महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय : समस्या जहाज में है, कप्तान में नहीं

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय : समस्या जहाज में है, कप्तान में नहीं

(अथ श्री हिंदी विश्वविद्यालय कथा)

 संजीव ‘मजदूर’ झा

हिंदी विश्वविद्यालय और समस्या पिछले कई वर्षों से एक दूसरे के पर्याय बने हुए हैं. अजीब बात यह भी है कि जिस किसी ने भी इन समस्याओं को महसूस किया उसकी दिलचस्पी अस्वाभाविक रूप से समस्याओं को और अधिक बढ़ाने में ही रही है. पिछले 4-5 वर्षों की लगातार विफ़लता का श्रेय भी इस जहाजनुमा विश्वविद्यालय के कप्तान कुलपति पर मढ़ा जाता रहा है.

हमारे यहाँ कहावतों की कई श्रृंखलाओं में से एक के हिसाब से चलें तो किसी भी सेना की जीत-हार का संबंध सीधे सेनापति से होता है. लेकिन यह मध्ययुगीन मान्यताएं हैं क्योंकि सेना अगर रीढ़विहीन हो तो भला सेनापति ही क्या कर सकता है?

इसको ऐसे समझा जा सकता है कि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी में तो कोई कमी नहीं थी लेकिन उनके पीछे हम और आप जैसी सेनाएं ही तो थीं जो आज तक उनकी शहादत के बावजूद वह भारत नहीं बना पाए, जिसका सपना उन्होंने देखा था.

मसला साफ़ है कि फ़ौरी किस्म की स्थापनाओं से किसी समाज या संस्था का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता. जहाज में जब छिहत्तर छेद हों तो कोई कप्तान उसे डूबने से कैसे बचा सकता है?

हिंदी विश्वविद्यालय की समस्या यह है कि कप्तान की नियुक्ति से पहले और नियुक्ति के बाद दोनों समय में यहाँ की सेनाएं उसी डाल को काट रही थीं जिस पर उसका आशियाना टिका हुआ था. विश्वविद्यालय की ऐसी कोई घटना जिससे उसकी छवि धूमिल होती हो उस पर प्रायः सेनाओं का जवाब एक जैसा ही होता –  “अच्छा हुआ” . हाँ, यदा-कदा मूर्खों की भांति अपनी-अपनी प्रतिष्ठा के मुताबिक लोग चिंतित अवश्य दिखे. यह ठीक वैसा ही है जैसा कि अंग्रेजों के रिपोर्ट में उपनिवेशी दौर में कुछ बंगालियों के बारे में कहा गया था. उस रिपोर्ट का एक वाक्य बड़ा ही दिलचस्प है –“जिन बंगालियों को हम अपनी भाषा सिखा रहे हैं, वे अब दूसरे बंगालियों जिनमें हमारी भाषा का ज्ञान नहीं है, उसे वे अपने से हेय अर्थात् घृणा भरी नजरों से देखते हैं.”

किसी भी विश्वविद्यालय में कुलपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है लेकिन वह अपनी दृष्टि को तब तक जमीनी स्तर पर लागू नहीं कर सकता जब तक कि वहां के लोग सहयोग की भूमिका में न हो. यदि असफ़ल होने की स्थिति में वहां के लोग चिंतन के बजाय जश्न मनाने की मुद्रा में हो तो समझना आसान हो जाता है कि समस्या जहाज में है न कि कप्तान में. 

महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति प्रो.गिरीश्वर मिश्र की भूमिका एक कुलपति के तौर पर लगभग खत्म होने को है. उनके कार्यकाल के विवरण के मूल में यह प्रचारित किया जाना कि यह विश्वविद्यालय का सर्वाधिक खराब कार्यकाल रहा है, सिर्फ चिंता ही नहीं बल्कि चिंतन का भी विषय है.

कुलपति के आलोचकों के पास घटनाओं का विवरण है लेकिन उन घटनाओं की सटीक व्याख्या नहीं.

