Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)
Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

जिन्होंने कानूनों का मखौल बनाते हुए मस्जिद गिराई, उनकी इच्छा पूरी की उच्चतम न्यायालय ने ?

जिन्होंने कानूनों का मखौल बनाते हुए मस्जिद गिराई, उनकी इच्छा पूरी की उच्चतम न्यायालय ने ?

राज्य की देखरेख में बनेगा रामजन्मभूमि मंदिर

छह दिसंबर 1992 की तरह, 9 नवम्बर 2019 भी भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया है.

छह दिसंबर को दिन-दहाड़े जो मस्जिद गिरा दी गयी उसकी रक्षा करने का लिखित आश्वासन भाजपा नेता और उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उच्चतम न्यायालय को दिया था. नौ नवम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय ने उन लोगों, जिन्होंने देश की कानूनों का मखौल बनाते हुए मस्जिद को गिराया था, की इच्छा को पूरा करते हुए मस्जिद की भूमि पर भव्य राममंदिर के निर्माण का रास्ता साफ़ कर दिया. शायद यह पहली बार होगा कि भारतीय राज्य, जो कि घोषित रूप से धर्मनिरपेक्ष है, अपनी देखरेख में एक मंदिर का निर्माण करवाएगा. क्या यह वही गणतंत्र है जिसकी स्थापना हमनें 1950 में की थी?

Religion has intruded deep into our state system.

स्वतंत्रता के तुरंत बाद यह मांग उठी थी कि सोमनाथ मंदिर, जिसे महमूद गजनी ने लगभग नष्ट कर दिया था, का पुनर्निर्माण राज्य को करवाना चाहिए. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, जो उस समय जीवित थे, ने कहा कि हिन्दू अपने मंदिरों का निर्माण और पुनर्निर्माण करने में स्वयं सक्षम हैं. इसे सरकार ने स्वीकार किया यद्यपि कुछ कैबिनेट मंत्री उस गैर-सरकारी ट्रस्ट के सदस्य बने, जिसे पुनर्निर्माण का काम सौंपा गया. मंदिर के पुर्ननिर्माण के बाद उसके उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के आधिकारिक हैसियत में भाग लेने के प्रस्ताव का प्रधानमंत्री नेहरु ने विरोध किया.

आज जो हो रहा है उससे यह साफ़ है कि धर्म ने हमारे राज्य तंत्र में गहरे तक घुसपैठ कर ली है. बल्कि सच तो यह है कि कई मामलों में धर्म, सरकार की नीतियों का नियंता बन बैठा है.

बाबरी मस्जिद मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय की विधिवेत्ता और राजनैतिक दल अपने-अपने ढंग से व्याख्या और विश्लेषण करेंगे. हाँ, यह अवश्य संतोष और प्रसन्नता का विषय है कि निर्णय के बाद देश में कहीं भी कोई गड़बड़ी या हिंसा नहीं हुई. देश के सबसे बड़े राजनैतिक दल और अन्य दलों ने इस निर्णय को न केवल स्वीकार किया वरन उसे ‘संतुलित’ बताते हुए उसका स्वागत भी किया.

यह समझना मुश्किल है कि यह फैसला क्यों और कैसे ‘संतुलित’ है. माननीय न्यायाधीशों ने यह स्वीकार किया है कि सम्बंधित मस्जिद में 1949 तक नमाज़ पढ़ी जाती थी. उनका यह भी मत है कि मस्जिद के गुम्बद के नीचे रामलला की मूर्तियों की स्थापना चोरी-छुपे की गयी थी और वह एक अपराध था. उन्होंने यह भी कहा है कि मस्जिद का ध्वंस एक आपराधिक कृत्य था और उसके बाद वहां जो अस्थायी मंदिर बनाया गया, वह अदालत के यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का उल्लंघन था.

यह दिलचस्प है कि जिन राजनैतिक शक्तियों और व्यक्तियों ने ये तीनों अपराध किये थे, वे इस निर्णय से बहुत प्रसन्न हैं और कह रहे हैं कि यह साबित हो गया है कि वे सही थे. एलके आडवाणी ने यही कहा है. अदालत ने मंदिर निर्माण का प्रभारी तो राज्य को बना दिया है परन्तु मस्जिद का निर्माण, समुदाय पर छोड़ दिया गया है.

Ayodhya decision is a big push for evidence method

पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति गांगुली ने बिलकुल ठीक कहा है कि “संविधान के विद्यार्थी के रूप में मेरे लिए इस निर्णय को स्वीकार करना मुश्किल है”. जानेमाने विधिवेत्ता और एनएएलएसएआर विश्वविद्यालय के कुलपति फैजान मुस्तफा का कहना है कि “अयोध्या निर्णय, साक्ष्य विधि के लिए एक बड़ा धक्का है”.

