100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय का स्वामित्व सोसायटी (ट्रस्ट) को सौंपना भारत की सांस्कृतिक संपदा पर बड़ा हमला

राष्ट्र के नाम खुला आपातकालीन ख़त

100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध पटना संग्रहालय को बचाने की अपील.

(निवेदक – पटना संग्रहालय बचाओ समिति ,पटना)       

-पुष्पराज की कलम से

100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय का स्वामित्व सोसायटी (ट्रस्ट) को सौंपना भारत की सांस्कृतिक संपदा पर बड़ा हमला है .

यह हमला राज्य सृजित राष्ट्रीय आपदा है .हम इसकी मुखालफत करते हैं .

100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध पटना संग्रहालय को बचाना क्योँ जरुरी है –

1.ब्रिटिश शासन काल में 1917 में स्थापित पटना संग्रहालय अविभाजित भारत के पुरातन संग्रहालयों में तीसरा पुरातन संग्रहालय है ,जो अपनी स्थापना का 100 वर्ष पूरा कर रहा है .यह आश्चर्यजनक सत्य है कि इस प्रसिद्ध राष्ट्रीय संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में राजकीय स्तर पर होनेवाले  शताब्दी वर्ष के श्रृंखलाबद्ध आयोजनों पर विराम लगाकर इस संग्रहालय को विस्थापित किया जा रहा है .

2.सितम्बर – अक्टूबर 2017 में एक माह ले लिए  संग्रहालय को बंद करने की सूचना को (संग्रहालयों की सुरक्षा के सन्दर्भ में अंतरराष्ट्रीय मानदंड के अनुसार)विज्ञापित किए बिना पटना संग्रहालय को एक माह के लिए बंद कर दिया गया .इस दौरान पटना संग्रहालय के अधिकारिओं की शक्ति को अपने अंकुश में लेकर विश्व प्रसिद्ध कृति यक्षिणी सहित हजारों पुरावशेष और कला -कृतिओं को पटना संग्रहालय से स्वायत्त संस्था बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित किया गया .



3.बिहार संग्रहालय 1860 के सोसायटी एक्ट से निर्मित एक स्वायत्त संस्था “बिहार म्यूजियम सोसायटी “ के द्वारा संचालित है ,जिसके मुख्य प्रवर्तक बिहार के मुख्य सचिव अंजनी सिंह हैं .अंजनी सिंह इस ट्रस्ट के नॉडल ऑफिसर हैं .बिहार म्यूजियम सोसायटी के संचालन का सर्वाधिकार नॉडल ऑफिसर के पास केन्द्रित है .बिहार संग्रहालय के निर्माण को माननीय पटना उच्च न्यायालय ने “ नोट इन पब्लिक इंटरेस्ट “ कहा था .बिहार संग्रहालय के निर्माण स्थल पर 6 हैरिटेज बंगले मौजूद थे ,जिसे तोड़ने से बचाने के लिए मुख्यमंत्री से देश के इतिहासकारों ने गुहार की थी .

4.पटना के कुछ प्रमुख इतिहासकारों ,संग्रहालय विषेशज्ञों,विशिष्ट बुद्धिजीविओं ने 2015 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भेजकर पटना संग्रहालय के पुरावशेषों को ट्रस्ट के तहत संचालित ,निर्मित बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरण की योजना को अवैधानिक बताते हुए पटना संग्रहालय को बचाने की अपील की थी .इस पत्र पर बिहार के प्रथम संग्रहालय निदेशक हरिकिशोर प्रसाद ,प्रो.हेतुकर झा ,प्रो.अरुण कुमार सिन्हा ,प्रो .जयदेव मिश्र ,प्रो .राजेन्द्र राम ,प्रो.शत्रुघ्न शरण ,पद्मश्री उषा किरण खान ,पद्मश्री गजेन्द्र नारायण सिंह और नव-नालंदा संग्रहालय के पूर्व-निदेशक भूपेन्द्र नाथ सिंह ने हस्ताक्षर किए थे .       5 .बंगाल से बिहार के अलग होने के बाद संविधान सभा के अध्यक्ष , “ बिहार निर्माता “ डॉ .सच्चिदानंद सिन्हा ने बिहार –उड़ीसा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर के पटना निवास पर आयोजित बैठक में 15 जनवरी 1917 को पटना में संग्रहालय के निर्माण का प्रस्ताव दिया था .बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के निर्देशन में अप्रैल 1917 को पटना उच्च न्यायालय के भवन के एक  हिस्से में “पटना संग्रहालय” की स्थापना की गयी.1929 के जनवरी माह तक पटना संग्रहालय पटना उच्च न्यायालय के भवन में कार्यरत रहा . भारतीय स्थापत्य कला के बेहतरीन प्रतीक INDO-SARACENIC “ इंडो-सारासेनिक शैली “ से निर्मित खुबसूरत  भवन में पहली फ़रवरी 1929 से पटना संग्रहालय को नया आयाम प्राप्त हुआ . कालांतर में उड़ीसा के अलग होने के बाद बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी  बिहार रिसर्च सोसायटी में परिणत हो गया .पटना संग्रहालय के संचालन के लिए पटना म्यूजियम मैनेजिंग कमिटी गठित था,जिसके अध्यक्ष पटना उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश होते थे .1961 तक पटना संग्रहालय मैनेजिंग कमिटी के द्वारा  संचालित होता रहा .1961 के 25 अप्रैल से बिहार सरकार ने बिहार के पुरातात्विक स्थलों और सभी संग्रहालयों को पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के प्रशासकीय नियंत्रण में लिया तो पटना संग्रहालय की मैनेजिंग कमिटी का अधिकार समाप्त हो गया .

