खतरे में समाजवाद का अस्तित्व!

नई दिल्ली। देश की राजनीति पर चर्चा (Discussion on country's politics) करें तो पुराने समाजवादी (Socialist) अंतिम व्यक्ति की लड़ाई लड़ने के लिए हर समय तत्पर रहे हैं। वैसे तो आचार्य नरेंद्र देव (Acharya Narendra Dev), लोक नायक जयप्रकाश नारायण (Lok Nayak Jaiprakash Narayan), कर्पूरी ठाकुर (Karpuri Thakur) और मधु लिमये (Madhu Limaye) जैसे समाजवादियों ने जनता के प्रति अपने संघर्ष का लोहा मनवाया है पर डॉ. राम मनोहर लोहिया (Dr. Ram Manohar Lohia) एक ऐसे प्रेरक व्यक्त्वि हैं कि जिन्होंने न केवल भारत बल्कि पूरे एशिया में समाजवाद का परचम लहराने का बीड़ा उठा लिया था।

चरण सिंह राजपूत

राजनीतिक स्तर पर गरीब की पीड़ा लोकसभा में जो लोहिया ने रखी वह एक मिसाल बन गई। बताया जाता है कि मध्य प्रदेश के रीवां क्षेत्र में जब एक दलित वृद्धा को उन्होंने गोबर से गेंहू निकालते देखा तो उनका मन द्रवित हो उठा। उस गोबर को उठाकर वह संसद में ले आये और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को ललकारते हुए बोला कि देश की 30 करोड़ जनता तीन आने पर निर्भर है और देश के प्रधानमंत्री को अपने ऊपर खर्च करने के लिए प्रतिदिन 25 हजार रुपये चाहिएं। लोहिया की वह बहस तीन आना बनाम 15 आना नाम से संसद में एक नजीर बन गई। उस समय के समाजवादियों की देश और समाज के प्रति समर्पण भाव का आलम यह था कि दिखावा और सत्ता का मोह उन्हें छू भी न सका था। लोक बंधु के नाम से जाने जाने वाले राजनारायण तो बनारस की एक रियासत से संबंध रखते थे। उन्होंने अपने हिस्से की सारी संपत्ति गरीबों को दान में दे दी थी। कर्पूरी ठाकुर जब बिहार के मुख्यमंत्री थे तो उनके पिताजी लोगों की हजामत बनाते थे। मधु लिमये ने तो पेंशन लेने से ही इनकार कर दिया था। जब जेपी क्रांति के बाद देश में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उन्हें मंत्री पद की पेशकश की गई, जिसे उन्होंने बड़ी शालीनता से ठुकरा दिया। मतलब जितनी ज्यादा सादगी और समर्पण उतनी ही बड़ी शख्सियत। बताते हैं कि लोहिया ने तो दो जोड़ी कपड़ों में पूरी जिंदगी काट दी। चरण सिंह का जब निधन हुआ तो उनके नाम पर न कोई मकान था और न ही बैंक में पैसे।

वह संघर्ष था समाजवादियों का। वे लोग सत्ता के पीछे नहीं भागते थे।

उन देश और समाज के प्रति समर्पित समाजवादियों को अपना आदर्श मानकर ही मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद, शरद यादव, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान जैसे नेताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मुकाम हासिल किया। जेपी क्रांति के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में ही समाजवादियों का नैतिक पतन शुरू हो चुका था। खुद चरण सिंह ने उस कांग्रेस से मिलकर सरकार बना ली, जिसके विरोध पर उन्हें प्रचंड बहुमत मिला था। 1990 में चंद्रशेखर भी कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। 1995 में देवगौड़ा और उसके बाद इंद्रकुमार गुजराल की सरकार भी कांग्रेस की मदद से बनी। 1991 में मुलायम सिंह ने भी कांग्रेस की मदद से अपनी सरकार बचाई थी। मतलब जो समाजवादी संघर्ष को पसंद करते थे वे सत्ता की ओर लपकने लगे।

कांग्रेस से सटकर अपना काम निकालने वाले समाजवादी अब संघियों के रहमोकरम पर बुढ़ापा काटने की जुगत भिड़ा रहे हैं। जब देश को सबसे ज्यादा जरूरत समाजवादियों की है तो ऐसे ये लोग संघर्ष से बच रहे हैं। आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले उत्तर भारत में समाजवादियों ने कोई ऐसा बड़ा आंदोलन नहों किया, जिसकी सराहना की जा सके।

