Justice Markandey Katju

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बोले, मीडिया बिक चुका है, फ्री स्पीच पर पहरा है

नई दिल्ली, 22 अक्तूबर 2019. सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू का कहना है कि भारत में मीडिया लगभग बिक चुका है और फ्री स्पीच पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हमले हैं।

आजकल अमेरिका के कैलीफोर्निय में प्रवास कर रहे जस्टिस काटजू ने एक अंग्रेजी वेबसाइट पर लेख लिख कर इबादतखाना आंदोलन चलाने की घोषणा की है।

इबादतखाना आंदोलन क्या है, इसे उनके लेख से समझा जा सकता है। हम यहाँ उक्त लेख का भावानुवाद साभार दे रहे हैं।

इबादतखाना आंदोलन

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

9 नवंबर को कैलिफोर्निया के खाड़ी क्षेत्र से शुरू किया जाने वाला इबादतखाना आंदोलन, भारतीय उपमहाद्वीप की तकदीर में ऐतिहासिक महत्व का है।

जैसा कि मैंने indicanews.com में प्रकाशित अपने लेख ‘भारत का राष्ट्रीय उद्देश्य’ (‘India’s National Aim‘) में कहा है, इस दुनिया में वास्तव में दो दुनियाएँ हैं, विकसित देशों की दुनिया (उत्तरी अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और चीन), और अविकसित देशों की दुनिया, जिनमें भारत भी शामिल है।

हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य भारत को अविकसित देशों के रैंक से बदलना, और इसे विकसित, उच्च औद्योगिक देशों की रैंक में पहुंचाना होना चाहिए। ऐसा किए बिना, हम व्यापक गरीबी, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, बाल कुपोषण को रोकने के मामले में अकर्मण्य ही रहेंगे। हमारी 50% महिलाएं एनीमिक हैं, हमारे लोगों के लिए उचित स्वास्थ्य और शिक्षा की कमी है, किसानों का संकट (बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या) आदि बढ़ता जा रहा है। लेकिन इस राष्ट्रीय उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमें उन ताकतों ( जो नहीं चाहते कि भारत चीन की तरह एक उच्च विकसित, आधुनिक औद्योगिक विशालकाय के रूप में उभरे) के विरुद्ध एक शक्तिशाली क्रांतिकारी एकजुट संघर्ष की आवश्यकता होगी, जो इस प्रक्रिया का पुरजोर करेंगे। क्योंकि उन्हें डर है कि अगर ऐसा होता है तो उनके अपने निहित स्वार्थ प्रभावित होंगे।

अतः यदि भारत प्रगति और उक्त उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है तो राष्ट्रीय एकता बिल्कुल अनिवार्य है।

जैसा कि मेरे लेख ‘व्हाट इज इंडिया’ में कहा गया है, भारत मोटे तौर पर अप्रवासियों का देश है, जैसे उत्तरी अमेरिका, जिनकी 92-93% जनसंख्या अप्रवासियों के वंशज हैं (जिनमें से अधिकांश उत्तर पश्चिम से आए थे), और यह उनकी जबरदस्त विविधता के कारण बताता है।

इतने सारे धर्म, जाति, भाषा, जातीय और क्षेत्रीय समूह आदि, यह विविधता हमारे देश के दुश्मनों के लिए हमारे समाज को ध्रुवीकृत करने और हमारे बीच जाति, धार्मिक, भाषाई और जातीय घृणा फैलाने के लिए आसान बनाती है। सभी देशभक्त भारतीयों को इसे समझना चाहिए, और उन नापाक तत्वों को बेनकाब करना चाहिए जो हमें उसी तरह विभाजित करने की इच्छा रखते हैं, जिस तरह से अंग्रेजों ने हमें अपनी दुष्ट बांटो और राज करो नीति से विभाजित किया। दुर्भाग्य से आज भारत में, एक राजनीतिक दल सत्ता में है, जो अल्पसंख्यक विरोधी है (उनकी खोखली और भ्रामक बात ‘सबका साथ, सबका विकास’ के बावजूद)। जबसे यह पार्टी सत्ता में आई है, मुसलमानों की लिंचिंग और उन पर हमले बेरोकटोक हो रहे हैं और  ईसाई चर्चों में तोड़फोड़ की जा रही है। हमारे देश की मूल पहचान ‘अनेकता में एकता’ (country of diversity) पर यह हमले और अधिक विभाजित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, जैसा कि कुछ भाजपा नेताओं ने बीफ पर अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिबंध की मांग की है। यदि यह मांग लागू हो जाती है तो इसका मतलब होगा कि केरल और गोवा के लोगों के साथ उत्तर पूर्व के ईसाई लोगों, जो सस्ते प्रोटीन के स्रोत के रूप में गोमांस खाते हैं, को भारत से अलग करना।

Emperor Akbar built his famous ‘Ibadatkhana‘ or House of Worship in his new capital Fatehpur Sikri,