6.बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी की स्थापना एशियाटिक सोसायटी की  अवधारणा पर हुई थी .बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी इतिहास – पुरातत्व के अंतराष्ट्रीय अध्ययन ,शोध में वैज्ञानिक दृष्टिकोण  के आधार पर कार्यरत महत्वपूर्ण संस्था थी .बिहार रिसर्च सोसायटी को पटना संग्रहालय के  संस्थापक Mother- organization की तरह देखना चाहिए .भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल बिहार –उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के संस्थापकों में थे ,जिन्होंने बिहार रिसर्च सोसायटी को आगे बढाने के साथ –साथ 1926 से 1937( मृत्युकाल ) तक पटना संग्रहालय की मैनेजिंग कमिटी के अध्यक्ष की जिम्मेवारी निभाई.पटना संग्रहालय के संस्थापकों में एडवर्ड गेट ,वाल्स ,प्रो.जे.एन समादार,डॉ.सच्चिदानंद सिन्हा ,के .पी जायसवाल ,महापंडित राहुल सांकृत्यायन,एस .ए.शेर,ए.एस अल्तेकर की भूमिका को शताब्दी वर्ष में स्मरण करना और उनकी भूमिका का  दस्तावेजीकरण आनेवाली पीढ़ीओं  के लिए प्रेरणादायी होता .दुःखद आश्चर्य यह है कि विगत 2 दशक से ज्यादा समय से  बिहार रिसर्च सोसायटी की सभी गतिविधिओं को पूर्णतः बंद कर दिया गया .एक सरकार ने आर्थिक सहायता बंद कर बिहार रिसर्च सोसायटी में  एक दशक से ज्यादा वक्त तक ताला लगा दिया था दूसरी सरकार ने इस संस्थान को पटना संग्रहालय का अधिकृत हिस्सा बनाकर संस्थान को नौकरशाही व्यवस्था का अंग बना दिया .इन्डियन हिस्ट्री कांग्रेस ने 1997 में बिहार रिसर्च सोसायटी के अस्तित्व को बचाने के लिए प्रताव पारित किया था .बिहार रिसर्च सोसायटी का पटना संग्रहालय के साथ विलयन के बाद विलयन अधिनियम के प्रावधान के अनुसार “परामर्शदात्री समिति “का गठन आवश्यक था ,जो एक दशक बीते अब तक गठित नहीं हुआ .

महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा तिब्बत से लाई गयी हजारों पाण्डुलिपिओं की वजह से यह संस्थान बिहार के सभी शिक्षण संस्थानों और विश्व विद्यालयों से ज्यादा महत्व रखता है लेकिन अफ़सोस कि बिहार में कभी बिहार रिसर्च सोसायटी के गरिमा की पुनर्वापसी को सांस्कृतिक-राजनीतिक सामाजिक मुद्दा नहीं बनाया गया .(गौरतलब है कि महापंडित के द्वारा रखी पाण्डुलिपिओं में ऐसी जानकारी निहित है ,जिससे बिहार और भारतीय इतिहास की दृष्टि बदल सकती है .)



