Shailendra Dubey. ऑल इण्डिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे
ऑल इण्डिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे

बिजली के निजीकरण के विरोध में राष्ट्रव्यापी आन्दोलन करेंगे बिजली कर्मचारी

इलेक्ट्रीसिटी एक्ट में संशोधन का बिल संसद में रखे जाने के पहले बिजली कर्मचारियों से बात की जाये… बिजली आपूर्ति का निजीकरण स्वीकार्य नहीं… निजीकरण की किसी भी कार्यवाही के विरोध में राष्ट्रव्यापी आन्दोलन होगा

लखनऊ, 29 सितंबर 2019. बिजली आपूर्ति का निजीकरण करने के उद्देश्य से इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 में किए जाने वाले संशोधन के विरोध में बिजली कर्मचारियों एवं अभियंताओं ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।

ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने केंद्रीय विद्युत मंत्री आरके सिंह के इस वक्तव्य कि लोकसभा के संसद के शीतकालीन सत्र में इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 में संशोधन कर नया एक्ट बनाने हेतु बिल रखा जाएगा, पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आज कहा कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट में संशोधन की कवायद मुख्यतः बिजली आपूर्ति और वितरण का कार्य अलग कर बिजली आपूर्ति को निजी क्षेत्र को सौंपने की केंद्र सरकार की योजना है जिसका प्रबल विरोध किया जायेगा।

Privatization of electricity supply is not in the national interest

ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने आज यहां जारी एक बयान में कहा कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट संशोधित करने के किसी भी बिल को लोकसभा में रखे जाने के पहले बिजली कर्मचारियों अभियंताओं और आम उपभोक्ताओं से बात किया जाना जरूरी है। क्योंकि बिजली आपूर्ति के निजीकरण (Privatization of power supply) से सबसे अधिक कर्मचारी और उपभोक्ता ही प्रभावित होने वाले हैं। उन्होंने कहा कि भयंकर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहे पावर सेक्टर में अधिक राजस्व वाले क्षेत्र की आपूर्ति का काम निजी घरानों को सौंपने से पावर सेक्टर पूरी तरह आर्थिक रूप से दिवालिया हो जाएगा। अतः मौजूदा परिस्थितियों में बिजली आपूर्ति का निजीकरण राष्ट्र हित में नहीं है।

उन्होंने कहा कि बिजली क्षेत्र में घाटे और बिजली की अधिक लागत के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ऊर्जा नीति जिम्मेदार है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा सोलर व विंड पावर की खरीद के लिए निजी घरानों से ऊंची दरों पर 25 साल के करार किये गए हैं और आज उससे कहीं सस्ती दरों पर बिजली उपलब्ध होने के बावजूद केंद्र सरकार इन करारों की पुनरसमीक्षा नहीं होने दे रही है। इसी प्रकार उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट मे कोई भी संशोधन किए जाने के पहले जरूरी है कि राज्य बिजली बोर्डों के विघटन के बाद कंपनियां बनाए जाने से बढ़ने वाले घाटे की कार्यप्रणाली की पुन: समीक्षा की जाए। इसी प्रकार उड़ीसा और दिल्ली में हुए निजीकरण की विफलता की पूर्ण समीक्षा भी जरूरी है साथ ही शहरी क्षेत्रों को निजी फ्रेंचाइजी को सौंपे जाने की भी समीक्षा की जानी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि बिजली बोर्डों के विघटन व निजीकरण के प्रयोग पूरी तरह विफल रहे हैं, ऐसे में इलेक्ट्रिसिटी एक्ट में संशोधन कर बिजली आपूर्ति के निजीकरण का एक और प्रयोग ऊर्जा क्षेत्र के लिए अत्यंत घातक और आत्मघाती सिद्ध होगा।

उन्होंने केंद्रीय विद्युत मंत्री से अपील की है कि इस बाबत बिजली कर्मचारियों और अभियंताओं से तत्काल वार्ता प्रारंभ की जाए।

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