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अफ़सोस किताबों के लिखने वाले भी किताबों के सफ़हों में दफ़्न हैं किसी सूखे गुलाब की तरह

Munshi Premchand

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए। सवाल यह है कि किताबों ने क्या दिया मुझको ? अफ़सोस किताबों के लिखने वाले भी किताबों के सफ़हों में दफ़्न हैं, किसी सूखे गुलाब की तरह, जब बरक खोलो तो महकने लगती है शख़्सियत उनकी। चमकती जिल्द की सूरत कहाँ बताती है कि किन पथरीली राहों से वो शख़्स गुज़रा …

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