7. भारतीय संस्कृति और मानवता की विकास यात्रा  के महानतम अध्येता महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भारतीय अतीत के साथ जुड़े बौद्ध संस्कृति के विकास  की खोज के लिए तिब्बत की कई कष्टपूर्ण एतिहासिक यात्राएं की और तिब्बत से दुर्गम रास्तों से 22 खच्चरों  पर ढो कर साथ लाए बौद्ध साहित्य और कलाकृतिओं से(कुल 6000से ज्यादा पाण्डुलिपियां और कला कृतिया )  पटना संग्रहालय को समृद्धि प्रदान किया था.राहुल सांकृत्यायन के द्वारा तिब्बत और विश्व यात्रा से लाए गए अमूल्य धरोहर पटना संग्रहालय के एक्शेसन रजिस्टर में 1933 से 1956 तक महापंडित से दान स्वरूप प्राप्त होने का प्रमाण है . राहुल सांकृत्यायन के द्वारा लाए गए पाण्डुलिपिओं को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के लिए उपयोगी मानकर स्थानान्तरण चाहती थी  पर काशी प्रसाद जायसवाल जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान के हस्तक्षेप से पाण्डुलिपि को बिहार रिसर्च सोसायटी में सुरक्षित बचाया गया .काशी प्रसाद जायसवाल ने उन पांडुलिपिओं का अपनी देखरेख में अनुवाद शुरू कराए थे ,जो काशी प्रसाद जी की असामयिक मौत की वजह से आगे नहीं बढ़ सका . रॉयल नीदरर्लैंड एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स एंड साईंस ने ERNST STEINKELLNER के द्वारा बौद्ध संस्कृति और तिब्बत में राहुल सांकृत्यायन के द्वारा खोज किए गए ज्ञान भंडार पर किए  गए शोध प्रबंध को 2003 में A Tale of Leaves on Sanskrit Manscripts in Tibet their Past and their Future प्रकाशित किया है .यूरोप के विश्व विद्यालयों में राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा किसी भारतीय राजनेता से ज्यादा है .थंका कलाकृतिओं के बारे में राहुल जी ने अपनी जीवनयात्रा में खुद लिखा है कि जर्मनी ,फ़्रांस ,लन्दन और श्रीलंका में थंका को प्राप्त अप्रत्याशित प्रतिष्ठा के बावजूद उन्होंने पटना संग्रहालय को ही क्योँ प्राथमिकता दी .यूरोप के किसी देश में 4 -5 थंका कला कृति के लिए मिले बहुत बड़े धन के प्रस्ताव के बाद राहुल जी को इनकी कीमत का अंदाजा लगा और उन्होंने तय किया कि इतनी कीमती कलाकृति को अपने राष्ट्र की धरोहर के रूप में संरक्षित करना ही आनेवाली पीढियो के लिए उपयोगी होगा .  पटना संग्रहालय  विकास के कालक्रम में अपने साथ 4 संस्थानों को इकट्ठे जोड़ता है .पुरातात्विक धरोहरों के अद्भुत संग्रहों वाला पटना संग्रहालय,राहुल सांकृत्यायन गैलरी और संग्रहालय की बुनियाद “बिहार रिसर्च सोसायटी “. काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान भी संग्रहालय परिसर में ही स्थित है .यह संस्थान बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के द्वारा संचालित है .67वर्ष पूर्व स्थापित इस संस्थान को अब तक अपना भवन तक  नसीब नहीं हुआ है .शोध और अध्ययन के प्रति बिहार सरकार की उदासीनता का यह बेहतरीन सबूत है .

8.पटना संग्रहालय की स्थापना अखंड भारत की ब्रिटिश सरकार के द्वारा की गयी थी इसलिए इस संग्रहालय को एक राज्य सरकार अगर  “ राज्य संपदा” की तरह कब्जे में लेती है तो यह नीतिसंगत नहीं है .तत्कालीन पुरातत्वप्रेमी ब्रिटिश प्रशासकों के सहयोग से पटना संग्रहालय के संस्थापकों ने हड़प्पा, मोहनजोदड़ो से लेकर अखंड भारत के पाकिस्तान ,बांग्ला देश , रावलपिंडी,तमिलनाडु,आन्ध्र प्रदेश ,उड़ीसा सहित अलग –अलग हिस्सों में बिखड़े पुरातत्व के महत्व की सामग्री को इकट्ठा किया .पटना म्यूजियम की मैनेजिंग कमिटी के आग्रह पर प्राचीन भारतीय मुद्राओं के संकलन के लिए ब्रिटिश सरकार ने उच्च स्तरीय क्वायंस कमिटी गठित की थी ,जिसके प्रयास से पटना संग्रहालय के पास प्राचीन दुर्लभ  मुद्राओं का  संग्रह प्राप्त हुआ .स्थापना काल  के उत्तरार्ध में मौर्यकालीन पुरातत्व के लिए प्रसिद्ध हुए पटना संग्रहालय के लिए राहुल सांकृत्यायन ने दुनियां के देशों की  यात्रा के दौरान “सांस्कृतिक –राजदूत “ की भूमिका निभाई और पटना संग्रहालय को दुनियां के देशों में  बौद्ध कालीन पुरातात्विक संग्रहों वाले “ बौद्ध संग्रहालय “ की पहचान प्राप्त हुई .बौद्ध कालीन पुरातत्वों में भगवान बुद्ध के अस्थि कलश ,मौर्य कालीन दीदारगंज यक्षिणी और जैन तीर्थंकर  से जुड़े पुरातत्वों ने इस संग्रहालय को भारत के अन्य संग्रहालयों के मध्य विशिष्टता प्रदान की .

