Mamata Banerjee kee Strategy modei kee bjp Bengal mein aa jae vipaksh kee bhoomika mein

ममता बनर्जी की स्ट्रेटेजी मोदी की भाजपा बंगाल में आ जाए विपक्ष की भूमिका में

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी। जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Elections 2019) अपने अंतिम पड़ाव सातवें चरण की ओर बढ़ रहा है वैसे-वैसे ही सियासत के रंग भी बदलते दिखाई देने लगे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव 2014 (Lok Sabha Elections 2014) में जिस तरह से यूपी को साम्प्रदायिकता की आग में झोंककर सत्ता प्राप्त की थी, उसी तरह पश्चिम बंगाल (West Bengal) को साम्प्रदायिकता की आग (saampradaayikata kee aag) में झोंककर सत्ता में बने रहने का प्रयत्न किया जा रहा है अब देखना ये है कि क्या यूपी की तरह पश्चिम बंगाल में साम्प्रदायिकता (communalism) के सहारे सत्ता में बने रहा जा सकता है? क्या वहाँ ऐसा कुछ होने जा रहा है कि यूपी में हो रहे भयंकर नुक़सान की भरपाई हो जाए, जिसकी संभावना न के बराबर लग रही है।

असल में हो क्या रहा है ये गोदी मीडिया जनता को बताना नहीं चाह रहा है। सिर्फ़ वहाँ ध्रुवीकरण हो जाए, मीडिया इस काम को अंजाम देने में लगा है। नहीं तो सच ये है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ये चाहती है कि पश्चिम बंगाल की सियासत में लाल झण्डा और कांग्रेस विपक्ष की भूमिका से बाहर हो जाए और विपक्ष की भूमिका में मोदी की भाजपा आ जाए, जिसके बाद मुस्लिम वोटबैंक ममता के पाले में मज़बूती से खड़ा रहेगा। और यदि कामरेड या कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में रहते हैं तो मुसलमान ममता के पाले से भाग सकता है क्योंकि लाल झण्डा और कांग्रेस भी मुसलमानों की पसंद रही है। ममता की पार्टी से पूर्व मुसलमान इन्हीं पार्टियों में रहते थे और वो अब भी कब चले जाए इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। उसी की क़िले बंदी हो रही है।

रही बात मोदी की भाजपा की, उसके विपक्ष की भूमिका में आने के बाद एक बहुत बड़ा वोटबैंक ममता बनर्जी के पाले में सुरक्षित हो जाएगा और ममता बनर्जी का पश्चिम बंगाल की सियासत में कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।

अब बात कल की भाजपा और आज की मोदी की भाजपा की तो उसका तो जन्म ही भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने से हुआ है। अगर वो धार्मिक भावनाओं की बात न करे तो उसकी स्थिति दो सीट से ज़्यादा की नहीं है। सत्ता में बने रहना तो ख़्वाब ही बनकर रह जाएगा। तो ये खेल चल रहा है पश्चिम बंगाल को लेकर और गोदी मीडिया लगा है मोदी की भाजपा की और ममता बनर्जी की रणनीति को आगे बढ़ाने में।

वैसे तो 2014 के बाद से मीडिया ने अब तक जो भूमिका अदा की, उससे साफ ज़ाहिर होता है कि मीडिया क्या कर रहा है। आमजन का मीडिया पर जो यक़ीन हुआ करता था कि मीडिया सच बोलता है उससे अब आमजन का यक़ीन टूट गया है और ये सही भी है, आज के मीडिया और इससे पहले के मीडिया में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ हो गया है।

पहले मीडिया सच को सच बताने का प्रयास करता था और आज का मीडिया सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने में लगा रहता है। और यह ग़लीच मीडिया यही नहीं रूकता, देश में साम्प्रदायिक माहौल बना रहे, इसका भी पूरा ध्यान रखता है। ऐसे मुद्दों पर बहस कराता है जिसकी देश को ज़रूरत ही नहीं है, लेकिन इस तरह के कार्यक्रमों से उनके सियासी आका ख़ुश रहते हैं और देश बर्बादी की और जाता है, लेकिन उनको इससे कोई मतलब नहीं कि देश कहाँ जा रहा है।

जिस तरीक़े से पिछली बार यूपी को मोदी की भाजपा ने अपनी गंदी सियासत का हिस्सा बनाया था, उसी तरह बंगाल में भी साम्प्रदायिक खेल खेला जा रहा है लेकिन उसके बाद भी मोदी की भाजपा सत्ता में वापिस नहीं आने जा रही है, ऐसा सियासी पण्डित मान रहे हैं।

सियासी पण्डितों का तर्क है कि यूपी जैसा 80 सीटों वाला राज्य जहाँ से मोदी की भाजपा ने 73 सीट जीतकर केन्द्र की सत्ता की चाबी अपने हाथ में ली थी, इससे हटकर भी कई राज्य थे जहाँ मोदी की भाजपा ने साम्प्रदायिकता के सहारे बहुत बढ़िया प्रदर्शन किया था जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान व गुजरात में जहाँ पूरी-पूरी सीटें मोदी की भाजपा ने जीतने में कामयाबी प्राप्त की थी, लेकिन आज के सियासी हालात मोदी की भाजपा के वैसे नहीं है, जैसे 2014 में थे।

यूपी की अगर हम बात करें तो यहाँ मोदी की भाजपा को दस सीट जीतना भारी हो रहा है। यहाँ बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी और रालोद ने गठबंधन कर मोदी की भाजपा का चुनावी गणित बिगाड़ दिया है। इस गठबंधन के बारे में सियासी गुणाभाग करने वाले 50-60 सीट दे रहे हैं कुछ का तो कहना है कि गठबंधन इससे भी ज़्यादा सीट जीत सकता है और कांग्रेस भी सात से आठ सीट जीत सकती है। इस हिसाब से मोदी की भाजपा मुश्किल तमाम 10-12 सीट जीत सकती है। कहाँ 73 सीट और कहाँ 15 के अंदर या इससे भी कम।

ये हाल है यूपी में। ऐसा ही हाल अन्य प्रदेशों में है जहाँ 2014 में मोदी की भाजपा ने बढ़िया प्रदर्शन किया था। ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन नुक़सान वहाँ भी होने जा रहा है जो लगभग सौ सीट से ज़्यादा बैठ रहा है, उसकी भरपाई कहीं और से होती हुई नज़र नहीं आ रही है। इसलिए सियासी वैज्ञानिकों ने ये अनुमान लगाने शुरू कर दिए हैं कि मोदी की भाजपा की वापसी नहीं होने जा रही है।

कांग्रेस की न्याय योजना और क़र्ज़ माफ़ी भी मोदी की भाजपा पर भारी पड़ रही है। साम्प्रदायिक खेल भी नहीं चल पाया ये भी नुक़सान हुआ है। मोदी की भाजपा ने पूरी कोशिश की, किसी तरह चुनाव साम्प्रदायिक हो जाए, लेकिन जनता ने ये होने नहीं दिया जिसकी वजह से मोदी की भाजपा सत्ता से बाहर होने जा रही है।

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