Tag Archives: कविता

स्वप्निल का संसार और उसमें ब्रह्मराक्षस की ताकाझांकी

Jaisa Maine Jeevan dekha स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताओं की समीक्षा

स्वप्निल को कभी स्वप्न में भी ख़याल नहीं रहा होगा कि खूंखार कवि अनिल जनविजय के रहते मुझ सा नौसिखिया उनकी कविताओं की समीक्षा लिख मारेगा और उसकी धज कुछ ऐसी होगी कि आज 40 साल बाद भी किसी पत्रिका में छपी वो समीक्षा उनके पास सुरक्षित है। कुछ दिन पहले रंगकर्मी और हिंदी सिनेमा में अपना तम्बू ताने नन्दलाल …

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अँधियारे पाख की इक कविता है जिसने चाँद बचा रक्खा है ..

डॉ. कविता अरोरा शुक्ल पक्ष फलक पर ढुलकता चाँद …टुकड़ी-टुकड़ी डली-डली घुलता चाँद …सर्दी ..गरमी ..बरसात ..तन तन्हा अकेली रात …मौसमों के सफ़र पर मशरिक़ से मगरिब डोलता है ..निगाहों-निगाहों में सभी को तोलता है…मसरूफियात से फ़ुरसत कहाँ आदमी को ..अब भला चाँद से कौन बोलता है ….दिन जलाये बैठी इन बिल्डिंगों का उजाला ….बढ़ा के हाथ फलक से रात …

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और फिर से छतों से तुम्हें प्यार हो जायेगा…

Poetry on Kite by Kavita Arora

….पतंग उड़ा कर तो देखो.. तुम डोर संग हवाओं के रिश्ते महसूस करोगे… फ़लक तक रंगीन फरफराहटों में.. यक़ीनन काग़ज़ी टुकड़े नहीं, तुम उड़ोगे.. वो ख़्वाब चिड़ियों के परों वाले.. बादलों पर घरों वाले…. मगरिब का मुहल्ला.. शाम का थल्ला.. शफ़क का दरवज्जा.. तारों का छज्जा.. फलक की गली.. इक चाँद की डली.. उमंगों की तमाम उड़ानों के सिरे माँझे …

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