mob lynching in khunti district of jharkhand one dead two injured

झारखंड में फिर लिंचिंग एक की मौत दो मरने का इंतजार कर रहे, ग्लैडसन डुंगडुंग बोले ये राज्य प्रायोजित हिंसा और हत्या है

नई दिल्ली, 23 सितंबर 2019. झारखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। प्रमुख आदिवासी एक्टिविस्ट ग्लैडसन डुंगडुंग ने इन हत्याओं को राज्य प्रायोजित हिंसा और हत्या बताया है।

श्री डुंगडुंग ने अपनी एफबी टाइमलाइन पर प्रभात खबर में प्रकाशित एक समाचार का लिंक शेयर किया है, जिसके मुताबिक

“झारखंड की राजधानी से सटे खूंटी जिला में गोकशी के संदेह में भीड़ ने तीन लोगों को बेरहमी से पीट दिया. इसमें एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गये. दोनों का रांची स्थित राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (रिम्स) में इलाज चल रहा है. पुलिस ने पूछताछ के लिए पांच लोगों को हिरासत में लिया है. पुलिस ने कहा है कि दोषी लोगों को बख्शा नहीं जायेगा. उनकी पहचान की जा रही है.

घटना रविवार सुबह 10 हुई, जब कर्रा थाना क्षेत्र के सुवारी जलटंडा में मवेशी काटने के मामले में उग्र भीड़ ने तीन लोगों को पीटना शुरू कर दिया. तीनों लोगों के नाम केलेम बारला, फागू कच्छप और फिलिप होरो हैं. लोगों की पिटाई से गंभीर रूप से घायल तीनों को रांची के रिम्स अस्पातल में भेज दिया गया.”

श्री डुंगडुंग ने कहा कि ‘‘भोजन का अधिकार’’ देश के प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के द्वारा प्रदान किया गया है, जिसे सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। एक व्यक्ति क्या खायेगा और क्या नहीं खायेगा यह उसका निजी मामला है। इसलिए सरकार या कोई संगठन तय नहीं कर सकते हैं कि लोगों को क्या खाना है और क्या नहीं खाना। मैं बीफ के नाम पर किये गये मॉब लिंचिंग का कठोर निंदा करता हूँ। झारखंड में बीफ के नाम पर किया जा रहा मॉब लिंचिंग असल में राज्य प्रायोजित हिंसा और हत्या है।

उन्होंने कहा कि “झारखंड में कई समुदायों के लोग सदियों से बीफ खाते रहे हैं क्योंकि यह प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत है लेकिन तब न किसी को तकलीफ थी और न ही किसी ने बीफ खाने वालों के साथ मार-पीट की। लेकिन पिछले दो वर्षों से बीफ के नाम पर मारपीट और हत्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं क्योंकि राज्य सरकार ने गोरक्षा कानून बनाकर तथाकथित गोरक्षों को इस तरह के अमानवीय कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया है।”

श्री डुंगडुंग ने कहा कि ‘‘बीफ को लेकर हमारे आदिवासी समाज में सहिष्णुता हमेशा से रही है। जैसे हमारे खड़िया आदिवासी समुदाय में बीफ खाने पर प्रतिबंध है क्योंकि हम लोग गाय-बैलों को परिवार का हिस्सा मानते हैं लेकिन हमारे आस-पास अन्य समुदायों के लोगों का बीफ खाने पर हमें कोई तकलीफ नहीं है बल्कि हम उनके साथ मेल-प्रेम से रहते हैं। उनके बीफ खाने से हमारे भावनाओं को कोई ठेस नहीं पहुंचता है। क्या बीफ के नाम पर राज्य में हिंसा करने वाले लोग सहिष्णुता का पाठ आदिवासियों से नहीं सीख सकते हैं? ”

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