Vision of India in Bishkek meeting,

बिश्केक में पाकिस्तान क्या सचमुच ‘आइसोलेट’ हुआ? मोदी को पाकिस्तान के रास्ते जाना न था तो अनुमति क्यों मांगी गई ?

यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि जिस रास्ते आपको जाना नहीं था, उस वास्ते परमिशन लेने की आवश्यकता क्या थी? यह सवाल पूछने की हिमाकत गलती से कोई पत्रकार विदेश मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग (External affairs ministry’s press briefing) में करे, तो उसे यह बताकर चुप कराया जा सकता है कि हम तय विषय पर सीमित सवाल करें, या फिर उसे ‘इग्नोर’ किया जाता है। बालाकोट एयर स्ट्राइक (Balakot air strike) हुआ, उसके प्रकारांतर 26 फरवरी से पाकिस्तान ने हवाई मार्ग बंद कर रखा है। पिछले माह जब सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) विदेश मंत्री थीं, शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गनाइजेशन – Shanghai corporation organization, (एससीओ – SCO) की शिखर बैठक की तैयारियों के सिलसिले में उन्हें बिश्केक (bishkek declaration) जाना पड़ा। उन्होंने पाकिस्तान वाले रूट से जाने की इज़ाजत मांगी। अनुमति के उपरांत वो इसी मार्ग से वहां गईं।

इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में एविएशन डिवीजन (Aviation Division in the Indian High Commission located in Islamabad) है। उसके माध्यम से हवाई रूट के वास्ते अनुरोध पत्र भेजे गये थे। पाकिस्तान के उड़ान मंत्री गुलाम सरवर खान ने जानकारी दी कि सोमवार 10 जून 2019 को एक बार फिर भारतीय उच्चायोग के एविएशन डिवीजन का एक पत्र आया और पीएम मोदी के बिश्केक बैठक में जाने के वास्ते इस मार्ग की अनुमति मांगी गई।

पाक मंत्रालय ने 72 घंटे के लिए कराची- हिंगोल-ग्वादर हवाई रास्ते से परमिशन जारी कर दी थी। फरf ऐसा क्या हुआ कि पीएम मोदी का विशेष विमान इस रूट को रद्द कर वाया ओमान-ईरान, मंज़िलें मकसूद की ओर उड़ चला?

पीएम मोदी का पाकिस्तान रूट से नहीं जाना, उन मीडिया वालों को सूट करता है, जो नाक के बदले नाक काट लेने की कूटनीति पर भरोसा करते हैं। देश में एक बड़ी संख्या वैसे लोगों की हो चुकी है, जो इस बात में अपना शौर्य ढूंढते हैं कि पीएम मोदी वाया पाकिस्तान नहीं गये। तो फिर परमिशन क्यों लिया? संभव है, आने वाले दिनों में यह बात सार्वजनिक हो सके।

31 मई को भारतीय वायुसेना ने घोषणा की, कि हमने वायु मार्ग से अल्पकालिक प्रतिबंध हटा लिए हैं। 11 इंट्री व निकासी मार्ग दोबारा से खोले गये हैं। क्या इस वास्ते पाकिस्तान की ओर से कोई अनुरोध आया था? इस सवाल पर चुप्पी है।

हमारी वायुसेना को भी कहीं से निर्देश तो आया होगा कि वायु मार्ग खोल दो। इस समय यह पूछना मुश्किल है कि आप कभी पाकिस्तान के प्रति सॉफ्ट हो जाते हो, फिर अचानक से खू़ब सख्त हो क्यों हो जाते हो? ये हो क्या रहा है?

बिश्केक बैठक (SCO Summit- 2019) में जो कुछ हुआ, बाहर से देखने में पीएम मोदी का कड़क अक्स बना है। इसमें कोई दो राय होनी भी नहीं चाहिए।

मोदी के समकक्ष इमरान खान सामने बैठे हों, कोई दुआ-सलाम नहीं। नज़रें फेर ली जाएं। यह देहभाषा उन टीवी एंकरों को बड़ी भाती है, जो पाकिस्तान को पल भर में मिटा देने के वास्ते हुंकार भरते हैं। उस पब्लिक को भी अच्छी लगती है, जो बिना विषय समझे ‘भारत माता की जय’ जैसे नारे लगाने को उतावली रहती है। तो क्या ऐसा कर देने भर से पाकिस्तान वहां ‘आइसोलेट’ हो गया?