वर्तमान कुलपति ने जिस दिन विश्वविद्यालय में कदम रखा उसी दिन छात्र सड़क पर ब्रेकर की मांग हेतु वर्धा प्रशासन के विरुद्ध आंदोलन कर रहे थे. आन्दोलन के अगले दिन ही छात्रों पर वर्धा पुलिस प्रशासन द्वारा मुकदमा दर्ज किया गया. कुलपति की भूमिका यह रही कि छात्रों की ओर से मुक़दमे के लिए उन्होंने विश्वविद्यालय के खर्चे से वकील की सुविधा मुहैया करवाई और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका यह रही कि उन्होंने मुक़दमे में शामिल छात्रों की पूरी जानकारी वर्धा पुलिस को नियम के विरुद्ध जाकर मुहैया करवाई.

इस एक घटना से भी विश्वविद्यालय के माहौल और कुलपति के बीच के अंतर को समझा जा सकता है.

अगले ही दिन कुलपति ने छात्रों की एक सभा में कहा कि –“आप पढ़िए-लिखिए हम आपको सारी सुविधाएँ मुहैया कराने को तैयार हैं.”

कुलपति का ऐसा कहना ही नहीं था बल्कि इस पर अमल भी तेजी से शुरू हो गया. हर छोटी-बड़ी बात के लिए छात्र सीधे कुलपति से मिलने की सुविधा ले रहे थे. नियमित रूप से सभी विभागों में जाकर वहां के छात्रों से एक खास किस्म के संबंध स्थापित किए जा रहे थे. शोध विषय से लेकर शिक्षकों तक की सुविधा पर छात्रों से बात करने की एक खास परंपरा की शुरुआत भी हो रही थी.

इसी बीच कुछ और भी हो रहा था. कुछ शिक्षक कुलपति द्वारा इस व्यवहार को पागलपन की संज्ञा दे रहे थे तो कुछ विश्वविद्यालय की आलोचना के प्रति संकल्पित पत्रिकाओं के संपादक कुलपति की जाति ढूँढ रहे थे.

कई खेमे में पूर्व से विभाजित खेमा कुलपति के छात्र प्रेमी होने को पचा नहीं पा रहे थे. इसी बीच कुलपति ने शिक्षकों के हिसाब से एक और अव्यवहारिक कार्य शुरू कर दिया. वे अब लगातार ऐसे शिक्षकों के लिए श्राप सिद्ध होने लगे जिन्हें पढ़ने-पढ़ाने के नाम से बड़ा कोफ़्त होता था.

कुलपति साक्षर थे और उनके सहचर शिक्षकों में अधिकांश निरक्षर थे. लेकिन एक जगह कुलपति सपाट थे और शिक्षक उनसे बहुत आगे और वह मसला था राजनीति और कूटनीति का.

कुलपति राजनैतिक रूप से कमजोर और शैक्षणिक स्तर पर बहुत ऊँचे थे. राजनैतिक रूप से प्रबल शिक्षकों के पक्ष में पोल-खोल संपादक भी थे जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से कुलपति की चोटी और उनके ब्राह्मण जाति में पैदा होने जैसी दुर्लभ जानकारी भी प्राप्त कर ली थी. अब वे कब ब्राह्मण कुलपति कहे जाने लगे उन्हें भी इसका पता नहीं. शिक्षकों के लिए अभी तक वे मुश्किल ही पैदा कर रहे थे. ऐसे शिक्षकों के लिए वे खास अप्रिय थे जो स्वयं अज्ञानता के शिकार तो थे ही साथ ही छात्र और छात्राओं को भी अज्ञानता से भरे झूठे और फ़र्जी आंदोलनों में उलझाए रहते थे. उन्होंने युद्ध स्तर पर छात्रों को समझाया कि यह कुलपति आपकी जाति का तो है ही नहीं. छात्र तो छात्र ठहरे. वे जानते हैं कि कुलपति तो 5 वर्ष बाद चले जायेंगे उसके बाद तो ये शिक्षक ही रहेंगे, सो शिक्षकों से बैर रखना उचित नहीं. उन छात्रों के लिए तो कुलपति के मार्ग का अनुसरण करना तो और भी कठिन था जो पहले से ही जानते थे कि उनकी पी-एच.डी कम से कम पांच वर्ष में नहीं होने वाली.

