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खुला और छिपा नस्लवाद और साम्प्रदायिकता

Irfan Engineer

गत 15 मार्च 2019 को क्राईस्टचर्च, न्यूजीलैंड की मस्जिद अल-नूर और लिंनवुड एवेन्यू मस्जिद (Christchurch, New Zealand’s Masjid al-Noor and Lynwood Avenue Mosque) में जुम्मे की नमाज अदा कर रहे पचास मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया. इस घटना में 48 लोग घायल हुए. तीस वर्षीय हमलावर ब्रेंटन टेरंट, एक आस्ट्रेलियाई मध्यमवर्गीय परिवार का सदस्य था. उसने सोशल मीडिया पर 74 पेज का अपना घोषणापत्र पोस्ट कर बताया कि उसने यह हमला क्यों किया. न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री (New Zealand’s Prime Minister) ने इस हमले को आतंकी हमला बताया और बिना लागलपेट के कड़े शब्दों में इसकी भर्त्सना करते हुए कहा कि यह न्यूजीलैंड के इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक था.

मीडिया ने क्राईस्टचर्च के इस सामूहिक नरसंहार, जिसका दोषी एक श्वेत ईसाई था, का जिस तरह से वर्णन किया, वह उससे बहुत भिन्न था, जब इस तरह की घटनाएं किसी मुसलमान द्वारा अंजाम दी जाती हैं. लंदन के ‘डेली मिरर’ की अगले दिन की मुखपृष्ठ की हेडलाईन थी, ‘एंजिलिक बाय हू ग्रिउ इंटू एन इविल फार राईट मास किलर (देवदूत जैसा लड़का, जो बड़ा होकर एक शैतानी अति-दक्षिणपंथी सामूहिक हत्यारा बन गया)’. अखबार ने अपने पाठकों का ध्यान इस हत्यारे के मासूमियत-भरे बचपन की ओर आकर्षित करते हुए उनकी सहानुभूति अर्जित करने की कोशिश की. ‘डेली मिरर’ ने बताया कि वह बच्चा किस तरह कई मुसीबतों से घिरा हुआ था और उसके पिता को कैंसर था.

इसी अखबार ने 2016 में औरलेंडो नाईट क्लब में हुई गोलीबारी, जिसमें 50 व्यक्ति मारे गए थे, का एकदम अलग ढंग से वर्णन किया था. इस मामले में हत्यारा इस्लामिक स्टेट का सदस्य था. उस समय का शीर्षक था, ‘आईसिस मेनियेक किल्स 50 इन गे क्लब (आईसिस के विक्षिप्त आदमी ने गे क्लब में 50 की जान ली)’. जरा ‘आईसिस मेनियेक’ की ‘एंजिलिक बाय’ से तुलना कीजिए. पहला शब्द हत्यारे के प्रति घृणा और निंदा का भाव जगाता है – जिसमें कुछ भी गलत नहीं है – जबकि दूसरे शब्द से सहानुभूति जागती है और पाठक को यह बताया जाता है कि ‘हमारी नस्ल, संस्कृति और धर्म’ का व्यक्ति जो ‘देवदूत’ था, किसी कारणवश गलत राह पर चला गया.

आस्ट्रेलियाई दैनिक ‘कोरियर मेल’ की प्रथम पृष्ठ की खबर का शीर्षक था ‘वर्किंग क्लास मेड मेन (श्रमजीवी वर्ग का पागल आदमी)’. इस खबर का पहला वाक्य था, ‘आतंकी टेरंट, हिंसक वीडियो खेलों के गंभीर व्यसन से ग्रस्त था और वह घुंघराले बालों वाले एक स्कूली लड़के से सामूहिक हत्यारा बन गया’. साफ है कि ‘कोरियर मेल’ सारा दोष उन हिंसक वीडियो खेलों पर डालना चाहता है, जिन्हें टेरंट देखता था और उसकी विचारधारा, उसके नस्लवादी दृष्टिकोण और अप्रवासियों और मुसलमानों के प्रति उसकी घृणा में कुछ भी गलत नहीं देखता. इस अखबार को टेरंट के 74 पृष्ठ के घोषणापत्र में कुछ भी गलत नहीं दिखा और ना ही इस तथ्य में कि वह दूसरे धर्मों और संस्कृतियों के लोगों के खिलाफ युद्ध करना चाहता  था. पश्चिमी मीडिया बिना किसी देरी के और स्पष्ट शब्दों में उन आतंकी घटनाओं की निंदा करता है, जिनमें मुसलमान शामिल होते हैं. पश्चिमी के वर्चस्वशाली मीडिया का एक हिस्सा किसी न किसी तरह आतंकी के धर्म का हवाला दे ही देता है और इस कारण उसके पूरे समुदाय पर दोष मढ़ा जाने लगता है. पश्चिमी मीडिया, आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ता है. ओरलैंडो नाईट क्लब पर हमले की घटना पर ‘डेली टेलीग्राफ’ की खबर का शीर्षक था, ‘सेम सेक्स जिहाद’. जिहाद को सामान्यतः इस्लाम से जोड़ा जाता है.

