच पर नायक के बतौर एक्ट कर रहा है। सीपीआई व वाम दायरे में उम्मीदों का यह सितारा बिहार की विपक्षी राजनीति की ड्राईविंग सीट पर जाने की महात्वाकांक्षा के साथ नीतीश कुमार के प्रति नरमी भी दिखा रहा है। उसका ताजा बयान संविधान बचाने के लिए नीतीश कुमार से भी उम्मीद करते हुए आया है!

कन्हैया कुमार की राजनीतिक यात्रा पर नजर दौड़ाइए, एक छात्र नेता फिर अचानक राजनेता की हैसियत में आने के बाद का सफर देखिए तो अवसरवादी राजनीतिक व्यवहार साफ दीखता है। वाम-लोकतांत्रिक आंदोलन को पुनर्जीवित/नया जीवन देने और जन राजनीति को बुलंद करने-गढ़ने की प्रतिबद्धता के बजाय भाजपा विरोधी राजनीति के दायरे में बड़ा चेहरा हो जाने की तीव्र राजनीतिक महात्वाकांक्षा ही सामने आती है। जिसके लिए जेएनयू शुरुआती दौर में एक प्लेटफॉर्म होता है और फरवरी आंदोलन एक मौका/अवसर!

अब बिहार का बेगूसराय प्लेटफॉर्म है, सीपीआई की अवसरवादी राजनीति की सवारी है। हमलों को राजनीतिक अवसर/मौका बनाने की कोशिश भी!

कन्हैया को राजनीतिक महात्वाकांक्षा के साथ शासकवर्गीय रेंज में भाजपा के साथ ही तेजस्वी यादव से भी लड़ना है।

जरूर ही भाजपा विरोधी लड़ाई में कन्हैया बनाम तेजस्वी यादव का संघर्ष छिपा रहेगा!

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