कुलपति की गति स्वाभाविक रूप से डगमगाई और फिर विश्वविद्यालय का अपना स्वाभाविक खेल शुरू हुआ. छात्रों में मुकदमेबाजी, जातिगत मसले, धार्मिक असहिष्णुता वगैरह-वगैरह. यही वह दौर होता है जब प्रतिबद्ध संपादक अपना गेयर बदल कर चढ़ाई करते हैं. परिणाम फिर सालों साल पढाई लिखाई बंद.

एक अराजनैतिक कुलपति के लिए ऐसे में कार्य करना मुश्किल ही नहीं असंभव जैसा हो जाता है. जैसे ही कुलपति दवाब में आता है वैसे ही अपने अपने स्तर से लोग फायदा उठाना शुरू कर देते हैं. कुछ लोग अपने खिलाफ मुकदमा बंद करवा लेते हैं और कुछ लोग अपने अपने लिस्ट के शत्रुओं को किनारे करवा पाने में सफलता हासिल कर लेते हैं. इन सब के बीच कुलपति सिर्फ अपने जातिवादी होने के आरोप से बचने के लिए करवटें बदलता रह जाता है.

विश्वविद्यालयों में छात्रों की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है लेकिन इस विश्वविद्यालय की सर्वाधिक समस्या ही रही है छात्र विरोधी होना.

कुलपति गिरीश्वर मिश्र इस बात से तो परिचित थे कि छात्रों की अहमियत पहली प्राथमिकता होनी चाहिए लेकिन वे इस बात से अनभिज्ञ भी थे कि ऐसा करने से शिक्षकों के एक खास जमात के लिए वे दुश्मन साबित हो जाएंगे. शिक्षकों में भी मूल रूप से दो मानसिकता के लोग थे. एक वे जो बाहर से यहाँ आए थे (जो सीधे शिक्षक के रूप में आए) और दूसरे वे जो यहीं पढ़े और यहीं पढाए. ये दूसरे किस्म के शिक्षकों के मनोविज्ञान को समझना कितना कठिन है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुलपति स्वयं एक बड़े मनोविज्ञानी हैं लेकिन वे भी इनके मनोविज्ञान को समझने में लगभग असफ़ल ही रहे.

स्वाभाविक है खेल पहले से ही कई स्तर पर खेले जाते रहे और इस खेल में छात्र महज एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किए गए. लेफ्ट, राईट हो या नीला सलाम हो सभी छात्र दल शिक्षकों तक ही सीमित रहे. पिछले 5 वर्षों के सोशल मीडिया के पोस्ट को ही यदि अध्ययन का आधार बनाया जाए तो समझने में आसानी होती है कि व्यक्तिकता का ऐसा स्वरुप आखिर किन कारणों से विकसित हुआ? कम से कम इन स्थितियों के लिए तो कुलपति जिम्मेदार नहीं थे क्योंकि ऐसी स्थितियां तो उनके पूर्व भी थी. लेकिन वे शिक्षक अवश्य जिम्मेदार थे जिन्होंने यहीं से पढ़ा और यहीं पढ़ाया. इन्हीं शिक्षकों में से किसी एक ने वर्तमान छात्रों की पढ़ाई-लिखाई पर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि –“आज पहले जैसी स्थिति नहीं रही”. यह बड़ा ही नव-उपनिवेशवादी मामला है जहाँ शोषक शोषण पर गहराई से दुःख व्यक्त करता है. अरे भाई, जब आप ही थे और आप ही हैं, फ़िर जब स्थिति ख़राब हुई तो आप भूमिका से बाहर कैसे हुए?

छात्र-छात्राओं को अवसर मुहैया न होने देना, उन्हें मंच से दूर रखना, ज्ञान-विज्ञान की गतिविधि से वंचित रखना, उन्हें दास या नौकरों की भांति इस्तेमाल करना और छात्र-छात्राओं से प्रतिस्पर्धा करना कुलपति के आगमन से पूर्व भी रहा और उसके पश्चात भी जारी रहा. इस कार्य में कुलपति की भूमिका पर प्रश्न कम और शिक्षक-शिक्षिकाओं की भूमिका पर प्रश्न अधिक खड़ा करता है. क्या इस बात से कोई भी छात्र स्वयं इनकार कर सकता है कि उनके यहाँ एक दो शिक्षकों को छोड़ दिया जाए तो अन्य किस प्रकार से शिष्य और सेवक के बीच के अंतर को समाप्त किए हुए हैं. परिणाम यह निकला कि छात्र दिन ब दिन कमज़ोर होते गए. उनकी जानकारी का स्तर सिमटता गया. पढाई लिखाई का स्तर इतना कमजोर हो गया कि वे स्वयं अपनी डिग्री के अनुकूल खुद को समर्थ नहीं पा रहे हैं.