जब कोई आतंकी घटना श्वेत नस्लवादी या कट्टरपंथी या अति-राष्ट्रवादी समूह द्वारा अंजाम दी जाती है, तब उसे अपवाद और पागलपन बताया जाता है. अखबार कहते हैं कि उस व्यक्ति के साथ कुछ गलत हुआ था – मानो उनकी संस्कृति में नस्लवाद के लिए कोई स्थान ही नहीं है और उत्तरी देशों में रहने वाले सभी ईसाई अत्यंत आधुनिक हैं और उनके दृष्टिकोण बहुत साफ-सुथरे और सही हैं. उनका मतलब यह होता है कि गलती ‘दूसरों’ की है, जो किसी अलग धर्म, नस्ल या संस्कृति के हैं. जब किसी मुस्लिम संगठन द्वारा कोई आतंकी हमला किया जाता है, तो उसका दोष धर्म पर मढ़ा जाता है ना कि राजनीति पर.  कहा जाता है कि ऐसे संगठनों का उद्देश्य ‘जीवन जीने के हमारे तरीके को नष्ट करना है’. परन्तु नस्लवादी ब्रेंटन टेरंट या अप्रवासी-विरोधी नार्वे के आतंकी एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक, जिसने युटोया द्वीप में वर्कर्स यूथ लीग के एक समर कैंप में भाग ले रहे 69 लोगों की 22 जुलाई 2011 को हत्या कर दी थी, के उद्देश्यों की भर्त्सना नहीं की जाती.

श्वेत श्रेष्टतावादियों, अप्रवासी-विरोधी अति-राष्ट्रवादियों या ईसाई कट्टरपंथियों पर यह आरोप कभी नहीं लगाया जाता कि वे ‘जीवन जीने के हमारे तरीके को नष्ट करना चाहते हैं’, जबकि सच यह है कि ये लोग ‘जीवन जीने के हमारे तरीके’ के लिए अधिक बड़ा खतरा हैं क्योंकि वे लाशों के अतिरिक्त, अपने पीछे कुछ नहीं छोड़ जाते और राज्य को सुरक्षा के नाम पर, और अधिक तानाशाहीपूर्ण अधिकार हासिल करने का बहाना दे देते हैं. टेरंट और ब्रेविक को ‘दूसरे’ की बजाए ‘अपना’ माना जाता है और कहा जाता है कि शायद उन लोगों की उनके लक्ष्यों को हासिल करने की रणनीति में कुछ कमियां या गलतियां हैं. दिल के एक कोने में टेरंट और ब्रेविक जैसे लोगों के प्रति कुछ सहानुभूति भी होती है. आखिरकार, वे लोग हमारे देश को ‘उनसे’, अर्थात उन व्यक्तियों से जो ‘हमारी संस्कृति’ और ‘जीवन जीने के हमारे तरीके’ के लिए खतरा हैं, मुक्ति दिलाने का प्रयास कर रहे हैं. सच यह है कि टेरंट और ब्रेविक जैसे लोग, पैराशूट से नहीं उतरते. वे उसी सामाजिक सोच की उपज होते हैं, जो अप्रवासियों व अन्य धर्मों, नस्लों व संस्कृतियों के लोगों व अन्य भाषाएं बोलने वालों को तनिक भी पसंद नहीं करती.