भारत से जो संवाददाता एससीओ शिखर बैठक को कवर कर रहे हैं, वो ये नहीं बता पाये कि बिश्केक में इमरान खान बाकी सदस्य देशों से द्विपक्षीय बात कर रहे थे, या नहीं? इमरान खान,अगर एक कोने में पड़े हुए थे, तो सचमुच पाकिस्तान को हाशिये पर ले आने में हम सफल हुए।

क्या है शंघाई सहयोग संगठन – what shanghai corporation of organization is counter of nato

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में आठ यूरेशियाई देश चीन, कजाकस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताज़िकिस्तान, उज़बेकिस्तान, भारत व पाकिस्तान सदस्य हैं। शुरू में इसका नाम शंघाई फाइव था।

26 अप्रैल 1996 को पांच देशों चीन, कजाकस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताज़िकिस्तान ने आपसी सुरक्षा व भरोसा बढ़ाने के उद्देश्य से शंघाई फाइव की बुनियाद रखी थी। बाद में उज़बेकिस्तान इससे जुड़ा।

9 जून 2017 को कज़ाकस्तान की राजधानी अस्ताना में हुई शिखर बैठक में भारत और पाकिस्तान ‘एससीओ’ के पूर्णकालिक सदस्य बनाये गये।

‘एससीओ’ के चार देश कजाकस्तान, किर्गिस्तान, ताज़िकिस्तान और उज़बेकिस्तान कभी सोवियत संघ के हिस्से हुआ करते थे। इनकी वजह से शंघाई कोऑपरेशन आर्गेनाइजेशन में रूस का ‘अपर हैंड’ बराबर बना रहता है। रूस समेत इन चारों देशों का पाकिस्तान से कैसा संबंध रहा है, विश्लेषकों को इसे समझने की भी आवश्यकता है।

ये मध्य एशिया के वो देश हैं, जिनसे पाकिस्तान के संबंध उनकी सोवियत संघ से मुक्ति के समय से बेहतर रहे हैं। उसकी दो वजहें हैं। पहला, इन देशों को मान्यता देने की पहल सबसे पहले पाकिस्तान ने की थी। दूसरा, ये चारों ओआईसी (आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन) के सदस्य देश हैं। रूस समेत इन पांच देशों से अलग चीन, पाकिस्तान का सदाबहार दोस्त रहा है।

भारत में इन पंक्तियों को पढ़ने वालों को यह बात कड़वी लग सकती है कि बिश्केक में मोदी की तरह, इमरान खान भी साइडलाइन बैठकों में प्रेसिडेंट पुतिन व शी से मिले। उसके विजुअल्स पाक मीडिया दिखाये जा रहे हैं।

पीएम मोदी दूसरी बार जब शपथ ले रहे थे, बिम्सटेक देशों के शासन प्रमुखों के अलावा किरगिस्तान के राष्ट्रपति सोरोन्बे जीनबेकोव को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया था। इसका मतलब यह नहीं था कि राष्ट्रपति सोरोन्बे जीनबेकोव, पीएम मोदी से कमतर स्वागत इमरान का करते।

अभी एससीओ की बैठक में द्विपक्षीय बातचीत (Bilateral talks in the meeting of SCO) का जो दौर चला, उसमें पाकिस्तान और किरगिस्तान ने सड़क व वायुमार्ग को और बेहतर बनाने का समझौता किया है। यह एक छोटा सा उदाहरण है, जिसे देखना कईयों को रास नहीं आता। मगर, कूटनीति का असल चेहरा यही है।

बिश्केक में पाकिस्तान-चीन की जो साइडलाइन बैठक हुई है, उसमें वन बेल्ट वन रोड को और बेहतर व कमर्शियल बनाने पर भी बात हुई। पाकिस्तान में ग्वादर तक ओबीओआर का संचालन कैसे सुरक्षित रहे, यह भी चीन की चिंता का विषय था। भारत, ओबीओआर को मान्यता न देकर अपनी स्थिति पर कायम है। भारत पर इस बार भी काफी दबाव था कि वह चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड इनीशिएटिव’ पर मुहर लगाये व उसे आगे बढ़ाये। यह अच्छी बात है कि भारत ने इस पर पूरी सावधानी बरती है। इसे मान लेने से पाक कब्ज़े वाले कश्मीर में निर्माणाधीन चीनी अधोसंरचनाओं पर हमारी आपत्ति सिफर हो जाती है।

निश्चित रूप से बिश्केक बैठक में भारत के विज़न (Vision of India in Bishkek meeting) और कैनवास के आगे पाकिस्तान बौना सा दिखता है। पीएम मोदी ने आतंकवाद समाप्त करने  की दिशा में विश्व स्तर पर बैठक कराने का जो अहद किया है, उससे नाइत्तफाकी इमरान छोड़ किसी नेता ने नहीं किया। पाकिस्तान की इसपर चुप्पी ही थी, क्योंकि उसे मालूम है कि ऐसी बैठक होती है, उसमें उसके काले कारनामों की धज्जियां उड़ेंगी ही।