जहाँ तक अदालत के निर्णयों को स्वीकार करने का सवाल है, हम सबको याद है कि केवल एक वर्ष पहले भाजपा ने सबरीमाला मंदिर के द्वार स्त्रियों के खोले जाने के निर्णय का विरोध किया था.

बाबरी मस्जिद मामले में 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायeलय ने इस आधार पर अपना निर्णय सुनाया था कि हिन्दुओं की आस्था है कि उसी स्थान पर राम का जन्म हुआ था. न्यायालय ने विवादित भूमि को तीन भागों में बाँट दिया था. उच्चतम न्यायालय भी यह मान कर चला कि हिन्दू मानते हैं कि राम उसी स्थान पर जन्मे थे. परन्तु इस निर्णय में जो अलग है वह यह है कि न्यायालय ने संघ परिवार के इस दावे को स्वीकार नहीं किया है कि उस स्थान पर एक मंदिर था जिसे बाबर के सिपहसालार मीर बकी ने नष्ट कर दिया था.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रपट की आधार पर उच्चतम न्यायालय इस नतीजे पर पहुंचा है कि उस स्थान पर पहले एक गैर-इस्लामिक ढांचा था परन्तु इस बात का कोई सबूत नहीं है कि वह ढांचा राम मंदिर था और उसे गिरा कर मस्जिद का निर्माण किया गया था. उच्चतम न्यायeलय का मुख्य तर्क यह है कि मुस्लिम पक्षकार यह साबित करने में विफल रहे हैं कि मस्जिद के भीतरी प्रांगण में नमाज़ अदा की जाती थी. यह तर्क इसलिए विश्वसनीय नहीं लगता क्योंकि निर्विवाद रूप से वह स्थान सन 1857 तक मस्जिद था. अतः वहां नमाज़ न अदा किये जाने का कोई कारण नहीं है. दूसरी ओर, उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मस्जिद का बाहरी प्रांगण हिन्दुओं के कब्ज़े में था जिसे उन्होंने तत्कालीन यात्रियों के विवरणों व अन्य सबूतों से साबित किया है. अतः उस स्थान पर हिन्दुओं का दावा वैध है.

यह निर्णय शायद समकालीन भारतीय इतिहास के एक दुखद अध्याय को बंद कर दे. राममंदिर विवाद ने ही भाजपा को एक छोटी सी पार्टी से देश की सबसे बड़ी पार्टी बनाया है. संघ परिवार ने लगातार यह प्रचार किया कि मुस्लिम शासकों ने मंदिरों को तोड़ा और बाबरी मस्जिद, राममंदिर के मलबे पर तामीर की गयी. इस प्रचार ने मुसलमानों के प्रति समाज में घृणा फैलाई. यह संतोष की बात है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने इस दुष्प्रचार को गलत ठहराया है.

अब हमारे देश को सन 1991 के उस कानून का सख्ती से पालन करना चाहिए जिसके अनुसार, धार्मिक स्थलों के मामले में 15 अगस्त 1947 की यथास्थिति बनाये रखी जाएगी. बाबरी मस्जिद को गिराते समय संघ परिवार का नारा था “यह तो केवल झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है”. इस नारे को हमेशा के लिए दफ़न कर दिया जाना चाहिए. भाजपा को काशी और मथुरा का मुद्दा उठाने की बात करने वाले विनय कटियार जैसे लोगों से किनारा कर लेना चाहिए. तभी हम देश को उस तरह के रक्तपात और तनाव से बचा सकेंगे, जो देश ने बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद भोगा.

Due to majoritarian politics, it is becoming difficult for minorities to get justice.

इस निर्णय से यह भी साफ़ है कि बहुसंख्यकवादी राजनीति के चलते, आज देश में ऐसा वातावरण बन गया है जिसमें अल्पसंख्यकों के लिए न्याय पाना मुश्किल होता जा रहा है. देखना यह होगा कि संघ परिवार, जो सत्ता पाने के इस तरह के मुद्दों के आधार पर देश को ध्रुवीकृत करता आया है, अपनी इन हरकतों से बाज आएगा या नहीं.

राम पुनियानी

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

Ram Janmabhoomi temple will be built under the supervision of the state

About राम पुनियानी

Ram Puniyani was a professor in biomedical engineering at the Indian Institute of Technology Bombay, and took voluntary retirement in December 2004 to work full time for communal harmony in India. He is involved with human rights activities from last two decades.He is associated with various secular and democratic initiatives like All India Secular Forum, Center for Study of Society and Secularism and ANHAD. He is Our esteemed columnist

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