यह प्रच्छन्न नस्लवाद (Disguised Racism), जिसमें बड़ी संख्या में लोग विश्वास करते हैं, मानता है कि उनकी नस्ल, धर्म, भाषा व संस्कृति अन्यों से श्रेष्ठ है और उसे कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिनकी रक्षा के लिए संस्थागत ढ़ांचा होना चाहिए और जिसके लिए जरूरत पड़ने पर बलप्रयोग भी किया जाना चाहिए. यह नस्लवाद लोगों को सिखाता है कि ‘दूसरों’ के साथ भेदभाव  स्वाभाविक है. यह छुपा हुआ नस्लवाद इस तरह के संस्थागत ढ़ांचे और प्रणालियों को जन्म देता है, जो संपत्ति, आय, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, राजनैतिक शक्ति आदि में असमानता को जन्म देते हैं. इस तरह का नस्लवाद ‘दूसरों’ के खिलाफ पूर्वाग्रहों पर जिंदा रहता है और ‘दूसरों’ का अमानवीकरण करता है. यह नस्लवाद, श्रेष्ठतावाद से निपटने में दोहरे मानदंड अपनाने को प्रोत्साहित करता है. यह प्रच्छन्न नस्लवाद, आईसिस आतंकवादी (isis Terrorist) को ‘विक्षिप्त’ और टेरंट व ब्रेविक को ‘देवदूत जैसे बच्चे’ बताता है जो गलत राह पर चल पड़े थे. वह इन व्यक्तियों के दिलों में गहरे तक पैठ जमाए नस्लवाद पर प्रश्न नहीं उठाता और मीडिया, इन देवदूत जैसे लडकों के जीवन के बारे में अधिक लिखता है, उनके पीड़ितों के बारे में कम.

यह प्रच्छन्न नस्लवाद, नस्लवादी विचारधाराओं और संगठनों को प्रोत्साहित करता है और लोगों को इतने गुस्से और नफरत से भर देता है कि वे हिंसा और आतंकवाद का सहारा लेने में भी नहीं हिचकिचाते. यह नस्लवाद, सेम्युल हटिंगटन के ‘सभ्यताओं के टकराव’ के सिद्धांत और क्लू-क्लक्स-क्लेन जैसे हिंसक संगठनों का समर्थन करता है. नस्लवादी विचारधाराएं और संगठन, नस्लवाद को गहरा करते हैं और उसे बढ़ावा देते हैं. केवल आतंकी हमलों की निंदा काफी नहीं है. नागरिक समाज व राज्य को प्रच्छन्न नस्लवाद की पहचान कर उसे दूर करना चाहिए. न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डन ठीक यही कर रही हैं. वे अपने देशवासियों के दिल में छुपे प्रच्छन्न नस्लवाद से मुकाबला करने के लिए मस्जिदों में जा रही हैं और आतंकी हमले के शिकार लोगों के परिवारों को सांत्वना दे रही हैं. वे मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को गले लगाकर यह कह रही हैं कि वे उनके ‘अपने’ हैं और टेरंट और उसके जैसे आतंकवादी ‘दूसरे’ हैं.

भारतीय संदर्भ में अगर हम नस्लवाद शब्द के स्थान पर साम्प्रदायिकता (Communalism) शब्द लिख दें तो ऊपर किया गया विश्लेषण हमारे देश पर भी अक्षरश: लागू होगा. हमने इस देश में प्रत्यक्ष और खुल्लमखुल्ला साम्प्रदायिकता के उदाहरण देखे हैं. इनमें साम्प्रदायिक दंगे, बाबरी मस्जिद का ढ़हाया जाना, मवेशियों का परिवहन करने वाले मुस्लिम व्यापारियों की इस बहाने पीट-पीटकर हत्या कर देना कि वे गायों को काटने के लिए ले जा रहे हैं और मुस्लिम नाम वाले स्थानों और सड़कों के नाम बदलना शामिल हैं. यहां वरिष्ठ मंत्री और सत्ताधारी दल के पदाधिकारी खुलकर नफरत फैलाने वाले भाषण दे रहे हैं. ऐसा करना दंडनीय अपराध है किंतु उनके विरूद्ध कभी कोई कार्यवाही नहीं की जाती. स्थान की कमी के कारण यहां हम नफरत फैलाने वाले भाषणों का विस्तृत विवरण नहीं दे रहे हैं. इनका वर्णन ‘सेक्युलर पर्सपेक्टिव’ के पुराने अंकों में उपलब्ध है.

