Noman Masood Gangoh चित्र फेसबुक पेज "नोमान मसूद गंगोह विधानसभा" से साभार
चित्र फेसबुक पेज "नोमान मसूद गंगोह विधानसभा" से साभार

चुनाव हारे नहीं नोमान मसूद बल्कि भाई इमरान मसूद की साज़िश का शिकार हुए ?

चुनाव हारे नहीं नोमान मसूद बल्कि भाई इमरान मसूद की साज़िश का शिकार हुए ?

सहारनपुर में भाई इमरान मसूद की साज़िश का शिकार हो गए काजी नोमान मसूद ?

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी। दो राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव और यूपी में हुए उपचुनावों (UP Assembly byPoll Election 2019) से एक बात तो साफ़ हो गई कि साम्प्रदायिकता को हथियार बनाकर चुनाव लड़ने वालों को जनता ने आईना दिखाया है कि सिर्फ़ हिन्दू-मुसलमान व पाकिस्तान करने से काम नहीं चलेगा ज़मीन पर काम करना होगा। हालाँकि मोदी की भाजपा दोनों प्रदेशों में और यूपी के उपचुनावों में ज़्यादा सीटें हासिल करने में कामयाब रही, ये भी एक सच्चाई है, लेकिन इस सच्चाई में एक संदेश भी छिपा है जिसे राजनीति के जानकार समझ रहे हैं।

जिस तरह के सर्वे दिखाए जा रहे थे कि मोदी की भाजपा बहुत बड़े पैमाने पर जीत दर्ज कर विपक्ष को बेजान बनाने जा रही है, ऐसा नहीं हुआ है। जनता ने मोदी की भाजपा को सरकार बनाने का अवसर तो दिया लेकिन बहुत खींच तान के हरियाणा में तो निर्दलियों गोपाल कांडा जैसों तक पर डोरे डालने को मजबूर किया। फ़ज़ीहत होने पर क़दम पीछे करने के लिए मजबूर होना पड़ा, फिर भी करना पड़ा समझौता ही। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल काट रहे अजय चौटाला को जेल से बाहर भेजना पड़ा और दुष्यंत चौटाला को उप मुख्यमंत्री के पद से नवाज़ना पड़ा और महाराष्ट्र में शिवसेना को साथ लेकर चलने को विवश किया।

हालाँकि शिवसेना अभी भी मोदी की भाजपा के ख़िलाफ़ बोल रही है लेकिन फिर भी सरकार बन ही जाएगी, ऐसा माना जा रहा है।

यूपी की जिन सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें सात मोदी की भाजपा व एक सीट उसकी सहयोगी अपना दल जीतने में कामयाब रही और तीन सीटें सपा को मिली हैं, जिसमें एक सीट रामपुर आज़म ख़ान वाली उसकी ही थी, जहाँ आज़म खान की पत्नी तजीन फ़ातिमा ने जीत दर्ज कर मोदी की भाजपा को आईना दिखाया और दो सीट उसने अलग-अलग दलों से छीनी हैं, जिसमें एक मोदी की भाजपा से और एक बसपा से छीनने में सपा कामयाब रही है जबकि बसपा और कांग्रेस का प्रदर्शन काफ़ी निराशाजनक रहा है।

अगर वोट प्रतिशत की वृद्धि के बारे में बात की जाए तो मोदी की भाजपा के वोटबैंक में 14% की गिरावट दर्ज की गई है जो अपने आप में एक संदेश है और सपा के वोटबैंक में 4% का उछाल आया है और कांग्रेस के वोटबैंक में भी 7% का उछाल आया है। बसपा के वोटबैंक में न कमी और न बढ़ोतरी हुई है वो अपनी जगह खड़ी दिखाई दी है।

एक और बात साफ़ हुई है यूपी में सपा एकला चलो के फ़ार्मूले पर चलकर ही कुछ कर सकती है, ये बात उपचुनाव की तीन सीटें जीतने और एक सीट वह मामूली अंतर से हार गई। जबकि कांग्रेस सहारनपुर की गंगोह सीट पर नंबर दो रही।

Gangoh Assembly Seat By Election Result 2019

गंगोह में कांग्रेस के ठेकेदार इमरान मसूद का कहना है कि प्रशासन ने जबरन हराया है। जहां तक उनके आरोप की बात है उसमें कोई जान नहीं है। काजी परिवार 2012 से लगातार चुनाव हारता चला आ रहा है। मुसलमानों और पार्टी नेतृत्व को गुमराह करने के लिए यह परिवार ऐसी बातें कर रहा है जिससे मुसलमान और पार्टी नेतृत्व किसी अन्य व्यक्ति पर विचार न करें।