कल संसद में जिस तरह से नेताजी के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने आत्मसमर्पण करते नजर आए। मोदी के कार्यकाल की तारीफ करना तो समाजवादियों का पक्ष कतई नहीं था। जगजाहिर है कि मोदी सरकार में सबसे ज्यादा संकट बस रोजी रोटी पर ही आया है और समाजवादियों का संघर्ष भी लोगों की रोजी और रोटी को ही लेकर रहा है। निश्चित रूप से किसी भी सरकार के संसद में अंतिम दिन सरकार को बधाई देना बनता है पर ये कहना कि हम लोग तो बहुमत जुटा नहीं पाएंगे। कैसी संसदीय परंपरा है।

वैसे भी देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का बयान बहुत महत्व रखता है। वह भी तब जब लोकसभा चुनाव सिर पर है। वह प्रदेश में विपक्ष की पार्टी के संरक्षक हैं। उनकी पार्टी मोदी सरकार के खिलाफ बसपा से मिलकर संघर्ष कर रही है। कार्यकर्ताओं पर भाजपा सरकार लाठीचार्ज करा रही है। समाजवादियों में तो आंदोलनकारियों के दमन पर अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़े होने की परंपरा रही है। 50 के दशक में जब केरल सरकार ने किसान मजदूरों पर लाठीचार्ज करा दिया तो डॉ. राम मनोहर लोहिया अपनी सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे। जब इलाहाबाद में छात्र छात्राओं पर योगी सरकार ने लाठीचार्ज कराया तो ऐसे में भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने के बजाय मुलायम सिंह मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ने लगे।

जिन लोगों को लग रहा है कि मुलायम सिंह ने संसदीय परम्परा निभाई है। वे लोग उनका बयान पढ़ लें।

उन्होंने संसद में बोला है कि मेरी कामना है कि यहां जितने भी सदस्य हैं, वे फिर से चुनकर आएं। हम इतना बहुमत हासिल नहीं कर सकते हैं। इसलिए प्रधानमंत्री जी आप फिर प्रधानमंत्री बनकर आएं।

संसद में बैठे सदस्यों के फिर से चुन कर आने को संसदीय परंपरा माना जा सकता है। मुलायम सिंह देश के बड़े नेता हैं। अखिलेश यादव उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताते हैं। ऐसे में उनका बयान विपक्ष का बयान माना जाता है। यह कहकर कि वे बहुमत हासिल नहीं कर सकते हैं तो उन्होंने लड़ने से पहले ही हार मान ली। बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी उन्होंने ऐसा ही किया था। उन्हें महागठबंधन का नेता मान लिया गया था। ऐन वक्त पर वह पलटी मार गए थे।

बात मुलायम सिंह की ही नहीं है। 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार होने का मुखर विरोध कर गैर संघवाद का नारा देने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सत्ता की खातिर मोदी की गोद में जा बैठे हैं। अपने को दलितों का पैरोकार बताने वाले रामविलास पासवान भी मोदी के रहमोकरम पर सत्ता की मलाई चाट रहे हैं। लालू प्रसाद घोटालों के आरोप में जेल में बंद हैं। उत्तर प्रदेश में अपना वजूद बचाने के लिए अखिलेश यादव को उनकी चिर प्रतिद्वंद्वी रही बसपा से गठबंधन करना पड़ रहा है। बिहार में तेजस्वी यादव व तेजप्रताप में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। हरियाणा में देवीलाल की राजनीतिक विरासत के दो टुकड़े हो चुके हैं। एक पर दुष्यंत चौटाला काबिज हैं तो दूसरे पर अभय चौटाला। पंजाब में बादल परिवार का भी यही हाल है। वैचारिक लड़ाई लड़ने के नाम पर 2011 में पुनर्जीवित की गई सोशलिस्ट पार्टी भी सेमिनारों तक सिमट कर रह जा रही है। भाई वैद्य, कुलदीप नैयर, जस्टिस राजेन्द्र सच्चर का निधन हो चुका है। डॉ. प्रेम सिंह किसी तरह से पार्टी को खींच रहे हैं। कहना गलत न होगा समाजवाद का अस्तित्व खतरे में है।

(लेखक पहले राष्ट्रीय सहारा में थे। अब स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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