Yameen Ansari - डॉ. यामीन अंसारी (लेखक उर्दू अख़बार इंकलाब के रेजीडेंट एडिटर हैं।)

अब समय शुरू होता है मतदाताओं की आज़माइश का

देश में अगली सरकार बनाने का सपना लिए कांग्रेस ने अपने वादों का पिटारा खोल दिया है। 2014 के आम चुनाव (General election of 2014) में भाजपा (BJP) द्वारा ठगी गई जनता अब कांग्रेस (Congress) पर कितना विश्वास करती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, पर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र (election manifesto) में जिन बिंदुओं को शामिल किया है और जिन समस्याओं को प्राथमिकता दी है, वह काबिले तारीफ है। वैसे कांग्रेस एक बार फिर वही ग़लतियाँ कर रही है जो न केवल उसे, बल्कि अन्य विपक्षी दलों को कमजोर करने का काम करेंगी। बात चाहे विपक्षी दलों से गठबंधन की हो, या फिर उम्मीदवारों के चयन की, हर जगह कांग्रेस ने देश के हितों से ज्यादा अपने हितों को प्राथमिकता दी है। देश की शांतिप्रिय जनता को उम्मीद थी कि इस बार साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने के लिए धर्मनिरपेक्ष और समान विचार वोले दल राष्ट्रीय स्तर पर एक मोर्चा बनाएंगे और वैमनस्य फैलाने और देश को तोड़ने वाली ताकतों को पराजित करेंगी, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। कहीं-कहीं गठबंधन या एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बात हो रही है, वहाँ भी मतदाताओं का ही डर है कि कहीं वह पार्टियों से नाराज़ होकर विरोधी दलों का रुख न कर लें।

इसमें कोई संदेह नहीं कि मौजूदा आम चुनाव बेशक देश का भाग्य लिखेंगे। यह चुनाव तय कर देंगे कि देश किस दिशा में जाएगा। आने वाले चुनाव परिणाम बताएंगे कि भारतीय जनता आखिर क्या चाहती है। अगले कुछ दिनों में यह भी तय हो जाएगा कि सत्ता के शिखर पर घृणा, हिंसा और वैमनस्य फैलाने वाली शक्तियां विराजमान होंगी या फिर देश को भय और आतंक के वातावरण से निकालने वाली शक्तियां सत्ता संभालेंगी।

इस बार यह भी तय हो जाएगा कि देश में न्याय और संविधान की सर्वोच्चता स्थापित होगी या फिर किसी विशेष विचारधारा या दल के लोगों की राय देश पर थोपी जाएगी। लेकिन यह सब आखिरकार इस देश के मतदाताओं को ही तय करना है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक भारत की तक़दीर संवारने या बिगाड़ने की अस्ल शक्ति तो जनता के हाथ में ही है। वैसे तो विपक्षी दलों का लक्ष्य भी यही लगता है कि वह साम्प्रदायिक शक्तियों को किसी भी कीमत पर सत्ता से बेदखल करने का इरादा रखती हैं। इसका नज़ारा पहले कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल एस की गठबंधन सरकार की ताजपोशी के समय देखने को मिला, जब लगभग देश के सभी विपक्षी दलों के महत्वपूर्ण नेता एक मंच पर एकत्र हुए और एक दूसरे का हाथ पकड़ कर इस बात का संकल्प लिया कि देश से सांप्रदायिक शक्तियों को उखाड़ फेंकना है। इसके बाद कोलकाता में ममता बनर्जी ने एक बार फिर सभी प्रमुख विपक्षी दलों को एक मंच पर जमा करके देश की शांतिप्रिय जनता की उम्मीदों को बढाया और इस बात को दोहराया कि हम सब का एक ही उद्देश्य है कि देश को सांप्रदायिक उन्माद और नफरत की आग से कैसे बचाया जाए। अहिंसा में विश्वास रखने वाली देश की जनता को लगने लगा कि अब वह दिन दूर नहीं कि देश एक बार फिर शांति और विकास व समृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ेगा। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव की तिथि नज़दीक आती गई, फिर व्यावहारिक रूप से इन दलों की असली परीक्षा शुरू हुई तो जनता की उम्मीदों को झटका लगने लगा। देश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले अहम राज्यों यूपी, बिहार, बंगाल, असम, केरल, आंध्र प्रदेश आदि सो बहुत उत्साहवर्धक खबरें नहीं आईं। ये वह राज्य हैं, जो किसी भी पार्टी या गठबंधन को केंद्र की सत्ता तक पहुंचा सकते हैं और सत्ता से वंचित भी कर सकते हैं। चुनाव से पहले धर्मनिरपेक्ष दलों ने जिस प्रकार के वादे किए थे और अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्यागने का वादा किया था, सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन का समय आते-आते वह सब दम तोड़ने लगे। अक्सर धर्मनिरपेक्ष दलों ने न तो अपने हितों को छोड़ा और न ही देश और जनता के हित में कोई उल्लेखनीय फैसला किया। इसमें कोई शक नहीं कि अगर सभी धर्मनिरपेक्ष दल अपने अपने हितों को छोड़ कर भाजपा को हराने के लिए कोई समझौता करते, तो निश्चित रूप से यह देश के लिए बेहतर साबित हो सकता था और आगामी चुनाव के परिणाम कुछ बेहतर हो सकते थे। 2014 में जब लगभग सभी महत्वपूर्ण धर्मनिरपेक्ष दल अलग अलग चुनाव मैदान में उतरे थे और दूसरी तरफ भाजपा थी, लेकिन भाजपा सिर्फ 31 प्रतिशत वोट हासिल करके भारी बहुमत के साथ सत्ता में आ गई और अन्य विपक्षी दल 69 प्रतिशत वोट हासिल करके भी सत्ता से दूर रहे। इसलिए इस बार सुनहरा मौका था कि 69 प्रतिशत वोटों को बिखरने से बचाने के लिए धर्मनिरपेक्ष दल एकजुट होकर चुनाव लड़ते और 31 प्रतिशत वोट पाने वाली भाजपा को सत्ता में वापसी से वंचित कर देते।