चीन को मालूम है कि जी-20 में भारत इस समय एक बड़ी भूमिका में उभरने लगा है, इस वजह से राष्ट्रपति शी ओसाका की बैठक में भारत का सपोर्ट चाहेंगे। उधर, राष्ट्रपति ट्रंप ने धमकाया है कि शी यदि ओसाका में नहीं मिले तो चीनी सामानों पर और भी व्यापार शुल्क लादूंगा।

भारत और चीन की लीडरशिप विश्वास बहाली की ओर बढ़ रही है, यह देखना कभी-कभी सुखद लगता है। इसका लाभ सीमा विवाद को सुलझाने में उठाया जाए, तो देशहित में सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

यह भी एक सच है कि पिछले पांच वर्षों में अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश बना है। रूस इस ब्यूह रचना को भी शंघाई सहयोग संगठन के मंच से तोड़ना चाहता है। अमेठी में 12 हज़ार करोड़ के निवेश वाली एके-47 असाल्ट राइफल बनाने वाली फैक्ट्री की आधारशिला 2 मार्च 2019 को पीएम मोदी ने रख दी थी। आज उसे मूर्त रूप देने के वास्ते बिश्केक में सहमति बन गई। यह एक तीर से दो शिकार ही है। अमेठी में इससे रोज़गार के अवसर वोट बैंक के साथ बढ़ेंगे।

स्टॉकहोम स्थित इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की रिपोर्ट 2018 में आई थी कि 2013 से 2017 के बीच अमेरिका, इज़राइल का मार्केट शेयर भारत के हथियार बाज़ार में 26 प्रतिशत बढ़ा है, और रूस का 62 फीसदी घटा है।

ट्रंप को गलतफहमी थी कि एशिया-प्रशांत, अफगानिस्तान में अमेरिका की बनाई लकीर पर भारत चलेगा। इस समय ऐसा होता नहीं दिख रहा है। भारत को अफगानिस्तान में पांव जमाये रखना है। इसलिए पीएम मोदी ने अफगानिस्तान की सुरक्षा व समृद्धि का सवाल बिश्केक में पुरज़ोर तरीके से उठाया है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की ऊर्जा ज़रूरतें तेज़ी से बढ़ी हैं। हमें ईरान से तेल सप्लाई निरंतर चाहिए, जिसे अमेरिकी ज़िद ने बाधित कर रखा है।

एक दिलचस्प वाकया शिंजो आबे के तेहरान पहुंचने पर हुआ है। यों वो गये हैं शांतिदूत के रूप में। मगर, अमेरिकी क्लब का प्रमुख सदस्य जापान यदि ईरान से गठजोड़ मज़बूत करता है, तो ट्रंप की कूटनीति का क्या होगा? ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी बिश्केक में हैं। शी ने यह तय किया है कि ईरान को व्यापक रणनीतिक सहकार बनाना है।

ईरान ने चीन की महत्वाकांक्षी ‘ओबीओआर’ को समर्थन देने का संकेत दिया है। ईरान के साथ चीन और जापान जैसे दो अलग-अलग ध्रुवों की साझेदारी देखकर लगता है कि भू-सामरिक स्थितियां तेज़ी से बदल रही हैं। भारत इसमें कहां फिट बैठता है, उसे देखने की आवश्यकता है।

भारत को सेंट्रल एशिया में मार्ग चाहिए, तो इस इलाके में रूस के समर्थन के बिना इसे हासिल करना संभव नहीं है। शी जिस तरह चाइना-किर्गिस्तान-उज़बेकिस्तान रेल मार्ग की अवधारणा आगे बढ़ा रहे हैं, उसी ट्रैक पर भारत को भी अग्रसर होने की आवश्यकता है। मध्य एशिया न सिर्फ मेडिकल टूरिजम की दृष्टि से बढ़ता हुआ बाज़ार है, ऊर्जा का ज़खीरा भी है।

भारत को पाकिस्तान वाले सिंड्रोम से बाहर निकलना चाहिए। संसदीय चुनाव में पाकिस्तान को पंचिंग बैग बनाने के बाद भावुक मतदाताओं से जो उसे हासिल करना था, वो हो चुका!

पुष्परंजन

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। मूलतः यह आलेख देशबन्धु पर प्रकाशित हुआ है, वहाँ से साभार)

About देशबन्धु Deshbandhu

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.