Justice Markandey Katju

फारूक अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के मामले में ट्रायल पर सुप्रीम कोर्ट, एक लिटमस टेस्ट होगा शीर्ष अदालत का व्यवहार – जस्टिस काटजू

नई दिल्ली, 28 सितंबर 2019. एक कश्मीरी पंडित सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश व प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने कहा है कि ड्रैकुअन जेएंडके पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत फारूक अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और हिरासत के मामले में मुकदमे में कोर्ट का व्यवहार एक लिटमस टेस्ट होगा।

जस्टिस काटजू ने अंग्रेजी वेब साइट इंडिका न्यूज पर लिखे अपने आलेख The Indian Supreme Court on trial में लिखा कि आज भारत में जो सबसे महत्वपूर्ण मामला चल रहा है और भारत के लोगों द्वारा भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का ट्रायल है वह बाबरी मस्जिद / राम मंदिर विवाद नहीं बल्कि ड्रैकुअन जेएंडके पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत फारूक अब्दुल्ला की गिरफ्तारी और हिरासत का मामला है। इस मुकदमे में कोर्ट का व्यवहार एक लिटमस टेस्ट होगा।

उन्होंने लिखा कि सर्वोच्च न्यायालय 26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान द्वारा बनाया गया था, और संविधान लागू होने के कुछ नहीने बाद  रोमेश थापर बनाम राज्य मद्रास (Romesh Thapar vs State of Madras) में न्यायालय की एक संविधान पीठ द्वारा स्थापित किया गया था कि “सर्वोच्च न्यायालय का गठन  लोगों के मौलिक अधिकारों के रक्षक और संरक्षक के तौर पर किया गया है”। यह विचार न्यायालय के बाद के कई निर्णयों, उदाहरणार्थ 9 न्यायाधीशों के खंडपीठ के आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु (I.R.Coelho vs State of Tamil Nadu) राज्य फैसले में दोहराया गया है ।

जस्टिस काटजू ने अपने लेख में लिखा कि हाल के दिनों में भी, जब भारत में फ़ासीवादी प्रवृत्तियाँ फिर से उभरी हैं, सुप्रीम कोर्ट और कई उच्च न्यायालयों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। उदाहरण के लिए, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभिजीत अय्यर मित्रा को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था, जिन्होंने केवल कोणार्क मंदिर के बारे में व्यंग्यपूर्ण ट्वीट किया था (जिसके लिए उन्होंने जल्द ही माफी भी मांग ली थी), जो कि राजस्थान राज्य बनाम बालचंद (Justice Krishna Iyer in State of Rajasthan vs Balchand) में जमानत देने के लिए न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर द्वारा तय सिद्धांतों के खिलाफ था। जमानत को खारिज करते हुए न्यायपालिका के अभिभावक के तौर पर अपेक्षित जस्टिस गोगोई ने  क्षुद्र और क्रूर टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता की सही जगह जेल है (rejecting bail, CJI Gogoi made the flippant and cruel remark)।

उन्होंने लिखा कि बेरहम पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत फारूक अब्दुल्ला की गिरफ्तारी (draconian Public Safety Act) के बाद, जो आधार दिया गया है, वह है कि उन्होंने हिंसा को उकसाया है। फारूक अब्दुल्ला का रिकॉर्ड यह रहा है कि वह हमेशा एक उत्साही भारतीय राष्ट्रवादी थे, और वे कभी भी एक अलगाववादी नहीं थे। लेकिन वह धारा 370, जिसने कश्मीर को एक विशेष दर्जा दिया था, के निरस्तीकरण से बुरी तरह परेशान थे। यहां तक कि यह मानते हुए भी कि वह कश्मीर के लिए अज़ादी चाहते हैं, यह कोई अपराध नहीं है। बहुत से लोग जैसे खालिस्तानी, कई कश्मीरी, कुछ नागा समूह, आदि, आजादी मांगते हैं।

जस्टिस काटजू ने आगे लिखा कि J & K पब्लिक सेफ्टी एक्ट, जो बिना सुनवाई के दो साल तक की हिरासत में रखने की अनुमति देता है, को एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा विधिविहीन कानून घोषित किया गया है। यह 1919 के रोलेट बिल के समान है।

बता दें, जस्टिस काटजू आजकल अमेरिका प्रवास पर कैलीफोर्निया में हैं, और सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं।

http://www.hastakshep.com/oldwhat-is-happening-in-kashmir/

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