देश की राजनीति में यह मशहूर है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर जाता है। इसमें कोई संदेह भी नहीं है। क्योंकि पिछली बार भाजपा ने 80 संसदीय सीटों वाले यूपी से 73 सीटें जीत ली थीं। इन्हीं 73 सीटों ने भाजपा को भारी बहुमत दिलाया और केंद्र में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। इस बार हालांकि यहां तस्वीर कुछ बदली हुई है। राज्य के दो महत्वपूर्ण धर्मनिरपेक्ष दलों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन करके भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, लेकिन कांग्रेस के पूरे दमखम के साथ अलग मैदान में होने के कारण सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई कुछ कमजोर हुई है। इसी प्रकार बिहार में विपक्षी दलों का ‘महागठबंधन’ तो बना, लेकिन वह एका और वह उत्साह नज़र नहीं आया, जिसकी यहाँ ज़रूरत थी। अंत तक पहले सीटों के बंटवारे और फिर टिकट बंटवारे पर जिस तरह खींचतान देखने को मिली, उसे बहुत आशाजनक नहीं कही जा सकता। पश्चिम बंगाल में भी कोई मजबूत धर्मनिरपेक्ष गठबंधन अस्तित्व में नहीं आ सका। असम में एक बार फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है। एआईयूडीएफ और कांग्रेस अलग मैदान में हैं, जबकि दूसरी ओर भाजपा मजबूती के साथ ताल ठोंक रही है। तमिलनाडु और कर्नाटक में ज़रूर कांग्रेस ने मजबूत गठबंधन करके कुछ उम्मीद की किरण पैदा की है, पर राहुल गांधी ने वाम मोर्चे के दबदबे वाले राज्य केरल में उम्मीदवारी की घोषणा करके यहां विपक्ष को कमजोर करने का काम किया है। इस फैसले से ऐसा संदेश मिलता है कि कांग्रेस का एकमात्र उद्देश्य भाजपा को हराना नहीं बल्कि खुद को मजबूत करना अधिक है। राहुल गांधी को अगर भाजपा को अपनी ताकत का अहसास कराना था तो अमेठी के बाद गुजरात, मध्यप्रदेश या राजस्थान जैसे राज्यों से दूसरी सीट पर मैदान में उतरना चाहिए था। जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा से है। इसलिए यही कमियाँ कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं।

बहरहाल, अब चुनावी गतिविधियां अपने चरम पर हैं और मतदाताओं के पास सोचने समझने का बहुत ज्यादा समय नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले समय में मतदाताओं की अग्निपरीक्षा है और विशेष रूप से इन चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं की वास्तविक परीक्षा होनी है। हालांकि हम यह भी जानते हैं कि मुस्लिम मतदाता पहले से अधिक जागरूक हुए हैं और वह बखूबी जानते हैं कि कौन सी पार्टी और कौन सा उम्मीदवार देश और मुसलमानों के भविष्य के लिए बेहतर साबित होगा। वह यह भी जानने हैं और पहचानने लगे हैं कि केवल चुनाव के समय निकलने वाले ‘बरसाती मेंढक’ कैसे मुसलमानों का सौदा कर लेते हैं और पूरी मिल्लत को बदनाम करने का काम करते हैं। इसलिए इन चुनावों में इन बरसाती मेंढ़कों और मुसलमानों के सौदागरों से सुरक्षित और सावधान रहने की सख्त ज़रूरत है। हमारी बस यही प्रार्थना है कि आप मताधिकार का उपयोग अवश्य करें, और बहुत सोच समझकर करें। साथ ही मुसलमानों के सौदागरों (merchants of Muslim) के झांसे में बिल्कुल न आएं।

डॉ. यामीन अंसारी

(लेखक उर्दू अख़बार इंकलाब के रेजीडेंट एडिटर हैं।)

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