अपने लेख सम्राट अकबर में, मैंने चिन्हित किया है कि किस तरह महान सम्राट अकबर (1542-1605) भारत के वास्तविक राष्ट्रपिता ने भारत को सुलह-ए-कुल की अपनी नीति द्वारा, या सभी धर्मों के सार्वभौमिक स्वतंत्रता (16 वीं शताब्दी में जब यूरोपीय लोग धर्म के नाम पर एक-दूसरे का नरसंहार कर रहे थे) द्वारा एकजुट किया। और यही एकमात्र सही नीति है जो हमारे देश को एकजुट रख सकती है और इसे प्रगति के पथ पर ले जा सकती है। 1575 में, सम्राट अकबर ने अपनी नई राजधानी फतेहपुर सीकरी में अपना प्रसिद्ध ‘इबादतखाना’ या उपासनाघर (‘Ibadatkhana‘ or House of Worship) का निर्माण कराया, जिसमें विभिन्न धर्मों के विद्वानों ने एक-दूसरे से तर्कसंगत और सौहार्दपूर्वक चर्चा की और बताया कि प्रत्येक धर्म ने मानव जाति को लाभ पहुंचाने में योगदान दिया है। इसने हममें से कुछ को कैलिफोर्निया के इस खाड़ी क्षेत्र में आगामी 9 नवंबर को इबादतखाना समारोह के साथ के इबादतखाना आंदोलन शुरू करने की प्रेरणा दी। वास्तव में हमें यह विचार देने के लिए हम डलास के अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) के ऋणी हैं, क्योंकि वे डलास में वे 9 नवंबर को ईद-दिवाली समारोह मना रहे हैं।

दीवाली 27 अक्टूबर को है, ईद-मिलाद-उन नबी या ईद अल मिलाद (पैगंबर मुहम्मद का जन्मदिन) 10 नवंबर को है, गुरुपर्व या गुरु नानक देव का जन्मदिन 12 नवंबर को है, और क्रिसमस 25 दिसंबर को है। इसलिए हमने खाड़ी क्षेत्र में डलास में अनिवासी भारतीयों की अवधारणा पर विस्तार करने का निर्णय लिया, और दिवाली और ईद उन नबी के अलावा, 9 नवंबर को गुरपुरब और क्रिसमस भी मनाने का निर्णय किया। हम पूरी दुनिया के, विशेषकर उत्तरी अमेरिका में भारतीयों का, आव्हान करते हैं कि वह भी 9 नवंबर को इबादतखाना समारोह आयोजित करें। इबादतखाना कमेटी के चेयरमैन तसव्वर जलाली से उनकी आईडी tjalali17@gmail.com और tsj494@g.harvard.edu पर इसका विवरण लिया जा सकता है कि इबादतखाना समारोह कैसे मनाया जाए।

भारत आज अपने 5000 साल पुराने ज्ञात इतिहास के चौराहे पर खड़ा है। यह या तो अपने वर्तमान नव-फासीवादी प्रतिक्रियावादी नेताओं द्वारा निर्धारित रास्ते पर चल सकता है या यह सभी समुदायों, समूहों और संप्रदायों को समान सम्मान देने के महान सम्राट अकबर द्वारा दिखाए गए सही रास्ते पर चल सकता है।

वर्तमान नव-फासीवादी प्रतिक्रियावादी नेताओं द्वारा निर्धारित रास्ते पर चलने का अर्थ है अल्पसंख्यकों (विशेषकर मुसलमानों) पर अत्याचार करना, उन्हें हाशिए पर रखना और उन्हें अलग-थलग करना और उन्हें सार्वजनिक जीवन में कोई स्थान नहीं देना। हालाँकि भारत के 135 करोड़ लोगों में से 80% हिंदू हैं, 20% गैर हिंदू हैं। वर्तमान स्थिति के तहत, इन 20% को केवल दूसरी श्रेणी (यदि तीसरी श्रेणी नहीं) नागरिक माना जाता है, जो हिंदू बहुसंख्यक (नाजी जर्मनी के तहत यहूदियों की तरह) के हमले के निरंतर डर में रहते हैं।

वास्तव में भारत में सत्तारूढ़ दल केवल हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने का दिखावा करता है। इसके नेताओं को अतीत के महान हिंदू बौद्धिकता के बारे में कम जानकारी है (देखिए मेरे लेख – संस्कृत विज्ञान की भाषा और भारत कभी विज्ञान में अग्रणी था)। उनके मन-मस्तिष्क में सभी अल्पसंख्यकों से नफरत भरी हुई है।

दूसरा रास्ता, जिसे बादशाह अकबर ने दिखाया था, वह मार्ग है जो इबादतखाना आंदोलन, जिसे कैलिफोर्निया के खाड़ी क्षेत्र में कुछ एनआरआई द्वारा शुरू किया गया है। यह भारत को एकजुट रखने, सहिष्णुता और सभी धर्मों और समुदायों को समान सम्मान देने का मार्ग है।

इबादतखाना आंदोलन में हम भारत के वर्तमान राजनीतिक नेताओं द्वारा किए जा रहे धार्मिक घृणा और ध्रुवीकरण और असहिष्णुता के मार्ग का मुकाबला करेंगे। हमने भारत के बाहर से इबादतखाना आंदोलन शुरू किया है, हालांकि यह भारत से संबंधित है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत में मौजूदा साम्प्रदायिक माहौल में है, भारत में इसे वहां से लॉन्च करने के लिए कोई खाली जगह नहीं थी। भारत में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से फ्री स्पीच पर संकट है। और मीडिया काफी हद तक बिक चुका है। इसलिए उपलब्ध सर्वोत्तम स्थान अमेरिका के मुक्त वातावरण में है।

तसव्वर जलाली की अध्यक्षता में पहले से ही कई तैयारी बैठकें हो चुकी हैं, और अगले दिन मंगलवार 22 अक्टूबर को सैन जोस में होगी। वे सभी जो भारत से प्यार करते हैं (जिसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश शामिल हैं) और इसे समृद्ध देखना चाहते हैं, उन्हें इबादतखाना आंदोलन में शामिल होने के लिए, और पूरी दुनिया में 9 नवंबर को इबादतखाना फंक्शंस आयोजित करने के लिए आमंत्रित किया जाता है ।

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