9.महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुत्री जया सांकृत्यायन पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में विस्थापन की सूचना से विचलित हुईं और उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 12 सितम्बर 2017 को आपातकालीन पत्र भेजा .बिहार के मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में पटना संग्रहालय के धरोहरों के स्थानांतरण के विरुद्ध उन्होंने स्पष्ट लिखा .”आज के स्वाधीन भारत में राहुल जी की प्रिय कर्मभूमि बिहार में उनकी देन ,उनकी सोच का मान ना रखना ,उनके प्रति निरादर है .इस विद्या मंदिर को निर्जीव और वीरान ना किया जाए .”इस पत्र के आलोक में मुख्यमंत्री ने सांकृत्यायन परिवार से कोई वार्ता तो नहीं की पर इस पत्र का सकारात्मक असर यह हुआ कि राहुल सांकृत्यायन गैलरी का स्थानान्तरण रुक गया .

10.स्मरणीय है कि भारत सरकार के लेखा महानियंत्रक (CAG) ने वर्ष 2014 में पटना संग्रहालय के सन्दर्भ में अपनी रिपोर्ट में इस बात पर गहरी आपत्ति जताई है कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा लायी गयी 6 हजार तिब्बती पाण्डुलिपिओं का वैज्ञानिक तरीके से रखरखाव और प्रबंधन नहीं हो रहा है .सीएजी ने अब तक उन पाण्डुलिपिओं के अनुवाद और प्रकाशन नहीं होने के सवाल पर नौकरशाही की कार्यशैली पर सवाल उठाया है .सीएजी ने पटना संग्रहालय में पुरातत्वों के रख्ररखाव के प्रति लापरवाही को देखते हुए अमूल्य पुरातत्वों के साथ भविष्य में असुरक्षा और गायब होने के की संभावना प्रकट की है .भारत सरकार की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में एक सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर पटना संग्रहालय के पुरातत्वों की हिफाजत के लिए उच्च स्तरीय जाँच कमिटी के गठन करने की जरूरत थी .लेकिन बिहार सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट की अनदेखी करते हुए गैर क़ानूनी तरीके से पटना संग्रहालय के सबसे महत्वपूर्ण पुरावशेषों और कला–कृतिओं को  स्थानान्तरित करने  की भूमिका निभाई .            11.जिस पटना संग्रहालय को अखंड भारत में भारतीय संग्रहालय की तरह विकसित किया गया ,उस संग्रहालय को मुख्यमंत्री ने राज्य की सम्पदा / अपनी निजी संपदा की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश क्योँ की ?जाहिर है कि  राष्ट्रीय धरोहर मानकर ही 80 -90 के दशक में केंद्र सरकार ने पटना संग्रहालय को अपने अधीन में लेने  की प्रक्रिया शुरू की थी पर तत्कालीन बिहार सरकार ने अंतिम समय में किसी तरह का राजनीतिक अड़चन लाकर  केंद्र सरकार की कोशिश को रोक दिया था .

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12.बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 23 अक्टूबर 2017 को पटना संग्रहालय की यात्रा की और पटना संग्रहालय के अस्तित्व को कायम रखने की घोषणा  की .मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय में मौजूद  1764 के पूर्व के पुरावशेष बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित करने की बार –बार घोषणा कर रहे हैं .मुख्यमंत्री के द्वारा पटना संग्रहालय में 3 घंटे बिताने के बाद 24 अक्टूबर 2017 को टाईम्स ऑफ़ इण्डिया में प्रकाशित समाचार के अनुसार पटना संग्रहालय से 39 हजार पुरावशेषों को स्थानांतरित किया जाएगा .बिहार सरकार के संस्कृति सचिव ने गत वर्ष  इसी अख़बार में 50 हजार पुरावशेषों के स्थानांतरण की बात की थी .( https://m.timesofindia.com/city/patna/Patna-Museum-on-the-verge-of-losingsheen/articleshow/54769499.cms) मुख्यमंत्री ने बिहार संग्रहालय के लोकार्पण के अवसर पर पटना संग्रहालय से  1764 के पूर्व के पुरावशेष बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित होने के बाद पटना संग्रहालय को “ मॉडर्न आर्ट गैलरी “ के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी.मौर्यकालीन,बौद्धकालीन विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय से उसकी पहचान बने प्रसिद्ध यक्षिणी सहित हजारों  पुरावशेषों को हटाकर “ मॉडर्न आर्ट गैलरी “ परिवर्तित करने से  भारतीय इतिहास,भारतीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान संपदा का जो  नुकसान हो रहा है ,उसकी भरपाई नामुमकिन है.


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