पी-एच.डी कर रहे अधिकांश शोधार्थियों का शोध समय समाप्त हो गया लेकिन उन्हें उनके शोध का निष्कर्ष नहीं मिल रहा. वे बार बार शोध निष्कर्ष के लिए अपने मालिक रूपी गाइड के चरणों में नजर टिकाते हैं लेकिन जिस शरीर के मस्तिष्क में ही निष्कर्ष नहीं है, उस शरीर के चरण या घुटनों में क्या नजर आने वाला है? देखते ही देखते सारा समूह जाति और बेवजह की लड़ाईयों में उलझ जाता है.

तो यह कि जब नॉन-परफॉर्मिंग लिस्ट में विश्वविद्यालय का नाम आता है तब शोक मनाने के बदले जश्न मनाया जाता है.

मैं नहीं समझता हूँ कि इन मसलों में शिक्षकों के अतिरिक्त किसी अन्य अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है. पांच वर्ष का यदि लाइब्रेरी का लेखा जोखा ही निकाला जाए तो समझ में आ जाता है कि इनकी बैठकी कहाँ कहाँ किस रूप में होती है. अधिकांश लिखते पढ़ते नहीं, कुछेक लिखते भी हैं तो दूसरों के लिखे हुए से चोरी करके और एक आध जो योग्य हैं उन्हें अयोग्य लोगों की इस भीड़ द्वारा हाशिये पर धकेल दिया जाता है.

किसी विश्वविद्यालय की ऐसी जमीनी हकीकत के बावजूद यदि कोई इन सारी अनुपलब्धियों का ठीकरा एक कुलपति पर फोड़ना चाहता है तो निश्चित रूप से उसकी दृष्टि में खतरनाक और अलगाववादी दोष है.    

विश्वविद्यालय प्रथमतः और अंततः छात्रों के लिए होता है. इस बात को कुलपति ने अपनी शुरूआती जर्नी में जितना समझा ठीक उसी रूप में स्थितियां इसके विपरीत थी इसलिए यह संभव ही नहीं था कि स्थितियों में सुधार आ जाए.

जो लोग आज यह कहते हैं कि पूर्व-कुलपति ही ठीक थे उनमें से अधिकांश पूर्व कुलपति के समय के सबसे बड़े भर्त्सनावादी ही थे.

ईमानदारी से यदि वर्तमान कुलपति के बारे में कहा जाए तो यह कहा जा सकता है कि शोध में प्रयोग दृष्टि चाहे वह मार्क्सवादी दृष्टि हो या अन्य उसके साहस पूर्ण प्रयोग और स्वीकार के लिए जमीन मुहैया करवाने की पहल वर्तमान कुलपति द्वारा ही की गई. जबकि मार्क्सवादी अप्रोच के शिक्षकों द्वारा कभी इस विषय को गंभीरता से नहीं लिया गया.

विश्वविद्यालय की जमीन वहां के छात्र-शिक्षकों से तैयार होती है, जिसके विकास में कुलपति की भूमिका तय होती है, लेकिन विकास की अवधारणा ही जहाँ कुंठित और विपरीत दिशा में हो वहां की स्थिति बद से बदतर ही हो सकती है. इसलिए विश्वविद्यालय के सन्दर्भ में और छात्र हित में यह जरुरी है कि सभी अपने अपने गिरेबान में झाँकने का प्रयास करे और यह गंभीरता से यह महसूस करे कि वे उस राष्ट्र के लाखों के वेतन-भोगी शिक्षक हैं जिस राष्ट्र की गरीबी और अव्यवस्था अपने चरम पर है.

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