इस देश में प्रत्यक्ष साम्प्रदायिकता के अतिरिक्त परोक्ष व प्रच्छन्न साम्प्रदायिकता का भी बोलबाला है. आम लोग मानते हैं कि ईसाई समुदाय के सदस्य, हिन्दुओं का सामूहिक धर्मपरिवर्तन करवाना चाहते हैं और इसी कारण चर्चों और ईसाईयों की प्रार्थना सभाओं पर हमले होते हैं. लोग मानते हैं कि मुसलमान ढे़र सारे बच्चे पैदा कर जल्द से जल्द इस देश का बहुसंख्यक समुदाय बनना चाहते हैं. वे यह भी मानते हैं कि भले ही सभी मुसलमान आतंकवादी न हों लेकिन सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं. उनकी यह भी मान्यता है कि मुसलमान, पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और वह देश ही उनके लिए उपयुक्त स्थान है.

इस प्रच्छन्न साम्प्रदायिकता के चलते, मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति में जबरदस्त गिरावट आई है. इसकी बानगी सच्चर समिति (Sachar Committee), रंगनाथ मिश्र आयोग (Ranganath Mishra Commission) और अमिताभ कुंडु समिति (Amitabh Kundu Committee) की रपटों में देखी जा सकती है. मुस्लिम समुदाय के आतंकवादियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाती है, जो कि पूरी तरह से उचित है. परंतु समझौता एक्सप्रेस और मक्का मस्जिद बम धमाकों के आरोपी, साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के दोषी और पहलू खां के हत्यारे छोड़ दिए जाते हैं. क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि वे हिन्दू हैं? साम्प्रदायिकता के संस्थागत स्वरूप ग्रहण करने का नतीजा यह है कि गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में 60 से अधिक बच्चों की मौत के लिए केवल डॉ. कफील खान को दोषी ठहराकर निलंबित कर दिया जाता है. क्या ऐसा इसलिए क्योंकि वे मुसलमान हैं? संसद, राज्य विधानमंडलों और सरकारी व निजी क्षेत्र मे मुसलमानों और ईसाईयों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है. कई शहरों में हाउसिंग सोसायटियां, मुसलमानों और ईसाईयों को सदस्यता नहीं देतीं. हम मुसलमानों और ईसाईयों के साथ भेदभाव के बहुत से उदाहरण दे सकते हैं परंतु ऊपर दिया गया विवरण पर्याप्त है. प्रच्छन्न और परोक्ष साम्प्रदायिकता के कारण ही साम्प्रदायिक दंगों, लिंचिंग की घटनाओं और ईसाईयों की प्रार्थना सभाओं और चर्चों पर हमलों की निंदा नहीं होती और मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर और समझौता एक्सप्रेस बम धमाकों, जिनके अधिकांश शिकार मुसलमान थे, को भुला दिया जाता है. इसके विपरीत, जब किसी आतंकी हमले में मरने वालों में हिन्दुओं की बहुसंख्या होती है तब ऐसे हमलावरों को ‘देशद्रोही’ बताकर उन्हें कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की जाती है.

परंतु हमारे पास न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डन (New Zealand Prime Minister, Jasminda Arden,) जैसा कोई व्यक्ति नहीं है. महात्मा गांधी ने साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए आमरण अनशन कर हमारी प्रच्छन्न साम्प्रदायिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाए थे. कोई भी समाज तब तक हिंसा के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता जब तक कि लोगों के मन से हर तरह की प्रच्छन्न साम्प्रदायिकता और श्रेष्ठतावाद को निकाल बाहर नहीं कर दिया जाता. सभी धर्मों में ऐसा करने के उपाय उपलब्ध हैं. भारत में हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम् (सारा विश्व हमारा परिवार है)’ और ‘एकम् सत, विप्रा बहुधा वदन्ति’ (सत्य एक ही है परंतु ज्ञानियों ने इसका वर्णन विभिन्न शब्दों में किया है) के सिद्धांतों में विश्वास रखते हैं. बौद्ध धर्म हमें तार्किकता सिखाता है और बताता है कि हम सभी के प्रति करूणा का भाव रखें और अपने को श्रेष्ठ न मानें. मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी ‘तर्जुमन-अल-कुरान’ में कहा है कि मुसलमानों के लिए जरूरी है कि वे हर धर्म को सत्य मानें. संत कबीर, मौलाना रूमी और बुल्लेशाह हमें बताते हैं कि प्रेम, सभी धर्मों का मूल तत्व है और ईसाई धर्म हमें अपने पड़ोसियों से प्रेम करना सिखाता है.

-इरफान इंजीनियर

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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