सहारनपुर नगर निगम के मेयर चुनाव में बसपा के प्रत्याशी रहे हाजी फजलूर्रहमान मोदी की भाजपा से लगभग 1900 सौ वोटों से हार गए थे इसके बाद हाजी फजलूर्रहमान लोकसभा के चुनाव में बसपा के प्रत्याशी बनाए गए थे और जीते भी थे, लेकिन इमरान मसूद चुनाव के दौरान प्रचार करते हुए कहते थे कि वह क्या चुनाव लड़ेंगे जो मेयर की कुर्सी जीती हुई हार आए थे, उनको अपनी फ़ैक्ट्री बचानी थी।

इमरान मसूद तो सहारनपुर का सिकंदर हैं ! Imran Masood is Alexander of Saharanpur!

अब सवाल उठ रहा है कि हाजी फजलूर्रहमान की तो फ़ैक्ट्री थी उसे बचाने के लिए जीती हुई सीट हार गए थे, लेकिन इमरान मसूद तो अपने आपको सहारनपुर का सिकंदर समझता है फिर वो क्यों जीती हुई गंगोह विधानसभा सीट हार गए? इसका जवाब इमरान मसूद नहीं दे पा रहे हैं। जबकि सच्चाई तब भी अलग थी और आज भी अलग है।

इस परिवार के सदस्य इमरान मसूद के नाम पर हिन्दू वोट नहीं मिलता, जिसकी वजह से मसूद परिवार मुसलमान के वोट तक ही सीमित रह जाता है। इस बार हिन्दू वोट ने सपा के चौधरी इन्द्रसेन को चालीस हज़ार से अधिक वोट दे दिए, पन्द्रह हज़ार के लगभग मुसलमान का वोट सपा को मिल गया जिसकी वजह से नोमान मसूद गंगोह चालीस हज़ार से ज़्यादा मतों से पराजित होने से रह गए और मात्र पाँच हज़ार से ही हार पाए।

जिस हार की चुनाव से पूर्व ही कल्पना की जा रही थी उस हार पर इमरान मसूद का ये कहना कि हमें जबरन हरा दिया है किसी के गले नहीं उतर रहा है।

असलियत सामने आ रही है कि नोमान मसूद बसपा से चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जा रहे थे ( बसपा से नोमान मसूद जीत भी जाते, इसमें कोई शक भी नहीं है) लेकिन इमरान मसूद ये नहीं चाहते कि परिवार का कोई अन्य सदस्य या ग़ैर परिवार का कोई सदस्य चुनाव जीते, इसी लिए वह इस तरह की सियासत करते हैं।

नोमान मसूद चुनाव हारे नहीं है बल्कि भाई इमरान मसूद की साज़िश का शिकार हुए हैं ?

यह कड़वा सच है उसकी वजह ये है कि नोमान मसूद के दिमाग़ में ये न आ जाए कि मुझे बसपा से नहीं लड़ने दिया नहीं तो मैं विधायक होता ?

इमरान मसूद ये चाहते थे कि नोमान मसूद चुनाव भी लड़े और हार भी हो, बस वही हुआ और कुछ नहीं। सहारनपुर की सियासत में ये ऐसा व्यक्ति बन गया है जो ख़ुद जीतेगा नहीं और किसी को जीतने भी नहीं देगा।

सहारनपुर की जनता को अपनी सियासी ज़मीन इमरान मसूद से अलग बनानी होगी तभी सहारनपुर की अवाम को मोदी की भाजपा पर जीत हासिल करने में कामयाबी मिल सकती है, नहीं तो नंबर दो पर रहने का चुनाव लड़ते रहोगे यही सच है।

लोकसभा के चुनाव में इमरान मसूद के ढोंग में सहारनपुर का मुसलमान नहीं फँसा, इस लिए हाजी फजलूर्रहमान सांसद बन गए। जब-जब इमरान मसूद के फेर में सहारनपुर का मुसलमान और सेकुलर वोटर फँसा तब-तब वहाँ के सेकुलर वोट की हार हुई।

सहारनपुर की सियासत में वहाँ के वोटर को सियासी रूप से ठगता रहेगा इमरान मसूद ?

इससे बचने का रास्ता तलाश करना होगा। मुसलमान और सेकुलर हिन्दू मिलकर इस पर विचार कर रहे हैं। चुनाव में हार ही हार को सहन करते हुए सहारनपुर की अवाम थक गई है, इसी लिए इमरान मसूद ने जबरन हराने का ढोंग किया है। यह इमरान मसूद की लगातार पाँचवीं हार है।

Noman Masood did not lose the election but became the victim of the conspiracy of brother Imran Masood?

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